Friday, April 1, 2011

काश! तब ही रोक दिया गया होता

रांची के साथ यह कोई नई बात नहीं, वर्षों से यही होता रहा, एक-दो मवेशी ले जिस किसी ने जहां-कहीं डंडा गाड़ दिया वह जमीन उसकी हो गई। आज से कोई चालीस-पचास साल पहले रांची के अधिकतर इलाके खाली थे। धीरे-धीरे इसका अतिक्रमण होता चला गया।
सवाल यह भी कि जिस समय बस्तियां बस रही थी, उस समय प्रशासन क्या कर रहा था। वहां तो सड़क भी बन गई, बिजली-पानी सब पहुंच गया। अगर इसे उसी समय रोक दिया गया होता तो...।
दरअसल, यह सब कई लोगों की मिलीभगत से हुआ। इसमें दबंग भी थे, राजनेता भी, पुलिस-प्रशासन के लोग भी। छह दशक के बाद प्रशासन की नींद टूटी है कोर्ट के दखल देने के बाद।
यह कहानी किसी एक मुहल्ले की नहीं आरागेट, नागाबाबा खटाल, कार्ट सराय रोड, पीस रोड, हटिया, कांके रोड, बरियातू, बिरला मैदान, धुर्वा, कोकर समेत राजधानी के सभी मुहल्लों की है।
जमीन विवाद को ले लाठियां यहां चलती रहीं। मालिकाना हक दिलाने में न्यायालय के आदेशों की भी कई बार अवहेलना की गई। जमीन नहीं छोड़ प्राय: जमीन मालिकों से जमीन का एक हिस्सा मांगा गया या बाजार मूल्य से काफी कम कीमत पर जबरन जमीन ली गई।
राजधानी के कितने ही लोगों के इस दर्द की ओर कभी किसी नेता या राजनीतिक दल ने ध्यान नहीं दिया। कभी किसी ने किसी से सहयोग मांगा तो न्यायालय जाने की विद्वत सलाह दी गई। आज जब न्यायालय के आदेश से लोगों को राहत मिल रही है तो नेता सक्रिय हो गए हैं। कोई हटाने के पूर्व बसाने की व्यवस्था की मांग कर रहा है तो अमानवीय व्यवहार का मुद्दा भी उठ रहा है। अहम सवाल यह कि ये बातें शुरू में ही क्यों नहीं आईं। अतिक्रमण हट जाने के बाद भी शहर में जहां-तहां फिर से पुराना खेल शुरू हो गया है। कल फिर यही सवाल खड़ा होगा। जब लोग टाट-तंबू गाड़ लेंगे तब प्रशासन बेदखल करने आएगा। मानवता के नाते सहानुभूति के सवाल उठने लाजिमी होंगे। तो उन्हें अभी ही दो टूक समझा देने या पुनर्वास की जगह दे देने में दिक्कत क्यों।

अकेले चना कब तक फोड़े भाड

सिंधू घाटी सभ्यता के अवशेष बताते हैं कि इसकी असमय मौत युवावस्था में ही हो गई। यह अपने जमाने की विकसित, आधुनिक और शहरी सभ्यता बताई जाती है। विद्वान सभ्यता के असमय अवसान के कई कारण बताते हैं इसमें एक प्रमुख कारण है जल स्रोतों का सुख जाना। रांची के जल स्रोतों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण नदी-नाले, ताल-तलैयों की बहुलता वाले शहर के सामने मौत तो नहीं लेकिन 'अस्थीकरणÓ की समस्या आन खड़ी हुई है तो वक्त बात बनाने की नहीं कुछ करने की है। बात जब कुछ करने की हो तो माननीय अगुवा तो विरोध कर सकते हैं, झुठे आश्वासन दे सकते हैं, सही-गलत पैरवी भी कर सकते हैं, लेकिन न्यायापूर्ण, सतत-टिकाऊ विकास की पहल से उनका रिश्ता जोडऩा शायद ज्यादती ही है। इन्हें तो कुछ करने के लिए लोक-लुभावन मुद्दे चाहिए। हां अगर कोई व्यक्ति कोई संस्था कुछ सचमुच करने लगे तो इन्हें संविधान के उल्लंघन, मानवता का दर्द और मानवीय प्रबंधन की चिंता सताने लगती है। आज नागाबाबा खटाल, खेत मुहल्ला, इस्लामनगर, करबला चौक, बरियातू पहाड़ी, रेलवे कॉलोनी, जयप्रकाश नगर, नवाटोली, कांटाटोली, धुर्वा, कोकर, कांके डैम साइट जैसे कितने ही अवैध कब्जों की कहानी बड़ी दुखद है। जबरन लोगों और सरकार के हजारों एकड़ जमीन पर कब्जा किया गया। वर्षों जमीन वापस पाने के लिए संघर्ष करते कितने मर गए या तो कुछ मार दिए गए। कहीं तो दबाव और दबंगई के बल जबरदस्ती लोगों की जमीन अपने नाम लिखाए गए, कहीं इसकी जरूरत भी नहीं समझी गई। इस्लामनगर में तो बच्चों के पढऩे-खेलने की सुविधा पर डाका डाल आठ एकड़ जमीन पर अवैध बस्ती बसा ली गई। खेत मुहल्ला में बड़ा तालाब से लेकर कडरू तक आदिवासियों की हजारों एकड़ जमीन हथिया ली गई, हरमू नदी का पूरा कैचमेंट एरिया लील लिया गया। यही कहानी विद्यानगर में भी दोहराई गई। कांके डैम साइट में भी यही खेल, डैम के ओपन व कैचमेंट एरिया के सैकड़ों एकड़ जमीन ताकतवर लोगों ने गलत तरीके से अपने नाम करा लिया। कभी पूरे शहर को पानी पिलाने वाला कांके डैम आज सुखने के कगार पर है। कांके रोड, कोकर इमाम कोठी ग्रीन लैंड में कंक्रीट के जंगल बस गए, अब ऐतिहासिक टैगोर हिल, बरियातू पहाड़ी पर बने घरों को कौन जायज कहे, कैसे कहे। पहाड़ी मंदिर के पीछे किसने-किसे जमीन बेच दी, वहां कैसे उग आई बस्ती। यहां भी सैकड़ों एकड़ जमीन का खेल। ये तो महज चंद उदाहरण हैं, वस्तुत: यह कहानी हर मुहल्ले की है। दूसरों की जमीन पर वर्षों से काबिज लोगों से तो बाजार दर पर भाड़ा वसूला जाना चाहिए। शहर में बेहतर आधारभूत संरचना की बात करते नहीं अघाने वाले केंद्रीय मंत्री जी आहत हैं, न्याय के लिए लडऩा उनकी 'आदत में शुमरÓ है, तभी तो कांटाटोली, इस्लामनगर से अतिक्रमण हटाने के प्रयास मात्र से उनका खून खौल उठता है, भाषा भी बाजारू हो जाती है। तभी तो वर्षों से दूसरों की जमीन हड़पे बैठे लोगों को पुरस्कृत करने बात कर कानून न मानने वालों को प्रोत्साहित कर रहे हैं। एक विधायक साहब को कांके  में वर्षों से अवैध मकान बना रह रहे लोगों की चिंता होने लगी है, लेकिन शहर पानी के बिना मर जाए इसकी चिंता नहीं। वहीं एक महामहिम अतिक्रमण हटाने के क्रम में गरीबों की झोपडिय़ों हटाने पर मर्माहत हैं, कुछ दिन पहले इन्होंने ही बिना नक्शा बने सभी मकानों को जायज ठहराने की पैरवी की थी। क्या शहर में जंगल राज चल रहा है? जिसकी लाठी उसकी भैंस की बात है क्या? आखिर ये महोदय इस यक्ष प्रश्न का जवाब क्यों नहीं देना चाहते कि किस नैतिकता या कानून के तहत दूसरों की जमीन पर कब्जा जमा उन्हें बेहाल करने वालों को मुआवजा दिया जाए? पुनर्वासित किया जाए? आज पुनर्वास के नाम जिस पंचसितारा सुविधा की मांग हो रही है 'लाभुकोंÓ की सूची बन रही है, उनसे पूछा तो जाए किस अधिकार से अवैध जमीन पर तीन मंजिला-चार मंजिला भवन बना वर्षों से भाड़ा वसूलते रहे? वस्तुत: इस अभियान को टाय-टांय फीस करने की राजनीतिबाजों ने ठान ली है, क्योंकि उनका खुद का बहुत बड़ा स्वार्थ इस अतिक्रमण के खेल में जुड़ा है। किसी के मित्र, किसी के रिश्तेदार का कीमती मकान-दुकान है तो किसी के खुद का। ऐसे में आम जन की सुविधा बढ़ाने वाला यह अभियान अकेला पड़ गया है। न्यायालय की गरीमा इसे जर्क जरूर दे रहा है, लेकिन राजनीतिक इच्छा शक्ति  से खोखले अभियान को राजनीतिज्ञों का बैर आज नही तो कल जरूर लील लेगा।

