लातेहार के लुहूर गांव में शुक्रवार अहले सुबह झारखंड पुलिस ने अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि हासिल की। न सिर्फ नौ नक्सलियों को मौके पर मार गिराया, उनके शव और बड़ी संख्या में हथियार भी बरामद किए। अभियान के दौरान मौत और जिंदगी में काफी करीबी फासला था। पूरे अभियान में बेहद सक्रिय भूमिका निभाने वाले रांची निवासी एसडीपीओ अश्विनी कुमार सिन्हा ने बताया कि पुलिस को कोई नुकसान नहीं होने के पीछे अच्छी रणनीति, सावधानी और भगवान की कृपा रही। 2000 में बीपीएससी से डीएसपी बनने के बाद हमेशा उग्रवाद प्रभावित जिलों में रहने वाले अश्विनी बताते हैं कि इन जिलों में सफलता के लिए योजना, सावधानी और स्थानीय परिस्थिति के अनुकूल तत्काल निर्णय जरूरी होता है। दस साल के करियर में अब तक उन्होंने दस से ज्यादा बड़े एनकाउंटर में भाग लिया है। इसकी शुरूआत 16 मार्च 2001 में सिवान के सांसद शहाबुद्दीन के खिलाफ हुआ था। सांसद के गांव प्रतापपुर में हुए इस मुठभेड़ में नौ अपराधी मारे गए थे, और शहाबुद्दीन के खौफ का साम्राज्य टूटा था। इसके बाद, जनवरी 2002 में रोहतास के गायघाट खोई में नक्सलियों के बड़े ट्रेनिंग कैंप को धवस्त किया गया। मई 2003 में झारखंड कैडर मिलने के बाद इसी वर्ष अगस्त में हुसैनाबाद के सीताचुआं, 2005 में झुमरा पहाड़ी के अभियान में इनके नेतृत्व में बड़ी सफलता प्राप्त की गई। 2009 में बरवाडीह केचकी गांव में अकेले दम संघर्ष कर खुंखार उग्रवादी कारगिल को पकडऩा अपने जीवन की अहम उपलब्धि मानने वाले अश्विनी कुमार की शिक्षा स्थानीय सेंट जॉन्स स्कूल और सेंट जेवियर्स कॉलेज में हुई है।
Sunday, January 30, 2011
Monday, January 24, 2011
दोहरे व्यक्तित्व से उच्च शिक्षा का बेड़ा गर्क
उच्च शिक्षण संस्थानों में पद पर बने रहने के लिए दोहरे व्यक्तित्व वाले लोगों की भरमार हो गई है। ऐसा ही ताजा उदाहरण इस्लामी शिक्षण संस्था 'दारुल उलूम देवबंदÓ के नए कुलपति मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी ने प्रस्तुत किया है। कुलपति बनते ही उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की काफी प्रशंसा की कहा, मोदी के राज्य में काफी तेजी से विकास हो रहा है और इसका लाभ मुसलमानों को भी मिल रहा है। गुजरात सरकार की नौकरियों में भी मुसलमानों को स्थान मिल रहा है। अब इस ब्यान का जैसे ही देवबंद के छात्रों ने विरोध किया 'विद्वानÓ मौलाना वस्तानवी साहब पलट गए। छात्रों ने वस्तानवी के इस्तीफे की मांग की है। वस्तानवी ने देवबंद पहुंच कर अपने पूर्व के बयान पर सफाई देते हुए कहा कि मोदी को खुदा भी माफ नहीं करेगा। बावजूद इसके छात्रों का गुस्सा कम नहीं हो रहा वे वस्तानवी से इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।
वस्तुत: वस्तानवी को इस्तीफा दे देना चाहिए। दोहरे चरित्र के ऐसे लोगों को उच्च्च शिक्षा के उच्च्च पदों पर बैठने से वैचारिक भ्रष्टाचार बढ़ेगा। जो व्यक्ति अपने मूल विचार पर दृढ़ नहीं रह सके वह भला नौजवानों को चारित्रिक दृढ़ता की शिक्षा कैसे देगा।
वस्तुत: वस्तानवी को इस्तीफा दे देना चाहिए। दोहरे चरित्र के ऐसे लोगों को उच्च्च शिक्षा के उच्च्च पदों पर बैठने से वैचारिक भ्रष्टाचार बढ़ेगा। जो व्यक्ति अपने मूल विचार पर दृढ़ नहीं रह सके वह भला नौजवानों को चारित्रिक दृढ़ता की शिक्षा कैसे देगा।
Saturday, January 22, 2011
रांची से जुड़ा है नेताजी का महाप्रयोग
नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय जनमानस में बिल्कुल अलग क्रांतिकारी, अध्यात्मिक, प्रगतिशील और सर्वसमावेशी छवि से जाने-पहचाने जाते हैं। उनकी प्रखरता ने देश को काफी कुछ दिया। 1939 में गांधीजी से मतभेद के बाद जब उन्होंने फारवर्ड ब्लॉक के स्थापना का मन बनाया तो इसके चिंतन प्रक्रिया में रांची की माटी का अहम योगदान रहा। फारवर्ड ब्लाक की स्थापना हो या फिर देश से बाहर निकल स्वतंत्रता के लिए आजाद हिंद फौज के गठन जैसा राजनीतिक महाप्रयोग, सभी में झारखंड की माटी का योगदान रहा। दीगर रहे कि देश से बाहर निकलने के लिए नेताजी कोलकाता से धनबाद पहुंचे थे। गोमो रेलवे स्टेशन से ट्रेन पकड़ नेताजी जो गए तो फिर लौट कर नहीं आए। वहीं रामगढ़ अधिवेशन में 'फारवर्ड ब्लॉकÓ की स्थापना करने नेताजी का काफीला रांची से ही निकला था। तब नेताजी रांची के डा. फणींद्र नाथ चटर्जी की नई फीएट रोल्स बीआरएन-70 पर सवार हो रामगढ़ पहुंचे थे। फूलों से सजी गाड़ी खुद डा. फणींद्र नाथ चला रहे थे उसमें नेताजी के साथ यदुगोपाल मुखर्जी और उनके एक दो करीबी बैठे थे। फारवर्ड ब्लाक की रूप रेखा तैयार कर लेने के बाद सुभाष बाबू कोलकाता से जमशेदपुर, तमाड़, बुंडू, खूंटी होते रांची पहुंचे थे। यहां उनका जोरदार स्वागत हुआ। रांची में उनके प्रमुख सिपहसलार यदुगोपाल मुखर्जी (रांची के प्रसिद्ध चिकित्सक डा. सिद्धार्थ मुखर्जी के पिता) थे। यदुबाबू खुद बंगाल में सक्रिय क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति के सक्रिय सदस्य थे। अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण अगस्त 1928 में बंगाल से निष्कासित होने के बाद उन्होंने रांची में अपना ठिकाना बनाया। क्रांतिकारियों के प्रति सहानुभूति के कारण नेताजी की यदुगोपाल मुखर्जी से घनिष्ठता थी। यदु बाबू की प्रखर राजनीतिक समझ के कारण नेताजी प्राय: उनसे राजनीतिक विमर्श भी किया करते थे।
12 फरवरी 1938 में कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद महात्मा गांधी से कई बिंदुओं पर उनकी असहमति रही। फलत: गांधीजी ने अध्यक्ष के तौर पर उनके दूसरे कार्यकाल का विरोध किया और अपने निकटस्थ पट्टाभी सीता रमैया को उनके खिलाफ खड़ा कर दिया। गांधी जी के खुले समर्थन के बावजूद नेताजी ने रमैया को हरा दिया। लेकिन इसके बाद उनके लिए कांग्रेस के अंदर काम करना आसान नहीं रहा। उन्होंने अलग पार्टी बनाने की ठान ली। इस विचार को अंजाम देने के पूर्व नेताजी यदुगोपाल मुखर्जी से मिले। बकौल यदुगोपाल के पुत्र डा. सिद्धर्थ मुखर्जी नेताजी ने उनके पिता से कहा कि गांधी जी भारतीय राजनीतिक जागरण के मुख्य आधार हैं मेरा उनसे कोई विरोध नहीं हमारे उद्देश्य समान है लेकिन रास्ते अलग हो रहे हैं। 22 मार्च 1938 में भी उन्होंने कोलकाता से पत्र लिख यदु बाबू को विचार विमर्श के लिए बुलाया। कांग्रेस से इस्तीफा देने के बाद जब उन्होंने 1939 के रामगढ़ कांग्रेस में फारर्वड ब्लाक की घोषणा की उसके पूर्व कई बार उन्होंने यदुबाबू, डा. फणींद्र नाथ चटर्जी आदि से विचार विमर्श किए।
12 फरवरी 1938 में कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद महात्मा गांधी से कई बिंदुओं पर उनकी असहमति रही। फलत: गांधीजी ने अध्यक्ष के तौर पर उनके दूसरे कार्यकाल का विरोध किया और अपने निकटस्थ पट्टाभी सीता रमैया को उनके खिलाफ खड़ा कर दिया। गांधी जी के खुले समर्थन के बावजूद नेताजी ने रमैया को हरा दिया। लेकिन इसके बाद उनके लिए कांग्रेस के अंदर काम करना आसान नहीं रहा। उन्होंने अलग पार्टी बनाने की ठान ली। इस विचार को अंजाम देने के पूर्व नेताजी यदुगोपाल मुखर्जी से मिले। बकौल यदुगोपाल के पुत्र डा. सिद्धर्थ मुखर्जी नेताजी ने उनके पिता से कहा कि गांधी जी भारतीय राजनीतिक जागरण के मुख्य आधार हैं मेरा उनसे कोई विरोध नहीं हमारे उद्देश्य समान है लेकिन रास्ते अलग हो रहे हैं। 22 मार्च 1938 में भी उन्होंने कोलकाता से पत्र लिख यदु बाबू को विचार विमर्श के लिए बुलाया। कांग्रेस से इस्तीफा देने के बाद जब उन्होंने 1939 के रामगढ़ कांग्रेस में फारर्वड ब्लाक की घोषणा की उसके पूर्व कई बार उन्होंने यदुबाबू, डा. फणींद्र नाथ चटर्जी आदि से विचार विमर्श किए।
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