Wednesday, December 12, 2018

हिंदुत्व के मुद्दे पर उदासीनता से डूबी भाजपा की नैया



पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में हिंदी भाषी तीन राज्यों में भाजपा की हार ने एक बात स्पष्ट कर दिया कि ईमानदार छवि, कर्मठता और विकास भारतीय राजनीति में लोकतांत्रिक जीत की गारंटी नहीं। इस चुनाव में भाजपा को हार विपक्षियों के कारण नहीं बल्कि खुद के नेतृत्व के नीतिगत ऊहापोह के कारण मिली। विकास किसी भी सरकार का मुख्य एजेंडा होता है, हर सरकार अपने-अपने ढंग से विकास योजनाएं लागू करती है। हर कोई अपने विकास को सर्वश्रेष्ठ और सबसे तेज बताता है चाहे जमीनी हकीकत कुछ भी हो। कुछ लोग इसी में जीने-खाने, सुख-समृद्धि के सपने भी साकार करते हैं, भारत में विकास कार्यों में भ्रष्टाचार वास्तव में हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अहम हिस्सा है मोदी ने इसे चुनौती देने की भूल कर कई विरोधी बना लिए। पार्टी यी भूल गई कि सबका विकास तो अहम है लेकिन इससे सबका साथ नहीं मिलता।
यह हार का एक कारण तो रहा ही लेकिन सबसे अहम कारण हिंदुत्व के मुददे पर सरकार की ऊहापोह की नीति रही। लगातार जीत के लिए जनवादी मुद्दों के साथ मजबूती से खड़े होना भी काफी अहम है। मोदी 2014 में जब एक राज्य के मुख्यमंत्री से आगे निकल राष्ट्रीय फलक पर उभरे तो उन्हें लोगों ने महज विकास के कारण नहीं बल्कि हिंदुत्व के मजबूत पक्षकार के रूप में अपना समर्थन दिया। उनकी चुनाव सभाओं में उमडऩे वाली भीड़ उनमें एक हिंदू हीरो की छवि देख रही थी। मोदी इस अपेक्षा से अनभिज्ञ भी नहीं थे लेकिन उन्होंने जन आकांक्षा को विकास से नजरंदाज करने की कोशिश की। लोगों का मोदी पर इतना विश्वास था कि उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि मोदी राम मंदिर जैसे मुद्दे को दरकिनार कर देंगे। राम मंदिर करोड़ों हिंदुओं के लिए जीवन मारण का सवाल है। यह महज एक आंदोलन नहीं देश और हिंदुत्व की पहचान है। इस धोखे से लोग तिलमिला गए वहीं विपक्षी अपने नरम रवैये से इस बेहद संवेदनशील मुद्दे पर हिंदुओं में भ्रम फैलाने और खुद को कम से कम इस मामले में मोदी के समकक्ष दिखाने में सफल रहे। कांग्रेस तो यह कहने तक की हिम्मत कर गई कि राम मंदिर कोई मोदी नहीं कांग्रेसी प्रधानमंत्री ही बनाएगा। सरकार इस बेहद अहम मुद्दे पर सफल अभियान का कोई स्पष्ट नीति प्रस्तुत करने में असफल रही। वहीं मॉब लिचिंग के आरोप में पकड़े गए हिंदुओं पर तो सरकार गरम रही लेकिन गोहत्या के आरोपियों पर कांग्रेस जैसी नरम नीति का ही पोषण करती रही। राजस्थान सरकार ने ऐसे कई ऐसे कदम उठाए जो कांग्रेसी सरकारें भी उठाने पर दस बार सोचती। प्रवीण भाई तोगडिय़ा को अपमानित करने से भी हिंदुओं के विश्वास को ठेस पहुंचा। यह किसी के गले नहीं उतरी के वर्षों से हिंदुओं की सेवा करने वाला व्यक्ति अचानक कैसे एक हिंदुवादी संगठन में हाशिए पर आ गया। वहीं देशभर में हिंदुओं पर हमले कम नहीं हुए न ही सरकार ने ऐसे हमलों पर कभी कोई कड़ी कार्रवाई की। प्रशासनिक अधिकारी हिंदुओं के प्रदर्शन पर तो लाठी भांजते रहे लेकिन अन्य समुदायों के ऐसी ही प्रदर्शन पर मौन रहे। इन सबसे बढ़कर एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के रूलिंग के खिलाफ संशोधन ने सरकार की एससी/एसटी तुष्टिकरण की जिद को सार्वजनिक कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने नैसर्गिक न्याय के मूल सिद्धांत पर फैसला दिया था। इसे पलट सरकार ने अपने मूल मतदाता वर्ग को तो नाराज किया ही बुद्धिवादी बहस में भी भाजपा की स्थिति कमजोर की। 