Thursday, March 10, 2011

चालीस हजार का ही स्पॉट बिलिंग क्यों

 झारखंड राज्य विद्युत बोर्ड ने एक गलती को सही सिद्ध करने के लिए एक और गलती करने की ठान ली है। बिप्स की कार्यक्षमता के प्रभावी अध्ययन के बिना उसे स्पॉट बिलिंग का काम तो दे ही दिया गया अब एजेंसी को सफल बनाने के लिए बोर्ड की ओर से निर्धारित मानक ही कम किया जा रहा है। एजेंसी को फरवरी में जहां 95,000 उपभोक्ताओं के स्पॉट बिलिंग का निर्देश दिया था वहीं मार्च में मात्र चालीस हजार उपभोक्ताओं के स्पॉट बिलिंग की बात कही गई है।
आखिर क्यों? चलिए... देर ही सही, शायद बोर्ड ने एजेंसी की सही क्षमता की पहचान ली। वैसे कार्यादेश के अनुसार मार्च से एजेंसी को शतप्रतिशत उपभोक्ताओं (1.60 लाख) की स्पॉट बिलिंग करनी थी। बोर्ड ने एजेंसी को मार्च बीस तक सभी उपभोक्ताओं को बिल दे उपलब्ध कराने का सख्त निर्देश भी दिया है।

किस अपराधी को तलाश रहा बोर्ड
बोर्ड ने सड़क पर बिल फेंके होने के लिए दोषी अधिकारी को चिह्नित करने की बात कही है। उपभोक्ता के विश्वास बहाली के लिए यह बेहद जरूरी है लेकिन इस निर्देश में भी दोषी एजेंसी को बचाने की बू आ रही है। मूल प्रश्न तो यह है कि एजेंसी ने फरवरी माह का बिल फरवरी में बांटा क्यों नहीं? बिल फेंकने के दोषी तो जरूर चिह्नित हों लेकिन बिल नहीं बांटने वालों का टारगेट कम कर किसे पुरस्कृत किया जा रहा है?
क्या यही है स्पॉट बिलिंग

एजेंसी ने इस बार तत्परता दिखाते हुए काम भी शुरू कर दिया है। इतने निदैश-आदेश के बावजूद स्पॉट बिलिंग के नाम पर आंख में धूल झोंका जा रहा है। एजेंसी के कर्मचारी उपभोक्ताओं के घर तो जा रहे हैं लेकिन मीटर की फोटो व रीडिंग ले बिना बिल दिए लौट रहे हैं। पूछने पर कहते हैं बिल 20 मार्च तक मिलेगा। क्या यही स्पॉट बिलिंग है, स्पॉट बिलिंग में मीटर रीडिंग के साथ ही बिजली बिल दे देना है और मिले तो चेक से बिल की राशि भी ले लेना है।
कई शिकायत
स्पॉट बिलिंग के नाम लोगोंं के आंख जो धूल झोंका जा रहा है इसके खिलाफ कई उपभोक्ताओं ने फोन कर जानकारी दी है।
1.
मीटर रीडिंग और फोटो ले चले गए हैं लेकिन बिल नहीं दिया। बोले बीसको देंगे।
शोभा कुमारी, निवारणपुर,
बुक नं. :: बी 27/ डीआर 2838
2. मीटर रीडिंग कर चले गए बिल दिया ही नहीं, सुना था स्पॉट बिलिंग में रीडिंग के साथ बिल देंगे।
मोहन सिंह, निवारणपुर
बुक नं. :: बी 40/ डीआर 422

ऐसी ही शिकायत कडरू की सादिया खातून बुक नं. एजी06/ केएडी 588, सी केरकेट्टा-कडरू, बुक नं. एजी06/ केएडी 117, मो. कलीम-कडरू बुक नं. एजी06/ केएडी 7781, डा. रत्नेश 10ए, ओल्ड एजी कॉलोनी केएडी 476 ने की है।

सूबे में दमकेगी फूलो की चहक

 गुमला जिले के सुदूर गांव हापामोनी की फूलो देवी बेहद खुश है। उसका आत्मविश्वास देखते ही बनता है। कई अन्य महिलाओं के लिए अब फूलो माडल बन चुकी है, ग्रामीण महिलाएं दीदी से सफलता का राज पूछते अघाती नहीं। गुमला के सुदूर गांव हापामनी में स्ट्राबेरी की खेती, कभी सोचा है आपने, हां यह कर दिखाया है फूलो ने, स्ट्राबेरी ही नहीं, मशरुम, जड़ी-बुटी भी उपजाती है फूलो। अब तो उसे अपने उत्पाद बेचने के लिए रांची भी नहीं आना पड़ता। गांव में ही उसकी स्ट्राबेरी पांच रुपये पीस खरीदने शहर के व्यवसायी पहुंच रहे हैं। ऐसे ही कहानी है महादेव भगत की, अपनी खेत में जड़ी-बूटी उपजाते हैं। वैद्य भी हैं, कुछ जड़ी का इस्तेमाल खुद करते हैं, शेष गांव में ही बिक जाता है।
यह सब कुछ यों ही नहीं हुआ इसके पीछे विकास भारती विशुनपुर और कृषि विज्ञान केंद्र गुमला की महत्वपूर्ण भूमिका है। विकास भारती के सचिव अशोक भगत कहते हैं कि जब से (1983 से)हम इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं तब से हमने समेकित कृषि विकास पर जोर दिया। केवीके की मदद से टिकाऊ कृषि तकनीक की महज शिक्षा ही नहीं दी, किसानों के द्वारा खेत में तैयार विभिन्न फसलों के माडल भी ग्रामीणों को दिखाया। अब वे सामने आने लगे हैं, और समेकित खेती का महत्व समझने लगे हैं। इसके तहत राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत जहां परती जमीन में फलदार वृक्ष लगाए जा रहे हैं, स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जलों
का टिकाऊ प्रबंधन किया जा रहा है, पेड़ों के बीच की जमीन में रबी व खरीफ फसल लगाए जा रहे हैं। साथ ही पशुपालन और चारा उत्पादन जैसे प्रयास भी चल रहे हैं। इसके साथ ही उत्पाद को बाजार से जोडऩे के लिए कई एजेंसियों को आमंत्रित किया गया है जो किसानों के उत्पाद गांव में खरीद लेते हैं। विकास भारती विशुनपुर की ओर से क्षेत्र के सैकड़ोंं ग्रामीणों को विभिन्न कलाओं व प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। अशोक भगत व केबीके के वैज्ञानिक डा. संजय सिंह कहते हैं कि राज्य में जड़ी-बुटी के उत्पादन का उपुयक्त वातावरण है। इसे अभियान के रूप में चला सूबे को ग्रामीणों को नई आर्थिक आजादी दी जा सकती है।

