राजधानी के ठीक नाक के नीचे (लापुंग थाना क्षेत्र के जरिया मंगराटोली व पतराटोली) तस्कर छह सौ सखुआ के पेड़ काट लेते हैं और कहीं कोई शोर नहीं, कोई बवाल नहीं, कोई धरना-प्रदर्शन नहीं ... आखिर हो क्या गया है हमें। अभी ग्लोबल वार्मिंग, फोरेस्ट राइट से लेकर क्लाइमेट चेंज पर भाषण देने हों तो वातानुकुलित कक्ष में विद्वता की गंगा बहा दी जाएगी, लेकिन वास्तविक मुद्दों पर जमीनी लड़ाई कठिन होती है। हां विधानसभा में संबंधित क्षेत्र के विधायक व पूर्व मंत्री ने मामला जरूर उठाया लेकिन इसमें वह ताकत व आक्रमकता नहीं झलकी जिसके लिए विधायक महोदय जाने जाते हैं, लगता है मामला कोरम पूरा करने भर का था। वैसे तो किसी क्षेत्र विशेष में पांच सौ-हजार पेड़ कट जाने का पर्यावरण पर तत्काल कोई असर नहीं पड़ता, लेकिन पेड़ों के कटने और आवाम के मौन के साथ कट मरे मानवीय संवेदना की जर्जरता उद्वेलित करती है। झारखंड में हम पानी पी पीकर जल,जंगल, जमीन की कस्में खाते हैं, उसे अपने अस्तित्व, सभ्यता-संस्कृति से जोड़ते हैं और उसपर हुए इस सुनियोजित हमले पर मौन रह जाते हैं। ये कैसी संजीदगी है...।
झारखंड खुशनसीब है कि उसके पास देश ही नहीं दुनिया का सबसे बेहतरीन साल का जंगल है। खूबसूरती में ही नहीं गुणवत्ता में भी इसका कोई सानी नहीं। झारखंड के संदर्भ में जंगल की अहमियत कई कारणों से है। झारखंड सदियों से मृदाक्षरण का शिकार रहा है। पठारी क्षेत्र होने के कारण यहां मिट्टी की परत काफी पतली है। इस पतली परत में जो कुछ उपजाऊ है वह ऊपरी परत में ही है। शायद इसे बचाने के लिए ही प्रकृति ने घने जंगल का आवरण दिया है। यह आवरण हटा नहीं की टांड भूमि का मृदाक्षारण दोण भूमि को भी नष्ट कर देगा। पहले से ही कम कृषि योग्य भूमि का दंश क्षेल रहे सूबे के लिए खाद्यान्न समस्या और गंभीर हो जाएगा। सोचें ऐसा हुआ तो पलायन, बेरोजगारी, भूखमरी की पहले से ही खराब स्थिति का और क्या होगा। लगता है समय आ गया है जब हमें इस गंभीरता की गूंज सुननी ही पड़ेगी। वैसे एक वैज्ञानिक अध्ययन में कहा गया है कि छह साल उम्र के एक एकड़ का साल जंगल नौ टन कार्बन का अवशोषण करता है वहीं मैच्योर जंगल प्रति एकड़ 24 से 30 टन कार्बन अवशोषित करता है। अध्ययन में बताया गया है कि तीस गुण तीस मीटर क्षेत्र में छह वर्ष उम्र के अमूमन 81 पेड़ होते हैं। अब हम सहज अनुमान लगा सकते हैं कि छह सौ मैच्योर पेड़ काटे जाने का मतलब क्या है। ऐसा नहीं कि इसके कटने मात्र से अकाल पड़ जाएगा या गर्मी एकदम से बढ़ जाएगी। हां... हम अपने कार्बन अवशोषण के विकल्प कम करते जाएंगे। विकास की हर गतिविधि आज कार्बन उत्सर्जन से जुड़ी है। ऐसे में पेड़ ही वह एकमात्र मित्र हैं जो हमारे कथित विकास के इस गरल का पान करते हैं। क्या यह उनके जीवन की रक्षा किए जाने के लिए यथेष्ट कारण नहीं है। एक-दो लोगों के मारे जाने पर हम सड़क पर उतर आते हैं, मुआवजा, नौकरी और जाने क्या-क्या मांगने लगते हैं फिर इन बेजुबान दोस्तों के लिए हम थोड़ा हल्ल तो कर ही सकते हैं।
झारखंड खुशनसीब है कि उसके पास देश ही नहीं दुनिया का सबसे बेहतरीन साल का जंगल है। खूबसूरती में ही नहीं गुणवत्ता में भी इसका कोई सानी नहीं। झारखंड के संदर्भ में जंगल की अहमियत कई कारणों से है। झारखंड सदियों से मृदाक्षरण का शिकार रहा है। पठारी क्षेत्र होने के कारण यहां मिट्टी की परत काफी पतली है। इस पतली परत में जो कुछ उपजाऊ है वह ऊपरी परत में ही है। शायद इसे बचाने के लिए ही प्रकृति ने घने जंगल का आवरण दिया है। यह आवरण हटा नहीं की टांड भूमि का मृदाक्षारण दोण भूमि को भी नष्ट कर देगा। पहले से ही कम कृषि योग्य भूमि का दंश क्षेल रहे सूबे के लिए खाद्यान्न समस्या और गंभीर हो जाएगा। सोचें ऐसा हुआ तो पलायन, बेरोजगारी, भूखमरी की पहले से ही खराब स्थिति का और क्या होगा। लगता है समय आ गया है जब हमें इस गंभीरता की गूंज सुननी ही पड़ेगी। वैसे एक वैज्ञानिक अध्ययन में कहा गया है कि छह साल उम्र के एक एकड़ का साल जंगल नौ टन कार्बन का अवशोषण करता है वहीं मैच्योर जंगल प्रति एकड़ 24 से 30 टन कार्बन अवशोषित करता है। अध्ययन में बताया गया है कि तीस गुण तीस मीटर क्षेत्र में छह वर्ष उम्र के अमूमन 81 पेड़ होते हैं। अब हम सहज अनुमान लगा सकते हैं कि छह सौ मैच्योर पेड़ काटे जाने का मतलब क्या है। ऐसा नहीं कि इसके कटने मात्र से अकाल पड़ जाएगा या गर्मी एकदम से बढ़ जाएगी। हां... हम अपने कार्बन अवशोषण के विकल्प कम करते जाएंगे। विकास की हर गतिविधि आज कार्बन उत्सर्जन से जुड़ी है। ऐसे में पेड़ ही वह एकमात्र मित्र हैं जो हमारे कथित विकास के इस गरल का पान करते हैं। क्या यह उनके जीवन की रक्षा किए जाने के लिए यथेष्ट कारण नहीं है। एक-दो लोगों के मारे जाने पर हम सड़क पर उतर आते हैं, मुआवजा, नौकरी और जाने क्या-क्या मांगने लगते हैं फिर इन बेजुबान दोस्तों के लिए हम थोड़ा हल्ल तो कर ही सकते हैं।
No comments:
Post a Comment