Thursday, December 6, 2018

आरयू छात्रसंघ चुनाव में खुला असली-नकली का भेद

प्रदेश के सबसे प्रतिष्ठित रांची विश्वविद्यालय के 2018 के छात्रसंघ चुनाव के परिणाम ने छात्र राजनीति के असली-नकली चेहरों पर से पर्दा हटा दिया है। कौन संगठन छात्रों के बीच है और कौन चौराहे पर यह स्पष्ट हो चुकी है। छात्रसंघ चुनाव में बेहद कम मतदान भी छात्र संगठनों की अनुपयोगिता दर्शाने को आतुर है। अगर छात्राओं ने बढ़-चढ़कर मतदान नहीं किया होता तो मतदान प्रतिशत और भी कम होता। इस संबंघ में विभिन्न संगठनों कोे मिले मत प्रतिशत काफी रोचक होंगे। सच मानिए अधिकतर संगठनों को 2-3 फीसद से ज्यादा मत नहीं मिला होगा। लेकिन इनकी अलोकतांत्रिक अकड़ इन्हें रणनीति और नेतृत्व पर विचार करने से जरूर रोक देगी। 
वहीं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की शानदार जीत उनके संगठन की गतिशीलता, समर्पित कार्यकर्ताओं की लंबी कड़ी और सिद्धांत की धार दिखाती है। आदिवासी छात्र संघ ने ग्रामीण व खासकर आदिवासी छात्रों के बीच अपनी पकड़ को एक बार फिर सिद्ध किया है इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में अभाविप के लिए नई चुनौती भी रेखांकित हो गई है। एनएसयूआइ, झारखंड छात्र मोर्चा, वाम दलों के छात्र संगठनों की पतली हालत ने इनके संगठन से लेकर राजनीतिक तौर-तरीके और आंतरिक लोकतंत्र पर सवाल उठा दिया है। एनएसयूआइ हो या जेसीएम इन संगठनों में वर्षों से कुछ गिने-चुने छात्र (अब तो उनका पढ़ाई-लिखाई से कोई संबंध भी नहीं) ही कार्यभार संभाल रहे हैं। नाम के लिए भले ही संगठन में अध्यक्ष या सचिव का चुनाव होता हो लेकिन जमीनी नेतृत्व इनके हाथ में नहीं होती। इनमें से कई छात्र नेताओं ने विवि, कॉलेजों की कमियों को अपनी आमदनी का भी साधन बना लिया है। ऐसे छात्रों का एक सर्वदलीय या सेक्यूलर कॉक्स विवि परिसर में हावी है। जो दबंगई भी करता है, प्राचार्य, वीसी को बंधक बनाने, घेराव करने, परीक्षा की तिथि बढ़वाने, फेल छात्रों के नंबर बढ़वाने के लिए आंदोलन करने में भी माहिर है। जबकि छात्रों के लिए अब ये विषय कूड़ा-करकट हो चुके हैं। वह गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई, लैंगिक समानता और समान अवसर पर केंद्रित राष्ट्र के लिए समर्पण की राजनीति चाहते हैं, इसी दम पर जहां एबीवीपी परचम लहरा रहा वहीं अन्य संगठन पानी भर रहे हैं। जहां आदिवासी छात्र संघ ने सफलता पाई वहां भी एबीवीपी ही अधिकतर जगहों पर मुख्य मुकाबले में रही और जेसीएम जैसी आदिवासी नेतृत्व व हित का खम ठोंकने वाले तीसरे-चौथे स्थान पर खिसक गए। वाम संगठनों ने तो मानों जहर खाने की ठान ली है। झूठे तथ्यों पर राजनीति की उनके आकाओं की आदत ने छात्र संगठनों में भी गहरी पैठ बना ली है, इसका परिणाम सामने है। शायद जेएनयू जैसे चुनिंदा विश्वविद्यालय को छोड़ दें तो ये सूक्ष्मदर्शी उपस्थिति वाले जीव बन गए हैं।
प्रवीण प्रियदर्शी