इस मैराथन में कोई पुरस्कार नहीं

दुमका और रांची की दसियों चक्कर लगा चुका है शिबू पूजहर। हर बार नए इरादे के साथ राजधानी की गलियों की खाक छानता है। जेब खाली होते ही घर वापस। यह भाग-दौड़ बेमतलब नहीं... न ही इरादा लिम्का या गिनीज बुका ऑफ वल्र्ड रिकार्ड में नाम दर्ज कराना है। दो वर्षों से जारी इस  मैराथन के निशाने पर कुछ है... तो वह है एक अदद नौकरी।
13 अक्टूबर 2008 को राज्य सरकार ने जब एक संकल्प जारी कर लुप्तप्राय जनताति के स्नातक युवक-युवतियों को जिलास्तरीय तृतीय वर्ग के पदों पर सीधी नियुक्ति का फरमान जारी किया तो शिबू जैसे कई युवक-युवतियों के ख्वाबों को पर लग गए। लगे भी क्यों न, सदियों से मानवीय विकास के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े शिबू के दर पर अवसर ने पहली बार दस्तक जो दी थी। सरकारी संकल्प की जानकारी मिलते ही शिबू रांची पहुंचा और नौकरी के लिए कल्याण विभाग में आवेदन जमा करा दिया। प्रक्रिया के बाद 9 अक्टूबर 2009 को कल्याण विभाग ने बोकारो के उपायुक्त को पत्र संख्या 166/2008-क-2408 के माध्यम से तीन युवतियों व एक युवक का नाम नौकरी के लिए अनुशंसा कर भेजा। इनमें दो युवतियों को नियुक्ति भी मिली। वे काम भी कर रही हैं, लेकिन शिबू पूजहर और उषा कुमारी को अब तक नौकरी नहीं मिली। कारण बताने को कोई तैयार नहीं, बेचारा शिबू तब से ही पैसे जुगाड़ कभी बोकरो तो कभी रांची के बाबुओं के दफ्तर का चक्कर काट रहा है। हर बार एक ही जवाब मिलता है जाओ काम हो जाएगा... लेकिन कब... इंतजार है शिबू को इस जवाब का।

Sunday, March 6, 2011

बोर्ड-एजेंसी के बीच पिस रहे उपभोक्ता

गजब कहानी
-एजेंसियों की स्पॉट बिलिंग पर कई सवाल
 झारखंड राज्य विद्युत बोर्ड एजेंसियों को स्पॉट बिलिंग का काम सौंप निश्चिंत हैं, खामियाजा उपभोक्ता भुगत रहे।
एजेंसी की निष्क्रियता के कारण विद्युत बोर्ड को रांची सर्किल में जनवरी में आठ करोड़ का नुकसान हो चुका है, फरवरी में यह दस करोड़ तक जाने की संभावना है। बोर्ड ने खुली निविदा द्वारा रांची और दुमका में स्पॉट बिलिंग का काम बिजनेस इनफॉरमेशन प्रोसेस सर्विसेज (बिप्स), नोएडा और जमशेदपुर व धनबाद का कार्यादेश स्टर्लिंग ट्रांसफार्मर को दिया था। शर्त के अनुसार दोनों एजेंसियों को आदेशित मूल्य का पांच प्रतिशत सिक्यूरिटी मनी कैश या बैंक ड्राफ्ट के रूप में जमा करना था। दस प्रतिशत परफार्मेंस बैंक गारंटी के रूप में बोर्ड के पास एग्रीमेंट के 15 दिन के अंदर देना था। दोनों ही एजेंसियां इसमें विफल रहीं। लेकिन, उन्हें अभयदान देते हुए 28 फरवरी, 2011 तक राशि जमा करने को कहा गया। अन्यथा, पुनर्निविदा की चेतावनी दी। बिप्स ने काफी हील-हुज्जत के बाद सिर्फ रांची सर्किल के लिए 25 लाख सिक्यूरिटी मनी व 50 लाख परफार्मेंस बैंक गारंटी के रूप में जमा कराया। दुमका के लिए 48 लाख रुपये की राशि जमा करने में एजेंसी ने असमर्थता जता दी। अब बिप्स रांची में स्पॉट बिलिंग का काम कर रही है। वहीं स्टर्लिंग ट्रांसफारर्मर ने जमशेदपुर में काम शुरू कर दिया, लेकिन अभी तक 48 लाख रुपये की सिक्यूरिटी मनी व परफार्मेंस बैंक गारंटी जमा नहीं कराया। स्टर्लिंग ने धनबाद में काम करने से साफ मना ही कर दिया। इसका नुकसान बोर्ड को तो उठाना पड़ ही रहा, उपभोक्ता अलग परेशान।
शर्तों का पालन नहीं
1. निविदा के अनुसार एजेंसियों को मीटर रीडिंग और बिलिंग के लिए अपने कर्मचारी रखने थे।
2. कर्मचारी फोटोयुक्त यूनिफार्म में होंगे, जिसपर उनका नाम व फोन नंबर लिखा होगा।
3. कर्मचारी के पहचान पत्र विद्युत बोर्ड के संबंधित अधिकारी व एजेंसी के मुख्य प्रभारी द्वारा अभिप्रमाणित होगा।
4. प्रत्येक माह के 14 तारीख तक मीटर रीडिंग का काम हो जाना चाहिए।
5. रीडिंग व बिलिंग के एकत्रित डाटा दूसरे दिन दस बजे तक इंटरनेट पर डाल दिया जाना चाहिए।
मिल रही शिकायत
डोरंडा नार्थ आफिस पाड़ा और साउथ आफिस पाड़ा व हिनू के शुक्ला कॉलोनी, किलबर्न कॉलोनी सहित कई अन्य इलाकों में स्पॉट बिलिंग के नाम पर एजेंसी का कर्मचारी उपभोक्ताओं की मीटर रीडिंग व फोटोग्राफी कर चला आया। उपभोक्ताओं को बिल स्पॉट पर नहीं दिया गया। करीब दस दिन बाद स्पॉट बिलिंग मशीन से बिल निकाल घरों में पहुंचा दिया गया।
बिल गाथा
-तुपुदाना के सत्यम फ्लोर मिल को दिसंबर में कंज्यूमर नंबर एचकेएलटी/ एचके 6109 से 134313 रूपये का बिल मिला। बिल में 35890 यूनिट का उपभोग दर्शाया गया है। शिकायत करने पर इसे हाथ से सुधार कर 34,861 कर दिया गया।
-सिल्ली के कंचन कंज्यूमर नंबर एसएम 04/ एस916 का कनेक्शन दिसंबर 2010 में काट दिया गया था। अब उसे रनिंग उपभोक्ता बता दिया गया।
-सिल्ली के बिरेंद्र नाथ रजक के कंज्यूमर नंबर एसएम 07/ एस1462 कनेक्शन पर यूनिट उपभोग शून्य दिखाते हुए 5528 रूपये का बिल भेज दिया गया है।

