Friday, April 1, 2011

काश! तब ही रोक दिया गया होता

रांची के साथ यह कोई नई बात नहीं, वर्षों से यही होता रहा, एक-दो मवेशी ले जिस किसी ने जहां-कहीं डंडा गाड़ दिया वह जमीन उसकी हो गई। आज से कोई चालीस-पचास साल पहले रांची के अधिकतर इलाके खाली थे। धीरे-धीरे इसका अतिक्रमण होता चला गया।
सवाल यह भी कि जिस समय बस्तियां बस रही थी, उस समय प्रशासन क्या कर रहा था। वहां तो सड़क भी बन गई, बिजली-पानी सब पहुंच गया। अगर इसे उसी समय रोक दिया गया होता तो...।
दरअसल, यह सब कई लोगों की मिलीभगत से हुआ। इसमें दबंग भी थे, राजनेता भी, पुलिस-प्रशासन के लोग भी। छह दशक के बाद प्रशासन की नींद टूटी है कोर्ट के दखल देने के बाद।
यह कहानी किसी एक मुहल्ले की नहीं आरागेट, नागाबाबा खटाल, कार्ट सराय रोड, पीस रोड, हटिया, कांके रोड, बरियातू, बिरला मैदान, धुर्वा, कोकर समेत राजधानी के सभी मुहल्लों की है।
जमीन विवाद को ले लाठियां यहां चलती रहीं। मालिकाना हक दिलाने में न्यायालय के आदेशों की भी कई बार अवहेलना की गई। जमीन नहीं छोड़ प्राय: जमीन मालिकों से जमीन का एक हिस्सा मांगा गया या बाजार मूल्य से काफी कम कीमत पर जबरन जमीन ली गई।
राजधानी के कितने ही लोगों के इस दर्द की ओर कभी किसी नेता या राजनीतिक दल ने ध्यान नहीं दिया। कभी किसी ने किसी से सहयोग मांगा तो न्यायालय जाने की विद्वत सलाह दी गई। आज जब न्यायालय के आदेश से लोगों को राहत मिल रही है तो नेता सक्रिय हो गए हैं। कोई हटाने के पूर्व बसाने की व्यवस्था की मांग कर रहा है तो अमानवीय व्यवहार का मुद्दा भी उठ रहा है। अहम सवाल यह कि ये बातें शुरू में ही क्यों नहीं आईं। अतिक्रमण हट जाने के बाद भी शहर में जहां-तहां फिर से पुराना खेल शुरू हो गया है। कल फिर यही सवाल खड़ा होगा। जब लोग टाट-तंबू गाड़ लेंगे तब प्रशासन बेदखल करने आएगा। मानवता के नाते सहानुभूति के सवाल उठने लाजिमी होंगे। तो उन्हें अभी ही दो टूक समझा देने या पुनर्वास की जगह दे देने में दिक्कत क्यों।

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