Thursday, November 8, 2018

सनातन समाज में सामाजिक-आर्थिक संघर्ष से उभरे कायस्थ

सनातन समाज में सामाजिक-आर्थिक संघर्ष से उभरे कायस्थ

प्रवीण प्रियदर्शी, रांची : भारतीय समाज संरचना को जो स्थायित्व वैदिक काल में मिला था उसे उत्तर वैदिक काल आते-आते कई चुनौतियों से मुखातिब होना पड़ रहा था। नये उद्योगधंधों और आर्थिक कार्य व्यवहार ने सामाजिक संरचना में परिवर्तन की शर्त रख दी, तो लगातार मजबूत होते राजतंत्रीय व्यवस्था के सामने अपने आर्थिक और प्रशासनिक मामलों का रिकार्ड रखना भी जरूरी हो गया। गौतम बुद्ध, भगवान महावीर जैसे विचारकों ने वैदिक दर्शन को चुनौती देते हुए सामाजिक पुनर्संरचना को अहम मुद्दा बना दिया। मगध साम्राज्य के विस्तार और मौर्यों के विस्तृत नौकरशाही में लेखा और आंकड़ों का संचयन बेहद महत्वपूर्ण हो गया था। इसी काल खंड के पौराणिक ग्रंथों, स्मृति व साहित्यिक गं्रथों में लेखकीय कार्य के लिए एक नई जाति 'कायस्थÓ का वर्णन मिलना प्रारंभ होता है।

भारतीय समाज व्यवस्था में नई हलचल 

कायस्थों का उद्भव भारतीय इतिहास में एक अजब कहानी है। इसने भारतीय समाज व्यवस्था में एक नई हलचल पैदा कर दी। वर्ण व्यवस्था के इतर महज काम, हुनर, भाषा, सहिष्णुता और प्रगतिशीलता के आधार पर एक नई जाति ही अस्तित्व में आ गई। यह भारतीय संदर्भ में बिना औद्योगिक क्रांति के एक मध्यम वर्ग के उद्भव की गाथा है। इतिहासकारों में कायस्थों की उत्पत्ति को लेकर विभिन्न मत हैं। कुछ विद्वान इन्हें विदेशी खासकर तुर्किश, कुर्द मूल का बताते हैं। इस संदर्भ में सबसे मजबूत तर्क कल्हण के राजतरंगिनी में मिलता है जिसमें कारकोटा राजवंश के राजकुमार का तुर्की व्यवसायी की पुत्री से विवाह का उल्लेख है। वहीं सक्सेना को कुछ इतिहासकार शकों की सेना के रूप में स्थापित करते हैं। श्रीवास्तव का उद्भव कुछ इतिहासकार कश्मीर के श्वात घाटी से बताते हैं। इन्हें भी शक, कुषाण मूल का माना जाता है। कुछ विद्वान इन्हें सिंधू घाटी सभ्यता के संघर्ष में बचे मृतकों के बच्चे मानते हैं। इसके पक्ष में तर्क गरुड़ पुराण के श्लोक में तलाशा जाता है जिसमें चित्रगुप्त को वेदाक्षरदायक: बताया गया है। विद्वानों का तर्क है सिंधू घाटी में लिखने की कला थी लेकिन आर्य इससे अनभिज्ञ थे। माना जाता है कि जब आर्यों के संघर्ष का रोष कम हुआ तो स्रुति को कायस्थों ने लिपिबद्ध किया। ये सिद्धांत परशुराम पराक्रम के सिद्धांत से भी मेल खाता है। जिक्र आता है जब परशुराम श्रत्रियों का नाश कर रहे थे भद्रसेन अपनी गर्भवती पत्नी को लेकर ऋषि तालाव्य के आश्रम में शरणागत हो गए। ऋषि ने उनके शरणागत होने की बात कहते हुए परशुराम को सौंपने से मना कर दिया। इसपर परशुराम ने शर्त रखी की महिला अगर पुत्र को जन्म देती है तो उसे श्रत्रिय कार्य से विमुख रख लेखन कार्य कराया जाए। वहीं औशनस स्मृति, व्यास स्मृति इन्हें ब्राहमण और जारकर्म करने वाली महिलाओं का संतति बताते हैं। याज्ञवल्क्य स्मृति इन्हें चोर-डाकुओं से भी खतरनाक बताते हुए राजा को प्रजा की विशेष सुरक्षा की व्यवस्था का आदेश देता है। पद््म पुराण में ब्रह्म के काया से उत्पन्न बता कायस्थ नाम का जिक्र किया गया है। मतलब स्पष्ट है कि इस जाति में कई देशी-विदेशी तत्व रहे होंगे। जिनमें बदलते समय की मांग के अनुसार अपने हुनर, रहन-सहन, भाषा-विज्ञान में परिवर्तन कर सफल होने का जज्बा था उनका समूह कायस्थ के रूप में स्थापित हो गया। एंथ्रोपोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया कहता है कि मौर्यकालीन अफसरशाही में ये काफी प्रभावी थे। विद्वानों के लेखन में भी साफ है कि प्रारंभिक समय में लेखकीय और वैद्य के कार्य वर्ण से बंधे हुए नहीं थे। बदलते राजनीतिक और सामाजिक परिस्थिति में जब इसकी महत्ता बढ़ी तो इन कार्यों के प्रति कई लोग आकृष्ट हुए। इसमें संभवत सभी वर्ण के लोग थे लेकिन उच्च वर्ण की बहुलता होने के कारण चित्रगुप्त को विष्णु के काया से उत्पन्न माना गया, और उन्हें कायस्थ उपाधि दी गई। संस्कृत शब्दों की संरचना के वैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर तीसरी शताब्दी के ग्रंथ माने जाने वाले याज्ञवल्क्य स्मृति में कायस्थ जाति का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। ऐसा नहीं कि इसके पहले यह वर्ग नहीं था, ये थे लेकिन सनातन समाज व्यवस्था के लिए अहम एक जातीय पहचान अभी नहीं मिली थी। काम की समानता के आधार पर विभिन्न वर्णों से आये लोग एक लंबे कालखंड के बाद एक जाति के रूप में संगठित हो गये थे।

