पोप जॉन पॉल द्वितीय के रांची आगमन के 25वें वर्षगांठ पर कॉरमैक कार्डिनल मर्फी ओ-कोनोर का दौरा कई मायनों में खास रहा। पंचायत चुनाव के बाद आदिवासियों के मुद्दे के बहाने धर्म का सामाजिक सरोकार एकदम से छलक कर सामने आ गया। वैसे रांची धार्मिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र है। सभी धर्मों के छोटे-बड़े गुरुओं का आना साल भर लगा रहता है, धार्मिक सत्संग-प्रवचन चलते रहते हैं। इन सबके बीच हाल के वर्षों में गुरुओं के 'एप्रोचÓ में जो सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिला वह है 'धर्म के बदलते और निरंतर स्थानीय होते सामाजिक सरोकार काÓ। वैसे हर काल में विभिन्न धर्मों में ऐसे प्रगतिशील गुरु रहे हैं जिन्होंने धर्म के सामाजिक सरोकार को सघन-सक्रिय करते हुए सामाजिक परिवर्तन को दिशा दिया।
ग्लोबलाइजेशन या आर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय सामाजिक-आर्थिक परिवेश में जिस तेजी से परिवर्तन हुआ उसी तेजी से विभिन्न विषमताएं भी उभरीं। झारखंड के परिप्रेक्ष्य में उग्रवाद, भ्रष्टाचार, पलायन, जमीन के लिए संघर्ष सबसे अहम मुद्दे बन कर उभरे। आज से कोई दो साल पहले जब श्रीश्री रविशंकर रांची पधारे तो उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर नक्सलियों से सीधे संपर्क का प्रस्ताव दिया। बाद के समय में इस दिशा में क्या कुछ हुआ स्पष्ट नहीं लेकिन एक वैचारिक पहल तो शुरू हो ही गई। योग गुरू स्वामी रामदेव ने भ्रष्टाचार के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर मुहिम छेड़ रखा है। जैन मुनी सागर ने अपने चर्तुमासा के दौरान जैनियों के सामाजिक सरोकार को नया आयाम देने पर बल दिया।
कहने का मतलब यह कि धार्मिक गुरु शिक्षा, सेवा जैसे पारंपरिक मुद्दों के इतर 'सेक्यूलर मुद्दोंÓ पर खुलकर सामने आ रहे हैं। उनके प्रो-एक्टिव स्पोर्ट ने जहां इन विषयों को सघन संवाद का विषय बना दिया वहीं किसी न किसी स्तर पर संस्थागत कार्य भी शुरू हुआ। कार्डिनल मर्फी ने चर्च के सामाजिक सरोकार में आदिवासियों के दर्द को आवाज देने व विभिन्न चुनौतियों के बीच स्थानीय पहचान बनाए रखने की जो बात कही, उसका काफी महत्व है। खासकर झारखंड में चर्च के विभिन्न समर्पित संगठनों के नेटवर्क को देखते हुए कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों में निश्चय ही आदिवासियों के लिए सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र में कई सकारात्मक पहल होंगे।
ग्लोबलाइजेशन या आर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय सामाजिक-आर्थिक परिवेश में जिस तेजी से परिवर्तन हुआ उसी तेजी से विभिन्न विषमताएं भी उभरीं। झारखंड के परिप्रेक्ष्य में उग्रवाद, भ्रष्टाचार, पलायन, जमीन के लिए संघर्ष सबसे अहम मुद्दे बन कर उभरे। आज से कोई दो साल पहले जब श्रीश्री रविशंकर रांची पधारे तो उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर नक्सलियों से सीधे संपर्क का प्रस्ताव दिया। बाद के समय में इस दिशा में क्या कुछ हुआ स्पष्ट नहीं लेकिन एक वैचारिक पहल तो शुरू हो ही गई। योग गुरू स्वामी रामदेव ने भ्रष्टाचार के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर मुहिम छेड़ रखा है। जैन मुनी सागर ने अपने चर्तुमासा के दौरान जैनियों के सामाजिक सरोकार को नया आयाम देने पर बल दिया।
कहने का मतलब यह कि धार्मिक गुरु शिक्षा, सेवा जैसे पारंपरिक मुद्दों के इतर 'सेक्यूलर मुद्दोंÓ पर खुलकर सामने आ रहे हैं। उनके प्रो-एक्टिव स्पोर्ट ने जहां इन विषयों को सघन संवाद का विषय बना दिया वहीं किसी न किसी स्तर पर संस्थागत कार्य भी शुरू हुआ। कार्डिनल मर्फी ने चर्च के सामाजिक सरोकार में आदिवासियों के दर्द को आवाज देने व विभिन्न चुनौतियों के बीच स्थानीय पहचान बनाए रखने की जो बात कही, उसका काफी महत्व है। खासकर झारखंड में चर्च के विभिन्न समर्पित संगठनों के नेटवर्क को देखते हुए कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों में निश्चय ही आदिवासियों के लिए सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र में कई सकारात्मक पहल होंगे।
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