Thursday, March 10, 2011

चालीस हजार का ही स्पॉट बिलिंग क्यों

 झारखंड राज्य विद्युत बोर्ड ने एक गलती को सही सिद्ध करने के लिए एक और गलती करने की ठान ली है। बिप्स की कार्यक्षमता के प्रभावी अध्ययन के बिना उसे स्पॉट बिलिंग का काम तो दे ही दिया गया अब एजेंसी को सफल बनाने के लिए बोर्ड की ओर से निर्धारित मानक ही कम किया जा रहा है। एजेंसी को फरवरी में जहां 95,000 उपभोक्ताओं के स्पॉट बिलिंग का निर्देश दिया था वहीं मार्च में मात्र चालीस हजार उपभोक्ताओं के स्पॉट बिलिंग की बात कही गई है।
आखिर क्यों? चलिए... देर ही सही, शायद बोर्ड ने एजेंसी की सही क्षमता की पहचान ली। वैसे कार्यादेश के अनुसार मार्च से एजेंसी को शतप्रतिशत उपभोक्ताओं (1.60 लाख) की स्पॉट बिलिंग करनी थी। बोर्ड ने एजेंसी को मार्च बीस तक सभी उपभोक्ताओं को बिल दे उपलब्ध कराने का सख्त निर्देश भी दिया है।

किस अपराधी को तलाश रहा बोर्ड
बोर्ड ने सड़क पर बिल फेंके होने के लिए दोषी अधिकारी को चिह्नित करने की बात कही है। उपभोक्ता के विश्वास बहाली के लिए यह बेहद जरूरी है लेकिन इस निर्देश में भी दोषी एजेंसी को बचाने की बू आ रही है। मूल प्रश्न तो यह है कि एजेंसी ने फरवरी माह का बिल फरवरी में बांटा क्यों नहीं? बिल फेंकने के दोषी तो जरूर चिह्नित हों लेकिन बिल नहीं बांटने वालों का टारगेट कम कर किसे पुरस्कृत किया जा रहा है?
क्या यही है स्पॉट बिलिंग

एजेंसी ने इस बार तत्परता दिखाते हुए काम भी शुरू कर दिया है। इतने निदैश-आदेश के बावजूद स्पॉट बिलिंग के नाम पर आंख में धूल झोंका जा रहा है। एजेंसी के कर्मचारी उपभोक्ताओं के घर तो जा रहे हैं लेकिन मीटर की फोटो व रीडिंग ले बिना बिल दिए लौट रहे हैं। पूछने पर कहते हैं बिल 20 मार्च तक मिलेगा। क्या यही स्पॉट बिलिंग है, स्पॉट बिलिंग में मीटर रीडिंग के साथ ही बिजली बिल दे देना है और मिले तो चेक से बिल की राशि भी ले लेना है।
कई शिकायत
स्पॉट बिलिंग के नाम लोगोंं के आंख जो धूल झोंका जा रहा है इसके खिलाफ कई उपभोक्ताओं ने फोन कर जानकारी दी है।
1.
मीटर रीडिंग और फोटो ले चले गए हैं लेकिन बिल नहीं दिया। बोले बीसको देंगे।
शोभा कुमारी, निवारणपुर,
बुक नं. :: बी 27/ डीआर 2838
2. मीटर रीडिंग कर चले गए बिल दिया ही नहीं, सुना था स्पॉट बिलिंग में रीडिंग के साथ बिल देंगे।
मोहन सिंह, निवारणपुर
बुक नं. :: बी 40/ डीआर 422

ऐसी ही शिकायत कडरू की सादिया खातून बुक नं. एजी06/ केएडी 588, सी केरकेट्टा-कडरू, बुक नं. एजी06/ केएडी 117, मो. कलीम-कडरू बुक नं. एजी06/ केएडी 7781, डा. रत्नेश 10ए, ओल्ड एजी कॉलोनी केएडी 476 ने की है।