गुप्तकाल से मिली खास पहचान 
गुप्त काल में तो साम्राज्य के पांच प्रमुख पदों में एक प्रमुख कायस्थ का पद भी शामिल कर लिया गया। इसके बाद तो उत्तरी, पश्चिमी और पूर्वी भारत के अधिकतर राज्यों में लेखा, जमीन संबंधी दस्तावेज व अन्य लेखकीय कार्य इस जाति के हाथ आ गया। गुप्तों ने बड़ी संख्या में बंगाल में कार्य के लिए कन्नौज व अन्य क्षेत्रों से ब्राह्मण और कायस्थों को बंगाल भेजा था। कश्मीर के कई राजवंश व बंगाल के पालवंश सहित कई अन्य वंश के शासक कायस्थ जाति के थे। आईने अकबरी के लेखक अबुल फजल अपनी पुस्तक में इसकी पुष्टि करते हैं। बारहवीं शताब्दी में कश्मीर के प्रसिद्ध ग्रंथ राजतरंगणी में कल्हण कायस्थ शासकों व कायस्थों में व्याप्त भ्रष्टाचार का भी जिक्र किया है। अनेकों विद्वान इसे कायस्थों से ब्राह्मणों को मिल रही चुनौती से उपजे विद्वेष के रूप में भी देखते हैं। मध्यकाल के प्रारंभ में चंदेल, कलचुरी और प्रतिहार राजाओं के बीच कायस्थ अपनी दक्षता से काफी लोकप्रिय थे। कुछ तो लेखकीय औैर मंत्री कार्य से इतर सेनापति के पद तक पहुंच गए। 17वीं शताब्दी में मुगलों के कमजोर पडऩे पर जेस्सोर के कायस्थ राजा प्रतापादित्य ने खुद को स्वतंत्र घोषित करने वाले पहले राजा था।
मुगलकाल में और शक्तिशाली हुए 
मुसलमानों के आने के बाद यह जाति और शक्तिशाली हो गई। अरबी, फारसी सीख कायस्थ राजकीय कार्य के लिए मुसलमानों की पहली पसंद बन गए। इस जाति के राजा टोडरमल मुगल सम्राट अकबर के नवरत्नों में शामिल थे। अबुल फजल तो यह भी कहते हैं कि बंगाल के अधिकतर जमींदार भी कायस्थ जाति के ही थे। जब अंग्रेज शासक हुए तो एक बार फिर कायस्थों ने प्रशासनिक और लेखकीय कार्य के लिए अपनी योग्यता सिद्ध की।