Friday, March 4, 2011

गंभीर है इस चुप्पी की गूंज

 राजधानी के ठीक नाक के नीचे (लापुंग थाना क्षेत्र के जरिया मंगराटोली व पतराटोली) तस्कर छह सौ सखुआ के पेड़ काट लेते हैं और कहीं कोई शोर नहीं, कोई बवाल नहीं, कोई धरना-प्रदर्शन नहीं ... आखिर हो क्या गया है हमें। अभी ग्लोबल वार्मिंग, फोरेस्ट राइट से लेकर क्लाइमेट चेंज पर भाषण देने हों तो वातानुकुलित कक्ष में विद्वता की गंगा बहा दी जाएगी, लेकिन वास्तविक मुद्दों पर जमीनी लड़ाई कठिन होती है। हां विधानसभा में संबंधित क्षेत्र के विधायक व पूर्व मंत्री ने मामला जरूर उठाया लेकिन इसमें वह ताकत व आक्रमकता नहीं झलकी जिसके लिए विधायक महोदय जाने जाते हैं, लगता है मामला कोरम पूरा करने भर का था। वैसे तो किसी क्षेत्र विशेष में पांच सौ-हजार पेड़ कट जाने का पर्यावरण पर तत्काल कोई असर नहीं पड़ता, लेकिन पेड़ों के कटने और आवाम के मौन के साथ कट मरे मानवीय संवेदना की जर्जरता उद्वेलित करती है। झारखंड में हम पानी पी पीकर जल,जंगल, जमीन की कस्में खाते हैं, उसे अपने अस्तित्व, सभ्यता-संस्कृति से जोड़ते हैं और उसपर हुए इस सुनियोजित हमले पर मौन रह जाते हैं। ये कैसी संजीदगी है...।   
झारखंड खुशनसीब है कि उसके पास देश ही नहीं दुनिया का सबसे बेहतरीन साल का जंगल है। खूबसूरती में ही नहीं गुणवत्ता में भी इसका कोई सानी नहीं। झारखंड के संदर्भ में जंगल की अहमियत कई कारणों से है। झारखंड सदियों से मृदाक्षरण का शिकार रहा है। पठारी क्षेत्र होने के कारण यहां मिट्टी की परत काफी पतली है। इस पतली परत में जो कुछ उपजाऊ है वह ऊपरी परत में ही है। शायद इसे बचाने के लिए ही प्रकृति ने घने जंगल का आवरण दिया है। यह आवरण हटा नहीं की टांड भूमि का मृदाक्षारण दोण भूमि को भी नष्ट कर देगा। पहले से ही कम कृषि योग्य भूमि का दंश क्षेल रहे सूबे के लिए खाद्यान्न समस्या और गंभीर हो जाएगा। सोचें ऐसा हुआ तो पलायन, बेरोजगारी, भूखमरी की पहले से ही खराब स्थिति का और क्या होगा। लगता है समय आ गया है जब हमें इस गंभीरता की गूंज सुननी ही पड़ेगी। वैसे एक वैज्ञानिक अध्ययन में कहा गया है कि छह साल उम्र के एक एकड़ का साल जंगल नौ टन कार्बन का अवशोषण करता है वहीं मैच्योर जंगल प्रति एकड़ 24 से 30 टन कार्बन अवशोषित करता है। अध्ययन में बताया गया है कि तीस गुण तीस मीटर क्षेत्र में छह वर्ष उम्र के अमूमन 81 पेड़ होते हैं। अब हम सहज अनुमान लगा सकते हैं कि छह सौ मैच्योर पेड़ काटे जाने का मतलब क्या है। ऐसा नहीं कि इसके कटने मात्र से अकाल पड़ जाएगा या गर्मी एकदम से बढ़ जाएगी। हां... हम अपने कार्बन अवशोषण के विकल्प कम करते जाएंगे। विकास की हर गतिविधि आज कार्बन उत्सर्जन से जुड़ी है। ऐसे में पेड़ ही वह एकमात्र मित्र हैं जो हमारे कथित विकास के इस गरल का पान करते हैं। क्या यह उनके जीवन की रक्षा किए जाने के लिए यथेष्ट कारण नहीं है। एक-दो लोगों के मारे जाने पर हम सड़क पर उतर आते हैं, मुआवजा, नौकरी और जाने क्या-क्या मांगने लगते हैं फिर इन बेजुबान दोस्तों के लिए हम थोड़ा हल्ल तो कर ही सकते हैं।

