उग्रवाद की ताबूत में अंतिम कील
25 साल पहले पोप जॉन पॉल द्वितीय जब रांची आए थे- न झारखंड था, न उग्रवाद। अगर कुछ था, तो शोषण, उपेक्षा व असमान अवसर के खिलाफ जबर्दस्त जनांदोलन। ऐसे में परिस्थितयों के मद्देनजर उन्होंने 'श्रम की महिमाÓ की चर्चा कर लोगों को प्रेरित किया था। आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। झारखंड का सपना तो साकार हुआ, लेकिन जनाकांक्षा में उभार व संवैधानिक मशीनरी की बेबसी ने उग्रवाद को जाना-पहचाना शब्द बना दिया। पोप की यात्रा की जब 25वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है, पंचायत चुनाव के बूते उग्रवाद की ताबूत में अंतिम कील ठोंकने के संदेश से लोगों में विकास की नई उम्मीद जग रही है।
आदिवासियों के लिए नई प्रवृत्ति
उग्रवाद पर बहस की शुरुआत करते हुए पश्चिम बंगाल के पूर्व प्रधान महालेखाकार बेंजामिन लकड़ा ने कहा, आदिवासियों के बीच उग्रवाद नई प्रवृत्ति है। अपनी सादगी, ईमानदारी व परिश्रमी स्वभाव के बावजूद लगातार शोषण, पलायन ने आदिवसियों को विकास से दूर रखा। अब उनके जल,जंगल जमीन पर आक्रमण कर उनके अस्तित्व को चुनौती दी गई है। कई आदिवासी भाषाएं मर गईं, गांवों-शहरों में आदिवासी चेहरा लाचारगी-बेचारगी का पर्याय बना हुआ है। ऐसे में अस्तित्व रक्षा के लिए आदिवासी उग्रवाद की ओर उन्मुख हो रहे हैं। स्वशासन के हामी आदिवासियों को अब पंचायत चुनाव से जो बल मिला है, उससे उग्रवाद समाप्त होगा, क्योंकि अनेक को मतदाताओं के सामने हाथ जोडऩे के लिए बंदूक त्यागते हम देख चुके हैं।
वैचारिक शुरुआत शुभ
पंचायत चुनाव से ऐसी ही अपेक्षा प्रसिद्ध समाज विज्ञानी व एक्सआईएसएस के निदेशक डा. एलेक्स एक्का ने भी जताई। पंचायत चुनाव को अद्वितीय अवसर बताते हुए इन विद्वानों के सुर में अन्य कई सुर मिले। सबसे बढ़कर पोप के विशेष दूत के आशीर्वाद से उग्रवाद की ताबूत में अंतिम कील ठोंकने की वैचारिक शुरुआत तो हो ही गई। झारखंड में आदिवासियों की हालत पर चिंता जताते हुए पोप बेनेडिक्ट-16 के विशेष दूत कार्डिनल कॉरमेक मर्फी ओ कोनोर ने चर्च से सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत आदिवासियों के मुद्दे उठाने पर सहमति जताई। कार्डिनल ने कहा कि आदिवासियों की बातें यदि चर्च नहीं करेगा तो कौन करेगा। कलीसिया द्वारा आदिवासियों की बातें करने पर प्रसन्नता जताते हुए संपोषी विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) को आदिवासी अस्मिता के लिए आवश्यक बताया। आदिवासियों से जल, जंगल जमीन लिए जाने व विकास की अवरुद्ध धारा को सार्वजनिक चिंता का मुद्दा बताते हुए कहा कि नए विषयों पर चर्च सामाजिक दायित्व के तहत काम करेगा।
25 साल पहले पोप जॉन पॉल द्वितीय जब रांची आए थे- न झारखंड था, न उग्रवाद। अगर कुछ था, तो शोषण, उपेक्षा व असमान अवसर के खिलाफ जबर्दस्त जनांदोलन। ऐसे में परिस्थितयों के मद्देनजर उन्होंने 'श्रम की महिमाÓ की चर्चा कर लोगों को प्रेरित किया था। आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। झारखंड का सपना तो साकार हुआ, लेकिन जनाकांक्षा में उभार व संवैधानिक मशीनरी की बेबसी ने उग्रवाद को जाना-पहचाना शब्द बना दिया। पोप की यात्रा की जब 25वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है, पंचायत चुनाव के बूते उग्रवाद की ताबूत में अंतिम कील ठोंकने के संदेश से लोगों में विकास की नई उम्मीद जग रही है।
आदिवासियों के लिए नई प्रवृत्ति
उग्रवाद पर बहस की शुरुआत करते हुए पश्चिम बंगाल के पूर्व प्रधान महालेखाकार बेंजामिन लकड़ा ने कहा, आदिवासियों के बीच उग्रवाद नई प्रवृत्ति है। अपनी सादगी, ईमानदारी व परिश्रमी स्वभाव के बावजूद लगातार शोषण, पलायन ने आदिवसियों को विकास से दूर रखा। अब उनके जल,जंगल जमीन पर आक्रमण कर उनके अस्तित्व को चुनौती दी गई है। कई आदिवासी भाषाएं मर गईं, गांवों-शहरों में आदिवासी चेहरा लाचारगी-बेचारगी का पर्याय बना हुआ है। ऐसे में अस्तित्व रक्षा के लिए आदिवासी उग्रवाद की ओर उन्मुख हो रहे हैं। स्वशासन के हामी आदिवासियों को अब पंचायत चुनाव से जो बल मिला है, उससे उग्रवाद समाप्त होगा, क्योंकि अनेक को मतदाताओं के सामने हाथ जोडऩे के लिए बंदूक त्यागते हम देख चुके हैं।
वैचारिक शुरुआत शुभ
पंचायत चुनाव से ऐसी ही अपेक्षा प्रसिद्ध समाज विज्ञानी व एक्सआईएसएस के निदेशक डा. एलेक्स एक्का ने भी जताई। पंचायत चुनाव को अद्वितीय अवसर बताते हुए इन विद्वानों के सुर में अन्य कई सुर मिले। सबसे बढ़कर पोप के विशेष दूत के आशीर्वाद से उग्रवाद की ताबूत में अंतिम कील ठोंकने की वैचारिक शुरुआत तो हो ही गई। झारखंड में आदिवासियों की हालत पर चिंता जताते हुए पोप बेनेडिक्ट-16 के विशेष दूत कार्डिनल कॉरमेक मर्फी ओ कोनोर ने चर्च से सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत आदिवासियों के मुद्दे उठाने पर सहमति जताई। कार्डिनल ने कहा कि आदिवासियों की बातें यदि चर्च नहीं करेगा तो कौन करेगा। कलीसिया द्वारा आदिवासियों की बातें करने पर प्रसन्नता जताते हुए संपोषी विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) को आदिवासी अस्मिता के लिए आवश्यक बताया। आदिवासियों से जल, जंगल जमीन लिए जाने व विकास की अवरुद्ध धारा को सार्वजनिक चिंता का मुद्दा बताते हुए कहा कि नए विषयों पर चर्च सामाजिक दायित्व के तहत काम करेगा।
No comments:
Post a Comment