सूबे में दमकेगी फूलो की चहक

 गुमला जिले के सुदूर गांव हापामोनी की फूलो देवी बेहद खुश है। उसका आत्मविश्वास देखते ही बनता है। कई अन्य महिलाओं के लिए अब फूलो माडल बन चुकी है, ग्रामीण महिलाएं दीदी से सफलता का राज पूछते अघाती नहीं। गुमला के सुदूर गांव हापामनी में स्ट्राबेरी की खेती, कभी सोचा है आपने, हां यह कर दिखाया है फूलो ने, स्ट्राबेरी ही नहीं, मशरुम, जड़ी-बुटी भी उपजाती है फूलो। अब तो उसे अपने उत्पाद बेचने के लिए रांची भी नहीं आना पड़ता। गांव में ही उसकी स्ट्राबेरी पांच रुपये पीस खरीदने शहर के व्यवसायी पहुंच रहे हैं। ऐसे ही कहानी है महादेव भगत की, अपनी खेत में जड़ी-बूटी उपजाते हैं। वैद्य भी हैं, कुछ जड़ी का इस्तेमाल खुद करते हैं, शेष गांव में ही बिक जाता है।
यह सब कुछ यों ही नहीं हुआ इसके पीछे विकास भारती विशुनपुर और कृषि विज्ञान केंद्र गुमला की महत्वपूर्ण भूमिका है। विकास भारती के सचिव अशोक भगत कहते हैं कि जब से (1983 से)हम इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं तब से हमने समेकित कृषि विकास पर जोर दिया। केवीके की मदद से टिकाऊ कृषि तकनीक की महज शिक्षा ही नहीं दी, किसानों के द्वारा खेत में तैयार विभिन्न फसलों के माडल भी ग्रामीणों को दिखाया। अब वे सामने आने लगे हैं, और समेकित खेती का महत्व समझने लगे हैं। इसके तहत राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत जहां परती जमीन में फलदार वृक्ष लगाए जा रहे हैं, स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जलों
का टिकाऊ प्रबंधन किया जा रहा है, पेड़ों के बीच की जमीन में रबी व खरीफ फसल लगाए जा रहे हैं। साथ ही पशुपालन और चारा उत्पादन जैसे प्रयास भी चल रहे हैं। इसके साथ ही उत्पाद को बाजार से जोडऩे के लिए कई एजेंसियों को आमंत्रित किया गया है जो किसानों के उत्पाद गांव में खरीद लेते हैं। विकास भारती विशुनपुर की ओर से क्षेत्र के सैकड़ोंं ग्रामीणों को विभिन्न कलाओं व प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। अशोक भगत व केबीके के वैज्ञानिक डा. संजय सिंह कहते हैं कि राज्य में जड़ी-बुटी के उत्पादन का उपुयक्त वातावरण है। इसे अभियान के रूप में चला सूबे को ग्रामीणों को नई आर्थिक आजादी दी जा सकती है।

इस मैराथन में कोई पुरस्कार नहीं

दुमका और रांची की दसियों चक्कर लगा चुका है शिबू पूजहर। हर बार नए इरादे के साथ राजधानी की गलियों की खाक छानता है। जेब खाली होते ही घर वापस। यह भाग-दौड़ बेमतलब नहीं... न ही इरादा लिम्का या गिनीज बुका ऑफ वल्र्ड रिकार्ड में नाम दर्ज कराना है। दो वर्षों से जारी इस  मैराथन के निशाने पर कुछ है... तो वह है एक अदद नौकरी।
13 अक्टूबर 2008 को राज्य सरकार ने जब एक संकल्प जारी कर लुप्तप्राय जनताति के स्नातक युवक-युवतियों को जिलास्तरीय तृतीय वर्ग के पदों पर सीधी नियुक्ति का फरमान जारी किया तो शिबू जैसे कई युवक-युवतियों के ख्वाबों को पर लग गए। लगे भी क्यों न, सदियों से मानवीय विकास के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े शिबू के दर पर अवसर ने पहली बार दस्तक जो दी थी। सरकारी संकल्प की जानकारी मिलते ही शिबू रांची पहुंचा और नौकरी के लिए कल्याण विभाग में आवेदन जमा करा दिया। प्रक्रिया के बाद 9 अक्टूबर 2009 को कल्याण विभाग ने बोकारो के उपायुक्त को पत्र संख्या 166/2008-क-2408 के माध्यम से तीन युवतियों व एक युवक का नाम नौकरी के लिए अनुशंसा कर भेजा। इनमें दो युवतियों को नियुक्ति भी मिली। वे काम भी कर रही हैं, लेकिन शिबू पूजहर और उषा कुमारी को अब तक नौकरी नहीं मिली। कारण बताने को कोई तैयार नहीं, बेचारा शिबू तब से ही पैसे जुगाड़ कभी बोकरो तो कभी रांची के बाबुओं के दफ्तर का चक्कर काट रहा है। हर बार एक ही जवाब मिलता है जाओ काम हो जाएगा... लेकिन कब... इंतजार है शिबू को इस जवाब का।