Thursday, February 24, 2011

बांस की ठूंठ से सोने का सफर

 मिसाइल मैन कलाम कहते हैं सपने देखो, महान वैज्ञानिक आइंस्टिन भी कहा करते थे, ज्ञान की तो सीमा हो सकती है कल्पना की नहीं, इसमें जरूर जिएं वह आपको कहीं से कहीं ले जा सकती है। इसे सच कर दिखाया है झारखंड के हॉकी खिलाडिय़ों ने!
साठ-सत्तर के दशक में खूंटी, तोरपा, सिमडेगा, कुरडेग, जलडेगा, पुरनापानी के गांवों में हजारों युवकों ने हाथ में बांस की ठूंठ (बांस के जड़) ले जो सपना देखा था वह आज पूरा होता जान पड़ रहा है। वह जमाना था जब देश के इस सबसे गरीब इलाके में युवकों के लिए हॉकी स्टिक सपना हुआ करता था। हॉकी स्टिक बिरलों के पहुंच में थी, तो क्या हुआ जज्बा हो तो रहें निकल आती हैं। झारखंड के जंगलों में बांस बहुतायत से मिलता है, युवकों ने बांस की जड़ को दौली-बंसली से स्टिक का रूप दे हॉकी की साधना शुरू की। आदिवासियों में साधना के प्रति निष्ठा व समर्पण का गवाह तो महाभारत भी है एकलव्य का उदाहरण कौन नहीं जानता। हाकी की साधना शुरू हुई तो परिणाम भी आने लगे। 1928 में भारत को हॉकी में पहला स्वर्ण दिलाने वाली टीम के कप्तान जयपाल सिंह मुंडा की विरासत को आगे बढ़ाते हुए सत्तर की दशक में जब सिलवानुस डुंगडुंग व मनोहर टोप्पनो भारत के लिए गेंद ले आगे बढ़ते थे, तो लोग रेडियो से चिपक जाते थे। 1980 मास्को ओलंपिक में जब भारत ने अंतिम बार ओलंपिक में हाकी स्वर्ण जीता तो उसमें झारखंड के सिलवानुस डुंगडुंग का जलवा किसे याद नहीं।
उसी याद, विरासत को आगे बढ़ते हुए अस्सी-नब्बे के दशक में झारखंडी खिलाड़ी हाकी में छा गए। नब्बे के दशक में भारतीय महिला टीम में तो छह-सात झारखंड़ी बालाएं हुआ करती थीं। सुमराय टेटे ने तो लंबे समय तक देश का नेतृत्व भी किया। हेलन सोय, सावित्री पूर्ति, अलमा गुडिय़ा, एडलिन केरकेट्टा, मसिरा सुरीन जब गेंद ले हवा में उड़ती थीं तो झारखंड की हजारों युवतियों के ख्वाब को पंख लग जाते थे। उसी का परिणाम है कि आज असुंता लकड़ा, पुष्पा प्रधान, अनारिता केरकेट्टा, सुभद्रा प्रधान जैसे कई खिलाड़ी राष्ट्रीय टीम का प्रतिनिधित्व करती हैं। एक अरसे बाद 2001 में जब भारत ने जूनियर विश्व कप हाकी प्रतियोगिता जीता तो झारखंड के बिमल लकड़ा ने महती भूमिका निभाई। बांस के ठूंठ से शुरू हुई साधना ने न सिर्फ ख्वाब पूरे किए, समृद्धि भी दिलाई, साधन भी। अब गांवों में भले ही बांस की ठूंठ के स्टिक न दिखें लेकिन आज राष्ट्रीय खेल में झारखंड महिला-पुरुष दोनों वर्ग में जो सोने की जंग लड़ेगा वह इस विरासत को ही सलाम होगा। राष्ट्रीय खेल के इतिहास में पहली बार झारखंड की महिला और पुरुष टीम शनिवार को अपने चीर प्रतिद्वंद्वी से हरियाणा और पंजाब से सोने की जंग लड़ेंगे। इसके पूर्व के दो राष्ट्रीय खेल में झारखंड महिला टीम सोने की जंग हरियाणवी बालाओं से हार चुकी है, जबकि पुरुष टीम ने पहली बार फाइनल में जगह बनाया है। मैदान अपना, अपने लोग, मौका भी है, विरासत भी, जज्बा भी तो फिर चुकना कैसा चक दे झारखंड। 

Sunday, February 20, 2011

स्टिक से दिलों पर राज कर रहे लकड़ा, भेंगरा, टोप्पो

एक जमाना था जब हाकी में पंजाब-हरियाणा का जादू सिर चढ़ कर बोलता था। सोढ़ी, गिल, सिंह हाकी के पर्याय हुआ करते थे। लगता है अब वो जमाना बदल गया है, अब झारखंड हाकी का सार्थक पर्याय कर उभर रहा है। 34वें राष्ट्रीय खेल के हाकी प्रतियोगिता में भाग ले रहे आठ टीमों में पांच टीमें  ऐसी हैं जिसमें झारखंड के आदिवासी लड़के-लड़कियां अपना जलवा दिखा रहे हैं। झारखंड ही नहीं उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और सर्विसेज की टीम में कई टोपनो, भेंगरा, लकड़ा, खेस, एक्का, मिंज नामधारी झारखंडी युवक-युवतियां अपना जलवा बिखेर रहे हैं। तभी तो 1980 ओलंपिक में स्वर्ण जीतने वाले भारतीय टीम के प्रमुख खिलाड़ी रहे खूंटी के सिलवानुस डुंगडुंग कहते हैं कि झारखंडी खिलाड़ी के बिना भारतीय हाकी की कल्पना भी नहीं की जा सकती। सिलवानुस कहते हैं हाकी राष्ट्रीय खेल है यह तभी लगता है जब हाकी झारखंड में खेली जा रही हो।
34वें राष्ट्रीय खेल में भाग ले रही झारखंड महिला टीम में तो 18 में से 16 खिलाड़ी झारखंडी आदिवासी मूल के हैं ही उड़ीसा की टीम में कोच सहित सारे खिलाड़ी झारखंडी नामधारी हैं। वैसे उड़ीसा के कई जिले आदिवासी बहुल हैं और झारखंडी आदिवासी सभ्यता-संस्कृति के पोषक-वाहक हैं। झारखंड का कमान अशुंता लकड़ा व बिमल लकड़ा नामक भाई-बहनों के हाथ है। वहीं उड़ीसा महिला टीम की कमान रीना कांति एक्का के हाथ है तो पुरुष टीम की कमान दिलीप केरकेट्टा के हाथ। उत्तर प्रदेश महिला हाकी टीम में भी अंजना बारला, अनिमा सोरेंग व मुक्ता पूर्वा बारला अपना जलवा दिखा रही हैं। उसी तरह पुरुष वर्ग में झारखंड, उड़ीसा के सारे खिलाड़ी झारखंडी मूल के हैं तो सर्विसेज के कप्तान इग्नेस तिर्की सहित चंद्रशेखर खलखो, राजेश लकड़ा, एलीजेर लकड़ा व मुकेश लकड़ा सभी झारखंडी मूल के हैं जबकि दिल्ली की टीम में बनमाली खेस झारखंड का झंडा बुलंद किए हुए हैं। मजे की बात यह कि झारखंडी खिलाड़ी जिस किसी भी टीम का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं उस टीम के सर्वश्रेष्ठ खिलाडिय़ों में उनकी गिनती होती है।

Friday, February 11, 2011

ये काले लोग ...