बने अंग्रेजों की पहली पसंद 

अंग्रेजी सिखने वाले ये पहली जमात के लोगों में शामिल थे। इस काल में लगभग 40 फीसद सरकारी पदों पर ब्राह्मण और कायस्थों का वर्चस्व था। भू अभिलेख में तो इनका वर्चस्व कुछ इस तरह था कि इन्होंने अपनी लिपि 'कैथीÓ ही विकसित कर ली। इसी में अब भी कई क्षेत्रों के भू अभिलेख मिलते हैं। इस काल में राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तन ने जब सेवा के नये अवसर सृजित किये तो वकील, बैरिस्टर बनने वाले सबसे पहले जमात में कायस्थ ही शामिल थे। सिर्फ प्रशासनिक, लेखकीय व आंकड़ा संचयन के कार्य में ही इस जाति का वर्चस्व नहीं रहा, सामाजिक परिवर्तन और देश के स्वतंत्रता संग्राम में भी इस जाति ने बढ़चढ़कर भाग लिया। स्वामी विवेकानंद, संत अरविंदो, खुदीराम बोस, सुभाषचंद्र बोस, जय प्रकाश नारायण, डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे कई प्रमुख लोगों ने इस जाति की प्रगतिशीलता और राष्ट्रप्रेम की गाथा रची।

पहचान का संघर्ष 
जाति के रूप में अस्तित्व में आने के बाद सनातन सामाजिक व्यवस्था के किस वर्ण में इन्हें रखा जाए, इसे लेकर हमेशा उहापोह की स्थिति बनी रही। पुरान कालीन कई ग्रंथ इन्हें क्षत्रियों से उपर लेकिन ब्राहमणों से नीचे का दर्जा देता है तो कई इन्हें सीधे शूद्र बताता है। हां बंगाल में इन्हें हमेशा कुलीन का दर्जा मिला। मुगलकालीन ग्रंथ आइने अकबरी में वर्ण के झंझट से अलग इन्हें पांचवें वर्ण का दर्जा दिया गया। पहचान का संघर्ष अंग्रेजों के न्यायालय में भी पहुंचा। जहां हर्बर्ट होप रिज्ले द्वारा मिताक्षरा के आधे-अधूरे अंग्रेजी अनुवाद के आधार पर कोर्ट ने कायस्थों को शूद्र माना। इसके खिलाफ न्याय का संघर्ष चलता रहा 1890 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इन्हें क्षत्रिय का दर्जा दे दिया वहीं 1927 में पटना हाईकोर्ट ने इन्हें उच्च जाति का बताया, जिसके आधार पर 1931 के जनगणना में उन्हें इसी वर्ग के तहत रखा गया। 

Wednesday, October 31, 2018

एक खाऊं .. दो खाऊं... तीन खाऊं.... या सारे ही खा जाऊं.....