Sunday, March 6, 2011

बोर्ड-एजेंसी के बीच पिस रहे उपभोक्ता

गजब कहानी
-एजेंसियों की स्पॉट बिलिंग पर कई सवाल
 झारखंड राज्य विद्युत बोर्ड एजेंसियों को स्पॉट बिलिंग का काम सौंप निश्चिंत हैं, खामियाजा उपभोक्ता भुगत रहे।
एजेंसी की निष्क्रियता के कारण विद्युत बोर्ड को रांची सर्किल में जनवरी में आठ करोड़ का नुकसान हो चुका है, फरवरी में यह दस करोड़ तक जाने की संभावना है। बोर्ड ने खुली निविदा द्वारा रांची और दुमका में स्पॉट बिलिंग का काम बिजनेस इनफॉरमेशन प्रोसेस सर्विसेज (बिप्स), नोएडा और जमशेदपुर व धनबाद का कार्यादेश स्टर्लिंग ट्रांसफार्मर को दिया था। शर्त के अनुसार दोनों एजेंसियों को आदेशित मूल्य का पांच प्रतिशत सिक्यूरिटी मनी कैश या बैंक ड्राफ्ट के रूप में जमा करना था। दस प्रतिशत परफार्मेंस बैंक गारंटी के रूप में बोर्ड के पास एग्रीमेंट के 15 दिन के अंदर देना था। दोनों ही एजेंसियां इसमें विफल रहीं। लेकिन, उन्हें अभयदान देते हुए 28 फरवरी, 2011 तक राशि जमा करने को कहा गया। अन्यथा, पुनर्निविदा की चेतावनी दी। बिप्स ने काफी हील-हुज्जत के बाद सिर्फ रांची सर्किल के लिए 25 लाख सिक्यूरिटी मनी व 50 लाख परफार्मेंस बैंक गारंटी के रूप में जमा कराया। दुमका के लिए 48 लाख रुपये की राशि जमा करने में एजेंसी ने असमर्थता जता दी। अब बिप्स रांची में स्पॉट बिलिंग का काम कर रही है। वहीं स्टर्लिंग ट्रांसफारर्मर ने जमशेदपुर में काम शुरू कर दिया, लेकिन अभी तक 48 लाख रुपये की सिक्यूरिटी मनी व परफार्मेंस बैंक गारंटी जमा नहीं कराया। स्टर्लिंग ने धनबाद में काम करने से साफ मना ही कर दिया। इसका नुकसान बोर्ड को तो उठाना पड़ ही रहा, उपभोक्ता अलग परेशान।
शर्तों का पालन नहीं
1. निविदा के अनुसार एजेंसियों को मीटर रीडिंग और बिलिंग के लिए अपने कर्मचारी रखने थे।
2. कर्मचारी फोटोयुक्त यूनिफार्म में होंगे, जिसपर उनका नाम व फोन नंबर लिखा होगा।
3. कर्मचारी के पहचान पत्र विद्युत बोर्ड के संबंधित अधिकारी व एजेंसी के मुख्य प्रभारी द्वारा अभिप्रमाणित होगा।
4. प्रत्येक माह के 14 तारीख तक मीटर रीडिंग का काम हो जाना चाहिए।
5. रीडिंग व बिलिंग के एकत्रित डाटा दूसरे दिन दस बजे तक इंटरनेट पर डाल दिया जाना चाहिए।
मिल रही शिकायत
डोरंडा नार्थ आफिस पाड़ा और साउथ आफिस पाड़ा व हिनू के शुक्ला कॉलोनी, किलबर्न कॉलोनी सहित कई अन्य इलाकों में स्पॉट बिलिंग के नाम पर एजेंसी का कर्मचारी उपभोक्ताओं की मीटर रीडिंग व फोटोग्राफी कर चला आया। उपभोक्ताओं को बिल स्पॉट पर नहीं दिया गया। करीब दस दिन बाद स्पॉट बिलिंग मशीन से बिल निकाल घरों में पहुंचा दिया गया।
बिल गाथा
-तुपुदाना के सत्यम फ्लोर मिल को दिसंबर में कंज्यूमर नंबर एचकेएलटी/ एचके 6109 से 134313 रूपये का बिल मिला। बिल में 35890 यूनिट का उपभोग दर्शाया गया है। शिकायत करने पर इसे हाथ से सुधार कर 34,861 कर दिया गया।
-सिल्ली के कंचन कंज्यूमर नंबर एसएम 04/ एस916 का कनेक्शन दिसंबर 2010 में काट दिया गया था। अब उसे रनिंग उपभोक्ता बता दिया गया।
-सिल्ली के बिरेंद्र नाथ रजक के कंज्यूमर नंबर एसएम 07/ एस1462 कनेक्शन पर यूनिट उपभोग शून्य दिखाते हुए 5528 रूपये का बिल भेज दिया गया है।