 राष्ट्रीय खेल एक ओर, इसकी चमक-दमक निरस और बेमानी। ताम-झाम, रंग-रोगन सब दिखावा। नाइंसाफी, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद के कारण समुचित अवसर से वंचित नौजवान भटके से, विपथगा, मांग रहे इंसाफ की रोशनी, जबकि सूबे में बड़े ओहदों और पदों पर बैठे काले लोगों की कालिमा इतनी गहरी कि कोई भी चकाचौंध फीका हो जाए।
जेपीएससी अध्यक्ष दिलीप प्रसाद के बहाने साफ-सफेद कपड़ों में शिष्ट-सभ्य भाषा बोलने वालों की जो 'काली कहानीÓ उभरी उसने 'इन काले लोगोंÓ की कालिमा की गहराई भी सार्वजनिक कर दिया। एक तो इतने विशिष्ट पद तक पहुंचने, बने रहने की कहानी काली, उसपर अंजाम दिए कारिस्तानियों की उससे भी गहरी कालिख, और अब पकड़े जाने, घिर जाने पर नहीं जानते हैं, मालूम नहीं, फलां नेता के दबाव में किया, याद नहीं जैसे साजिशी जवाब की और भी गहरी कालिमा। इन महानुभावों ने सब कुछ काला, बेहद गहरा काला कर दिया की अब रोशनी में भी नौजवानों को धोखे का आभास होने लगा है। मजे की बात इस 'काला महापुराणÓ के  कई पात्र ही अब राष्ट्रीय खेल के बहाने रोशनी की बात करने लग पड़े हैं। सुदेश के भाई साहब अब डीएसपी नहीं रहे, राधाकृष्ण किशोर के भाई भी अब डीएसपी नहीं, ऐसे ही कितने ही महानुभावों के भाई-बहन, दोस्त-यार अब चिन्हित कर बीडीओ, सीओ के पद से हटाए जा चुके हैं। बावजूद इसके अब भी कुछ ऐसे भाग्यशाली हैं जो 'मौज काटÓ रहे हैं। सभी जानते हैं कि इन्हें सफल बनाने के लिए किसने क्या किया होगा, किसने किसे प्रभावित किया होगा, किसने किसे क्या दिया होगा। कितने ही युवाओं का ख्वाब-सपना छीन उन्हें अवसाद की ओर धकेलने वाले ये महानुभाव ही अब रोशनी की बात करेंगे तो भला कौन प्रेरित होगा, कौन विश्वास करेगा।
दिलीप कुमार ने जो कुछ किया, उससे सभी अवगत हैं अब निगरानी पूछताछ में बेशर्मी यह कि मैं कुछ नहीं जानते, फलां नेता के कहने पर किया, तो फलां के दबाव में किया। यह किसी शिक्षक की नहीं, साजिशों से भरे एक आपराधिक दिमाग की हरकत है। एक अध्ययन-अध्यापन, चिंतन-मनन से जुड़ा व्यक्ति तो ऐसे आरोप लगते ही पर गड़ मरे, पर आपराधिक दिमाग इसमें भी खुद को निर्दोष बताने की साजिश में व्यस्त, पहले यहां-वहां भागे-भागे फिरे, जब कोई चारा नहीं रहा तब सरेंडर तो किया लेकिन कहा मैं निर्दोष, सब कुछ इसने या उसने किया-कराया।
वाह भाई वाह! क्या दिमाग है, हो भी क्यों नहीं झारखंड लोक सेवा आयोग के सदस्य जैसे प्रतिष्ठित पद पर बहाल होने के लिए सेटिंग-गेटिंग जैसे साजिशी दिमाग को ही तो योग्यता माना जाता है। तभी तो एकेडमिक उपलब्धि शून्य रखने वाला किसी गोपाल, किसी  शांति, किसी राधा-गोबिंद की लीला सीधी राह चलने वालों को नचाने में सफल हो जाता है। तभी तो महती एकेडमिक उपलब्धि वाले तपे-तपाये व्यक्तित्व के धनी किनारे बैठे रह जाते हैं और हर दरवाजे सर झुकाने वाले माननीय बन बैठते हैं। जब तक ऐसे लोग माननीय बनते रहेंगे, तब तक दिलीप, शांति, गोपाल आते रहेंगे। फिर कहां रोशनी, इसकी बात ही बेमानी, काले साम्राज्य के काले मसीहा ही लिखेंगे नई कहानी। 

Sunday, February 6, 2011

आना कार्डिनल कॉरमैक मर्फी का ...

पोप जॉन पॉल द्वितीय के रांची आगमन के 25वें वर्षगांठ पर कॉरमैक कार्डिनल मर्फी ओ-कोनोर का दौरा कई मायनों में खास रहा। पंचायत चुनाव के बाद आदिवासियों के मुद्दे के बहाने धर्म का सामाजिक सरोकार एकदम से छलक कर सामने आ गया।  वैसे रांची धार्मिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र है। सभी धर्मों के छोटे-बड़े गुरुओं का आना साल भर लगा रहता है, धार्मिक सत्संग-प्रवचन चलते रहते हैं। इन सबके बीच हाल के वर्षों में गुरुओं के 'एप्रोचÓ में जो सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिला वह है 'धर्म के बदलते और निरंतर स्थानीय होते सामाजिक सरोकार काÓ। वैसे हर काल में विभिन्न धर्मों में ऐसे प्रगतिशील गुरु रहे हैं जिन्होंने धर्म के सामाजिक सरोकार को सघन-सक्रिय करते हुए सामाजिक परिवर्तन को दिशा दिया।
ग्लोबलाइजेशन या आर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय सामाजिक-आर्थिक परिवेश में जिस तेजी से परिवर्तन हुआ उसी तेजी से विभिन्न विषमताएं भी उभरीं। झारखंड के परिप्रेक्ष्य में उग्रवाद, भ्रष्टाचार, पलायन, जमीन के लिए संघर्ष सबसे अहम मुद्दे बन कर उभरे। आज से कोई दो साल पहले जब श्रीश्री रविशंकर रांची पधारे तो उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर नक्सलियों से सीधे संपर्क का प्रस्ताव दिया। बाद के समय में इस दिशा में क्या कुछ हुआ स्पष्ट नहीं लेकिन एक वैचारिक पहल तो शुरू हो ही गई। योग गुरू स्वामी रामदेव ने भ्रष्टाचार के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर मुहिम छेड़ रखा है। जैन मुनी सागर ने अपने चर्तुमासा के दौरान जैनियों के सामाजिक सरोकार को नया आयाम देने पर बल दिया।
कहने का मतलब यह कि धार्मिक गुरु शिक्षा, सेवा जैसे पारंपरिक मुद्दों के इतर 'सेक्यूलर मुद्दोंÓ पर खुलकर सामने आ रहे हैं। उनके प्रो-एक्टिव स्पोर्ट ने जहां इन विषयों को सघन संवाद का विषय बना दिया वहीं किसी न किसी स्तर पर संस्थागत कार्य भी शुरू हुआ। कार्डिनल मर्फी ने चर्च के सामाजिक सरोकार में आदिवासियों के दर्द को आवाज देने व विभिन्न चुनौतियों के बीच स्थानीय पहचान बनाए रखने की जो बात कही, उसका काफी महत्व है। खासकर झारखंड में चर्च के विभिन्न समर्पित संगठनों के नेटवर्क को देखते हुए कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों में निश्चय ही आदिवासियों के लिए सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र में कई सकारात्मक पहल होंगे।