एक खाऊं .. दो खाऊं... तीन खाऊं.... या सारे ही खा जाऊं.....
बचपन में मां ने एक कहानी सुनाई थी... आज बरबस ही याद आ गई। एक ग्रामीण युवक ने अपनी गरीबी से परेशान हो रोजगार की तलाश में दूसरे शहर जाने की ठान ली। पत्नी ने रास्ते में खाने के लिए एक पोटली में रोटी बांध दी। चलते-चलते जब युवक थक गया तो एक पेड़ क नीचे बैठ गया। थोड़ा आराम करने के बाद सोचा एक दो रोटी खा लूं। आसपास देखा तो कुआं नजर आया, सोचा चलो पानी निकाल कर हाथ-मुंह धो लूं फिर रोटी खाता हूं। वीरान स्थल पर स्थित उस कुएं में कोई आता नहीं था तो कुएं में सात परियों ने डेरा जमा लिया था। पथिक ने जब कुएं से पानी निकालने के लिए बाल्टी डाली तो परियां एकदम से सतर्क हो गईं। इनसब से बेखबर पथिक ने हाथ-मुंह धोकर रोटी निकाली ... देखा सात रोटियां हैं। वह अपने यात्रा के समय के अनुसार विचार करने लगा अभी कितनी रोटी खाऊं....बाद में कितनी... ताकि गंतव्य तक पहुंच जाऊं। उसने खुद से सवाल किया एक खाऊं .. दो खाऊं... तीन खाऊं.... या सारे ही खा जाऊं.....। कुएं में हर हलचल पर कान लगाए बैठी परियों ने उसकी आवाज सुन ली और डर से आधी हो गईं ये तो एक ही नहीं हम सातों को खाने की बात कह रहा है। डरी-सहमी परियां एकदम से कुएं से बाहर निकल आईं और पथिक से खुद को बख्शने की गुजारिश करने लगी और उसके बदले वह जो कुछ चाहे देने का प्रस्ताव भी रखा। पथिक भी अवाक था कहां बात रोटियां खाने की हो रही थी और कहां से परियां आ टपकीं। खैर उसने इमानदारी से परियों को अपनी गिनती का मतलब समझाया और उन्हें बेफिक्र रहने को कहा और आगे बढ़ गया। परियां सकुन के साथ वापस कुएं में चली गईं और युवक के सद्गुण और इमानदारी की चर्चा करने लगीं। कहा हमें ऐसे गुणी युवक की मदद करनी चाहिए, उन्होंने अपनी शक्ति से उसपर कृपा बरसाई और रास्ते में उसे काफी धन-संपत्ति मिला जिसे ले वह वापस अपने गांव आ गया और सपरिवार खुशी-खुशी रहने लगा।
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लेकिन आज ये कहानी बदल गई है.... कुएं में छलांग लगाने की मंशा लिए एक बेरोजगारी युवक वहां पहुंचा। लेकिन कुएं के पास उसके कदम सहम गए... अपने जेब में रखे स्लीपिंग पिल्स की स्ट्रीप निकाली और कहा एक खाऊं...दो  खाऊं....तीन खाऊं..... या सारे ही खा जाऊं। परियां सहम गईं.. अरे इतने दिनों बाद ये सवाल फिर से, सभी मिन्नत करती बाहर निकल आईं। परियों ने युवक के सामने जीवनदान के बदले जो चाहो सो देने का प्रस्ताव रखा। युवक एकाएक कई योजनाएं गढऩे में उलझ गया। धन-संपत्ति ही नहीं पूरी दुनिया उसके मांगने की सूची में शामिल हो गई। एक बार तो यह भी सोचा क्यों न इनमें से दो-तीन को घर ले चलूं फिर तो जब कुछ और जरूरत होगा तो ये काम आएंगी। युवक के लालच भरे उलझाव को देख परियों सशंकित हो गईं। अब उन्होंने भी 'दिमागÓ लगाया परयिों ने कहा जो भी मांगो एक ही बार मांगो और जाते वक्त पीछे मुड़कर देखा तो सब गायब हो जाएगा। इसपर युवक ने खूब सोचकर ढेर सारे हीरे-जवाहरात मांग लिए। अब वह सभी संपत्ति ले घर चल पड़ा। हीरे-जवाहरात की चमक ने उच्चकों को उसका पता दे दिया फिर क्या था उच्चकों के एक गिरोह ने उसे घेर लिया और सारे सामान छीन लिए। सिर धुनता-पिटता वह युवक अब रोज-रोज कुएं के पास जोर-जोर से आवाज लगाता है एक खाऊं .. दो खाऊं... तीन खाऊं.... या सारे ही खा जाऊं.....लेकिन कोई उसपर कान भी नहीं देता। आज मानव की भी यही स्थिति है अवसर मिलने पर लालच शाश्वत चारित्रिक गुणों पर हावी हो रहा है... और इसी तृष्णा में वह एक खाऊं .. दो खाऊं... तीन खाऊं.... या सारे ही खा जाऊं.....में व्यस्त हो गया है।
प्रवीण प्रियदर्शी 