Friday, March 4, 2011

गंभीर है इस चुप्पी की गूंज

 राजधानी के ठीक नाक के नीचे (लापुंग थाना क्षेत्र के जरिया मंगराटोली व पतराटोली) तस्कर छह सौ सखुआ के पेड़ काट लेते हैं और कहीं कोई शोर नहीं, कोई बवाल नहीं, कोई धरना-प्रदर्शन नहीं ... आखिर हो क्या गया है हमें। अभी ग्लोबल वार्मिंग, फोरेस्ट राइट से लेकर क्लाइमेट चेंज पर भाषण देने हों तो वातानुकुलित कक्ष में विद्वता की गंगा बहा दी जाएगी, लेकिन वास्तविक मुद्दों पर जमीनी लड़ाई कठिन होती है। हां विधानसभा में संबंधित क्षेत्र के विधायक व पूर्व मंत्री ने मामला जरूर उठाया लेकिन इसमें वह ताकत व आक्रमकता नहीं झलकी जिसके लिए विधायक महोदय जाने जाते हैं, लगता है मामला कोरम पूरा करने भर का था। वैसे तो किसी क्षेत्र विशेष में पांच सौ-हजार पेड़ कट जाने का पर्यावरण पर तत्काल कोई असर नहीं पड़ता, लेकिन पेड़ों के कटने और आवाम के मौन के साथ कट मरे मानवीय संवेदना की जर्जरता उद्वेलित करती है। झारखंड में हम पानी पी पीकर जल,जंगल, जमीन की कस्में खाते हैं, उसे अपने अस्तित्व, सभ्यता-संस्कृति से जोड़ते हैं और उसपर हुए इस सुनियोजित हमले पर मौन रह जाते हैं। ये कैसी संजीदगी है...।   
झारखंड खुशनसीब है कि उसके पास देश ही नहीं दुनिया का सबसे बेहतरीन साल का जंगल है। खूबसूरती में ही नहीं गुणवत्ता में भी इसका कोई सानी नहीं। झारखंड के संदर्भ में जंगल की अहमियत कई कारणों से है। झारखंड सदियों से मृदाक्षरण का शिकार रहा है। पठारी क्षेत्र होने के कारण यहां मिट्टी की परत काफी पतली है। इस पतली परत में जो कुछ उपजाऊ है वह ऊपरी परत में ही है। शायद इसे बचाने के लिए ही प्रकृति ने घने जंगल का आवरण दिया है। यह आवरण हटा नहीं की टांड भूमि का मृदाक्षारण दोण भूमि को भी नष्ट कर देगा। पहले से ही कम कृषि योग्य भूमि का दंश क्षेल रहे सूबे के लिए खाद्यान्न समस्या और गंभीर हो जाएगा। सोचें ऐसा हुआ तो पलायन, बेरोजगारी, भूखमरी की पहले से ही खराब स्थिति का और क्या होगा। लगता है समय आ गया है जब हमें इस गंभीरता की गूंज सुननी ही पड़ेगी। वैसे एक वैज्ञानिक अध्ययन में कहा गया है कि छह साल उम्र के एक एकड़ का साल जंगल नौ टन कार्बन का अवशोषण करता है वहीं मैच्योर जंगल प्रति एकड़ 24 से 30 टन कार्बन अवशोषित करता है। अध्ययन में बताया गया है कि तीस गुण तीस मीटर क्षेत्र में छह वर्ष उम्र के अमूमन 81 पेड़ होते हैं। अब हम सहज अनुमान लगा सकते हैं कि छह सौ मैच्योर पेड़ काटे जाने का मतलब क्या है। ऐसा नहीं कि इसके कटने मात्र से अकाल पड़ जाएगा या गर्मी एकदम से बढ़ जाएगी। हां... हम अपने कार्बन अवशोषण के विकल्प कम करते जाएंगे। विकास की हर गतिविधि आज कार्बन उत्सर्जन से जुड़ी है। ऐसे में पेड़ ही वह एकमात्र मित्र हैं जो हमारे कथित विकास के इस गरल का पान करते हैं। क्या यह उनके जीवन की रक्षा किए जाने के लिए यथेष्ट कारण नहीं है। एक-दो लोगों के मारे जाने पर हम सड़क पर उतर आते हैं, मुआवजा, नौकरी और जाने क्या-क्या मांगने लगते हैं फिर इन बेजुबान दोस्तों के लिए हम थोड़ा हल्ल तो कर ही सकते हैं।