दुमका और रांची की दसियों चक्कर लगा चुका है शिबू पूजहर। हर बार नए इरादे के साथ राजधानी की गलियों की खाक छानता है। जेब खाली होते ही घर वापस। यह भाग-दौड़ बेमतलब नहीं... न ही इरादा लिम्का या गिनीज बुका ऑफ वल्र्ड रिकार्ड में नाम दर्ज कराना है। दो वर्षों से जारी इस मैराथन के निशाने पर कुछ है... तो वह है एक अदद नौकरी।
13 अक्टूबर 2008 को राज्य सरकार ने जब एक संकल्प जारी कर लुप्तप्राय जनताति के स्नातक युवक-युवतियों को जिलास्तरीय तृतीय वर्ग के पदों पर सीधी नियुक्ति का फरमान जारी किया तो शिबू जैसे कई युवक-युवतियों के ख्वाबों को पर लग गए। लगे भी क्यों न, सदियों से मानवीय विकास के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े शिबू के दर पर अवसर ने पहली बार दस्तक जो दी थी। सरकारी संकल्प की जानकारी मिलते ही शिबू रांची पहुंचा और नौकरी के लिए कल्याण विभाग में आवेदन जमा करा दिया। प्रक्रिया के बाद 9 अक्टूबर 2009 को कल्याण विभाग ने बोकारो के उपायुक्त को पत्र संख्या 166/2008-क-2408 के माध्यम से तीन युवतियों व एक युवक का नाम नौकरी के लिए अनुशंसा कर भेजा। इनमें दो युवतियों को नियुक्ति भी मिली। वे काम भी कर रही हैं, लेकिन शिबू पूजहर और उषा कुमारी को अब तक नौकरी नहीं मिली। कारण बताने को कोई तैयार नहीं, बेचारा शिबू तब से ही पैसे जुगाड़ कभी बोकरो तो कभी रांची के बाबुओं के दफ्तर का चक्कर काट रहा है। हर बार एक ही जवाब मिलता है जाओ काम हो जाएगा... लेकिन कब... इंतजार है शिबू को इस जवाब का।
13 अक्टूबर 2008 को राज्य सरकार ने जब एक संकल्प जारी कर लुप्तप्राय जनताति के स्नातक युवक-युवतियों को जिलास्तरीय तृतीय वर्ग के पदों पर सीधी नियुक्ति का फरमान जारी किया तो शिबू जैसे कई युवक-युवतियों के ख्वाबों को पर लग गए। लगे भी क्यों न, सदियों से मानवीय विकास के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े शिबू के दर पर अवसर ने पहली बार दस्तक जो दी थी। सरकारी संकल्प की जानकारी मिलते ही शिबू रांची पहुंचा और नौकरी के लिए कल्याण विभाग में आवेदन जमा करा दिया। प्रक्रिया के बाद 9 अक्टूबर 2009 को कल्याण विभाग ने बोकारो के उपायुक्त को पत्र संख्या 166/2008-क-2408 के माध्यम से तीन युवतियों व एक युवक का नाम नौकरी के लिए अनुशंसा कर भेजा। इनमें दो युवतियों को नियुक्ति भी मिली। वे काम भी कर रही हैं, लेकिन शिबू पूजहर और उषा कुमारी को अब तक नौकरी नहीं मिली। कारण बताने को कोई तैयार नहीं, बेचारा शिबू तब से ही पैसे जुगाड़ कभी बोकरो तो कभी रांची के बाबुओं के दफ्तर का चक्कर काट रहा है। हर बार एक ही जवाब मिलता है जाओ काम हो जाएगा... लेकिन कब... इंतजार है शिबू को इस जवाब का।
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