Monday, October 29, 2018

वर्जिनिटी व चेस्टिटी के विचार ने किया महिला का बेड़ा गर्क 

दि मानव काल के बाद जैसे ही मनुष्य ने व्यवस्थित गृहस्थ जीवन की ओर कदम बढ़ाया वैसे ही महिलाओं की सामाजिक स्थिति कमजोर होने लगी। महिलाओं पर पुरुष का वर्चस्व बढऩे लगा और उनके लिए नए-नए मापदंड गढ़े जाने लगे। सामाजिक प्राणी के रूप में यौनता पुरुष और महिलाओं का नैसर्गिक गुण रहा, प्रारंभिक काल में यौन आवश्यकता पूरी करने में शायद कोई पाबंदी भी नहीं रही होगी। लेकिन गृहस्थ जीवन ने एक नई व्यवस्था गढऩी शुरू कर दी। इसमें महिलाओं के सामने नीत नई वर्जानाओं की सीमा रेखा खींची जाने लगी। महिला की शारीरिक संरचना, विशिष्टता या सीमाओं का पुरुष ने बड़ी चालाकी से और कभी-कभी तो 'ब्रूट फोर्सÓ से अपने पक्ष में इस्तेमाल किया और महिला को घर में समेटने में सफल रहे। घर में सीमटते ही स्त्री... पुरुष की मिलकियत बन गई, उसके आर्थिक प्रयास-क्षमता व विशिष्टता को भी पुरुष ने अपनी मिलकियत का हिस्सा बना लिया। वहीं लज्जा, कौमार्य और सुचिता जैसे शब्द आकार लेने लगे। उन कालों के सामाजिक संघर्ष में सुरक्षा के नाम पर इन शब्दों को मजबूत किया गया और महिला को पुरुष और परिवार के सम्मान से जोड़ दिया गया। लज्जा, कौमार्य, सुचिता और पुरुष या पारिवारिक सम्मान का मान बिंदू बनते ही महिला की दुनिया बदल गई। अब वह पुरी तरह पुरुष के अधीन हो गई। उसकी अस्मिता ही खत्म कर दी गई, उसकी शिक्षा, सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक अधिकारों को दोयम माना जाने लगा। हर समाज ने उनके लिए ऐसे-ऐसे नियम-कानून बनाए की खुद को मानव और विवेकशील कहने में शर्म महसूस होने लगे। इस पुरुषवादी विभत्सता ने आधी आबादी की नैसर्गिकता पर ही हमला कर दिया। विचारशील प्राणी को हंसने-बोलने वाली गुडिय़ा बनाने के इस कुत्सित प्रयास ने मानवता के खिलाफ ऐसा जुर्म किया जिसका कोई प्रायश्चित नहीं। इसके साथ ही महिला के अधिकार और उनके प्रति नजरिया में तत्कालीन समाज में व्यापक परिवर्तन हुआ। कभी सामाजिक संघर्ष, उपार्जन और विकास  की सहचरी रही स्त्री अब संघर्ष में विजेता के लिए इनाम बन गई। ऐसे संघर्ष के विजेता यौनांग का इस्तेमाल युद्ध के अस्त्र के रूप में महिलाओं से करने लगे और सामाजिक संघर्ष के बाद महिलाओं का सामूहिक उत्पीडऩ शुरू हुआ। पुरुषवादी समाज में उससे हर कदम पर सिर्फ 'उस चीजÓ की कीमत मांगी जाने लगी जिसे इसी पुरुष ने अपने लिए सम्मान और महिल के  लिए लज्जा और सुचिता बना दिया था। इसके लिए सहमति जैसे शब्दों को कीमत बताने-समझाने के तर्क भी गढ़े जाने लगे। आज के आधुनिक युग में भी कौमार्य, सुचिता, लज्जा और सम्मान उनकी गतिशीलता और व्यक्तित्व, शरीर और योगयता से समर्पण मांगता है। शायद मी टू इसी पुरुषवादी संपूर्ण नग्नता की तस्वीर है। यौन इ'छा और पहल सरल स्वभाविक मानवीय गुण हैं। इसमें कभी कौमार्य, कभी सुचिता, कभी लज्जा तो कभी सम्मान का पहरा लगा हम न सिर्फ मानवता के प्रति अपराध करते हैं बल्कि एक विभत्स सामाजिक कुंठा को भी जन्म दे रहे हैं। इससे विचार विभेद को यौन उन्मुक्तता की वकालत न माना जाए बस यह यौनता की बराबरी और महिला दर्प और व्यक्तित्व के संपूर्णता के सम्मान से जोड़ा जाए। फिर कहें तो वर्जिनिटी, चेस्टिटी, ऑनर (कौमार्य, सुचिता, सम्मान) के विचार ने महिलाओं के जीवन को नरक बना दिया और समाज के पुरुषवादी स्वरूप की नियामक रेखा खींची।
प्रवीण प्रियदर्शी