Saturday, February 5, 2011


अब किस राह चले राजू ....
 उम्र के अधेड़पन के प्रारंभ वाले पड़ाव पर खड़ा राजू एक बार फिर जिंदगी की नई राह चुनने के उधेड़बुन में फंसा है। समझ नहीं आ रहा किस राह चले, फिर कुछ नया करे या फिर उधर ही ...। कुछ नया करने के लिए न तो उसके पास पैसा है न ही जवानी वाला वह जोश। बार-बार स्कूल जाने वाले अपने दोनों बच्चों को देखता है और मजबूरी, लाचारी, बेचारगी में दांतें पिसता है।
आज से कोई सोलह साल पहले की बात है, राजू लोहरा उस समय 24 चाल का गबरू जवान था, लंबा डील, गहरा सांवला रंग, मजबूत काठी और अक्कड़ स्वभाव ने उसे खुद ही ग्रुप लीडर बना दिया था। गरीब आदिवासी परिवार के इस युवक का सामना जब दुनियादारी से हुई तो वह खुद में कई कमी महसूस करने लगा। लेकिन जरूरतें कब मानने वाली थीं, बीमार मां को दवा चाहिए था, बाप को दारू तो जवान बहनों को ब्याहने की जिम्मेदारी। सबने राजू को नौकरी के लिए इस-उस दरवाजे दौड़ाना शुरू किया। एक दुकान में पंद्रह सौ रुपये महीने की नौकरी मिली लेकिन यह जरूरत के हिसाब से काफी कम था, उसपर डांट-फटकार ने उसे विद्रोही बना दिया। नौकरी छोड़ परेशानी से बचने के लिए दारू का शरण लिया। फिर पता नहीं कब छिना-झपटी, चोरी-चकारी की ओर पैर बढ़ गए। इसी बीच खून के इलजाम में राजू गिरफ्तार हो गया। वहां से निकला तो अब क्या करें... वाला प्रश्न फिर सामने था। दो-चार दिन सोचने-विचारने के बाद डिस्टलरी पुल के ऊपर मुर्गा बेचने का काम शुरू किया। धंधा चल निकला, बहानों की शादी की, मां मर गई कुछ दिनों बाद बाप भी चल बसा। बहनों ने भौजाई ढ़ूंढ़ शादी करा दी। बाल-बच्चे हुए, बढ़े और स्कूल भी जाने लगे, राजू को पता ही नहीं चला इन सब में बारह-चौदह साल कैसे गुजर गए। जिंदगी मजे से पटरी पर दौड़ रही थी, राजू भी संतुष्ट था, जिंदगी सेटल लग रही थी। अचानक एक दिन अतिक्रमण हटाओ अभियान के तहत उसकी दुकान हटा दी गई। पिछले दस दिनों से ब्रिकी-बट्टा नहीं होने से पास की जमा पूंजी खर्च हो गई। राजू डरा हुआ है अब क्या होगा। अब वह क्या करे...। निराश राजू कहता है कि भैया बहुत परेशान हूं, कुछ समझ नहीं आ रहा है, क्या करें, बच्चों को स्कूल जाने से रोक नहीं सकता, अगर कुछ रास्ता नहीं निकला तो लगता है फिर वही करना पड़ेगा।

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उच्च न्यायालय के आदेश पर अतिक्रमण हटाओ अभियान तेजी से चल रहा है। इससे शहर में ताजगी और तरावट तो आई है। सड़कें खुली-खुली लग रही हैं, लोग बड़ी राहत महसूस कर रहे हैं। पहली बार बिना किसी भेदभाव, बड़े-छोटे सभी पर चल रहा अतिक्रमण का डंडा। इन सारी उपलब्धियों के बीच ऐसे 'राजूÓ भी हैं जिनके सामने 'नया रास्ताÓ चुनने की जिम्मेदारी आन पड़ी है। उन्हें जरूरत है उचित मदद और मार्गदर्शन की वरना शायद कोई राजू फिर उसी राह चल पड़ेगा।

Friday, February 4, 2011

उग्रवाद की ताबूत में अंतिम कील

25 साल पहले पोप जॉन पॉल द्वितीय जब रांची आए थे- न झारखंड था, न उग्रवाद। अगर कुछ था, तो शोषण, उपेक्षा व असमान अवसर के खिलाफ जबर्दस्त जनांदोलन। ऐसे में परिस्थितयों के मद्देनजर उन्होंने 'श्रम की महिमाÓ की चर्चा कर लोगों को प्रेरित किया था। आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। झारखंड का सपना तो साकार हुआ, लेकिन जनाकांक्षा में उभार व संवैधानिक मशीनरी की बेबसी ने उग्रवाद को जाना-पहचाना शब्द बना दिया। पोप की यात्रा की जब 25वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है, पंचायत चुनाव के बूते उग्रवाद की ताबूत में अंतिम कील ठोंकने के संदेश से लोगों में विकास की नई उम्मीद जग रही है।
आदिवासियों के लिए नई प्रवृत्ति
उग्रवाद पर बहस की शुरुआत करते हुए पश्चिम बंगाल के पूर्व प्रधान महालेखाकार बेंजामिन लकड़ा ने कहा, आदिवासियों के बीच उग्रवाद नई प्रवृत्ति है। अपनी सादगी, ईमानदारी व परिश्रमी स्वभाव के बावजूद लगातार शोषण, पलायन ने आदिवसियों को विकास से दूर रखा। अब उनके जल,जंगल जमीन पर आक्रमण कर उनके अस्तित्व को चुनौती दी गई है। कई आदिवासी भाषाएं मर गईं, गांवों-शहरों में आदिवासी चेहरा लाचारगी-बेचारगी का पर्याय बना हुआ है। ऐसे में अस्तित्व रक्षा के लिए आदिवासी उग्रवाद की ओर उन्मुख हो रहे हैं। स्वशासन के हामी आदिवासियों को अब पंचायत चुनाव से जो बल मिला है, उससे उग्रवाद समाप्त होगा, क्योंकि अनेक को मतदाताओं के सामने हाथ जोडऩे के लिए बंदूक त्यागते हम देख चुके हैं।
वैचारिक शुरुआत शुभ
 पंचायत चुनाव से ऐसी ही अपेक्षा प्रसिद्ध समाज विज्ञानी व एक्सआईएसएस के निदेशक डा. एलेक्स एक्का ने भी जताई। पंचायत चुनाव को अद्वितीय अवसर बताते हुए इन विद्वानों के सुर में अन्य कई सुर मिले। सबसे बढ़कर पोप के विशेष दूत के आशीर्वाद से उग्रवाद की ताबूत में अंतिम कील ठोंकने की वैचारिक शुरुआत तो हो ही गई। झारखंड में आदिवासियों की हालत पर चिंता जताते हुए पोप बेनेडिक्ट-16 के विशेष दूत कार्डिनल कॉरमेक मर्फी ओ कोनोर ने चर्च से सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत आदिवासियों के मुद्दे उठाने पर सहमति जताई। कार्डिनल ने कहा कि आदिवासियों की बातें यदि चर्च नहीं करेगा तो कौन करेगा। कलीसिया द्वारा आदिवासियों की बातें करने पर प्रसन्नता जताते हुए संपोषी विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) को आदिवासी अस्मिता के लिए आवश्यक बताया। आदिवासियों से जल, जंगल जमीन लिए जाने व विकास की अवरुद्ध धारा को सार्वजनिक चिंता का मुद्दा बताते हुए कहा कि नए विषयों पर चर्च  सामाजिक दायित्व के तहत काम करेगा।

Sunday, January 30, 2011

कई एनकाउंटर के महारथी हैं डीएसपी अश्विनी

 लातेहार के लुहूर गांव में शुक्रवार अहले सुबह झारखंड पुलिस ने अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि हासिल की। न सिर्फ नौ नक्सलियों को मौके पर मार गिराया, उनके शव और बड़ी संख्या में हथियार भी बरामद किए। अभियान के दौरान मौत और जिंदगी में काफी करीबी फासला था। पूरे अभियान में बेहद सक्रिय भूमिका निभाने वाले रांची निवासी एसडीपीओ अश्विनी कुमार सिन्हा ने बताया कि पुलिस को कोई नुकसान नहीं होने के पीछे अच्छी रणनीति, सावधानी और भगवान की कृपा रही। 2000 में बीपीएससी से डीएसपी बनने के बाद हमेशा उग्रवाद प्रभावित जिलों में रहने वाले अश्विनी बताते हैं कि इन जिलों में सफलता के लिए योजना, सावधानी और स्थानीय परिस्थिति के अनुकूल तत्काल निर्णय जरूरी होता है। दस साल के करियर में अब तक उन्होंने दस से ज्यादा बड़े एनकाउंटर में भाग लिया है। इसकी शुरूआत 16 मार्च 2001 में सिवान के सांसद शहाबुद्दीन के खिलाफ हुआ था। सांसद के गांव प्रतापपुर में हुए इस मुठभेड़ में नौ अपराधी मारे गए थे, और शहाबुद्दीन के खौफ का साम्राज्य टूटा था। इसके बाद, जनवरी 2002 में रोहतास के गायघाट खोई में नक्सलियों के बड़े ट्रेनिंग कैंप को धवस्त किया गया। मई 2003 में झारखंड कैडर मिलने के बाद इसी वर्ष अगस्त में हुसैनाबाद के सीताचुआं, 2005 में झुमरा पहाड़ी के अभियान में इनके नेतृत्व में बड़ी सफलता प्राप्त की गई। 2009 में बरवाडीह केचकी गांव में अकेले दम संघर्ष कर खुंखार उग्रवादी कारगिल को पकडऩा अपने जीवन की अहम उपलब्धि मानने वाले अश्विनी कुमार की शिक्षा स्थानीय सेंट जॉन्स स्कूल और सेंट जेवियर्स कॉलेज में हुई है।

Monday, January 24, 2011

दोहरे व्यक्तित्व से उच्च शिक्षा का बेड़ा गर्क

उच्च शिक्षण संस्थानों में पद पर बने रहने के लिए दोहरे व्यक्तित्व वाले लोगों की भरमार हो गई है। ऐसा ही ताजा उदाहरण इस्लामी शिक्षण संस्था 'दारुल उलूम देवबंदÓ के नए कुलपति मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी ने प्रस्तुत किया है। कुलपति बनते ही उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की काफी प्रशंसा की कहा, मोदी के राज्य में काफी तेजी से विकास हो रहा है और इसका लाभ मुसलमानों को भी मिल रहा है। गुजरात सरकार की नौकरियों में भी मुसलमानों को स्थान मिल रहा है। अब इस ब्यान का जैसे ही देवबंद के छात्रों ने विरोध किया 'विद्वानÓ मौलाना वस्तानवी साहब पलट गए। छात्रों ने वस्तानवी के इस्तीफे की मांग की है। वस्तानवी ने देवबंद पहुंच कर अपने पूर्व के बयान पर सफाई देते हुए कहा कि मोदी को खुदा भी माफ नहीं करेगा। बावजूद इसके छात्रों का गुस्सा कम नहीं हो रहा वे वस्तानवी से इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।
वस्तुत: वस्तानवी को इस्तीफा दे देना चाहिए। दोहरे चरित्र के ऐसे लोगों को उच्च्च शिक्षा के उच्च्च पदों पर बैठने से वैचारिक भ्रष्टाचार बढ़ेगा। जो व्यक्ति अपने मूल विचार पर दृढ़ नहीं रह सके वह भला नौजवानों को चारित्रिक दृढ़ता की शिक्षा कैसे देगा।

Saturday, January 22, 2011

रांची से जुड़ा है नेताजी का महाप्रयोग

नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय जनमानस में बिल्कुल अलग क्रांतिकारी, अध्यात्मिक, प्रगतिशील और सर्वसमावेशी छवि से जाने-पहचाने जाते हैं। उनकी प्रखरता ने देश को काफी कुछ दिया। 1939 में गांधीजी से मतभेद के बाद जब उन्होंने फारवर्ड ब्लॉक के स्थापना का मन बनाया तो इसके चिंतन प्रक्रिया में रांची की माटी का अहम योगदान रहा। फारवर्ड ब्लाक की स्थापना हो या फिर देश से बाहर निकल स्वतंत्रता के लिए आजाद हिंद फौज के गठन जैसा राजनीतिक महाप्रयोग, सभी में झारखंड की माटी का योगदान रहा। दीगर रहे कि देश से बाहर निकलने के लिए नेताजी कोलकाता से धनबाद पहुंचे थे। गोमो रेलवे स्टेशन से ट्रेन पकड़ नेताजी जो गए तो फिर लौट कर नहीं आए। वहीं रामगढ़ अधिवेशन में 'फारवर्ड ब्लॉकÓ की स्थापना करने नेताजी का काफीला रांची से ही निकला था। तब नेताजी रांची के डा. फणींद्र नाथ चटर्जी की नई फीएट रोल्स बीआरएन-70 पर सवार हो रामगढ़ पहुंचे थे। फूलों से सजी गाड़ी खुद डा. फणींद्र नाथ चला रहे थे उसमें नेताजी के साथ यदुगोपाल मुखर्जी और उनके एक दो करीबी बैठे थे। फारवर्ड ब्लाक की रूप रेखा तैयार कर लेने के बाद सुभाष बाबू कोलकाता से जमशेदपुर, तमाड़, बुंडू, खूंटी होते रांची पहुंचे थे। यहां उनका जोरदार स्वागत हुआ। रांची में उनके प्रमुख सिपहसलार यदुगोपाल मुखर्जी (रांची के प्रसिद्ध चिकित्सक डा. सिद्धार्थ मुखर्जी के पिता) थे। यदुबाबू खुद बंगाल में सक्रिय क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति के सक्रिय सदस्य थे। अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण अगस्त 1928 में बंगाल से निष्कासित होने के बाद उन्होंने रांची में अपना ठिकाना बनाया। क्रांतिकारियों के प्रति सहानुभूति के कारण नेताजी की यदुगोपाल मुखर्जी से घनिष्ठता थी। यदु बाबू की प्रखर राजनीतिक समझ के कारण नेताजी प्राय: उनसे राजनीतिक विमर्श भी किया करते थे।
12 फरवरी 1938 में कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद महात्मा गांधी से कई बिंदुओं पर उनकी असहमति रही। फलत: गांधीजी ने अध्यक्ष के तौर पर उनके दूसरे कार्यकाल का विरोध किया और अपने निकटस्थ पट्टाभी सीता रमैया को उनके खिलाफ खड़ा कर दिया। गांधी जी के खुले समर्थन के बावजूद नेताजी ने रमैया को हरा दिया। लेकिन इसके बाद उनके लिए कांग्रेस के अंदर काम करना आसान नहीं रहा। उन्होंने अलग पार्टी बनाने की ठान ली। इस विचार को अंजाम देने के पूर्व नेताजी यदुगोपाल मुखर्जी से मिले। बकौल यदुगोपाल के पुत्र डा. सिद्धर्थ मुखर्जी नेताजी ने उनके पिता से कहा कि गांधी जी भारतीय राजनीतिक जागरण के मुख्य आधार हैं मेरा उनसे कोई विरोध नहीं हमारे उद्देश्य समान है लेकिन रास्ते अलग हो रहे हैं। 22 मार्च 1938 में भी उन्होंने कोलकाता से पत्र लिख यदु बाबू को विचार विमर्श के लिए बुलाया। कांग्रेस से इस्तीफा देने के बाद जब उन्होंने 1939 के रामगढ़ कांग्रेस में फारर्वड ब्लाक की घोषणा की उसके पूर्व कई बार उन्होंने यदुबाबू, डा. फणींद्र नाथ चटर्जी आदि से विचार विमर्श किए।