Tuesday, October 31, 2017

आदिवासी की पहचान सरना, हिंदुत्व नहीं

शारदा पीठ के शंकराचार्य राजराजेश्वराश्रम जी ने रांची में आदिवासियों को हिंदू बता नाहक का विवाद खड़ा कर दिया है। आदिवासी प्रकृतिपूजक हैं इसमें कोई विवाद नहीं। मैं ये भी मानता हूं कि अन्य धर्मों के मुकाबले आदिवासियों की मान्यता हिंदुओं की मान्यता से सबसे ज्यादा नजदीक है। आदिवासी पेड़, जंगल, पहाड़ की शक्तियों को पूजते हैं हिंदू भी पूजते हैं, सांप व वन्य जीवों को दोनों पूजते हैं। कई प्रतीक चिन्ह भी समान हैं। इन तमाम वैचारिक साम्यता और धार्मिक मान्यता की नजदीकी के कारण आदिवासियों को हिंदू नहीं कहा जा सकता। वह अपनी पहचान को सरना या आदिवासी के रूप में ही रखना चाहते हैं तो किसी को क्या परेशानी होनी चाहिए। शंकराचार्य की पदवी हिंदू समाज में काफी ऊंची है, इस पद पर विराजने वाले महानुभावों को भी आदि शंकराचार्य की परंपरा को अपने कार्य-व्यवहार में हमेशा याद रखना चाहिए। हिंदुत्व की विशाल समावेशी शक्ति को और परिष्कृत करें, तार्किक और समयानुकूल बनाएं... इससे ज्यादा और कुछ की आवश्यकता नहीं। वैसे भी प्रचार, सेवा और कहीं-कहीं प्रलोभन के प्रभाव बड़ी संख्या में आदिवासी इसाई बने हैं। एक ईश्वर, एक पुस्तक, एक पद्धति के दायरे में बंधने के करण ऐसे लोगों में आदिवासियत की उन्मुक्तता नहीं रह जाती। बड़ी संख्या में आदिवासी युवतियों से मुस्लिम युवकों की शादी भी हो रही है। इस तरह आदिवासियों की एक संख्या मुस्लिम भी बन रहे हैं और आदिवासी पहचान भी खो रहे हैं। वहीं कई आदिवासी अब सरना धार्मिक मान्यता के साथ ही हिंदू पूजा पद्धति भी अपनाने लगे हैं बावजूद इसके वो पूरी तरह से आदिवासी हैं। इन तमाम सामाजिक गतिशीलता के बीच भी हम आदिवासियों के हित-अहित की बात सोचने वाले उनकी पहचान बदलने की पहल नहीं कर सकते। माननीय इसलिए निवेदन है कि आदिवासियों पर हिंदुत्व पहचान नहीं थोपें... उन्हें उनकी पहान के साथ ही जीने, चहकने और पनपने दें। 
प्रवीण प्रियदर्शी, रांची

Wednesday, October 25, 2017

ऋगवेद में मिलता है सूर्य वंदना का पहला उल्लेख



छठ सूर्योपासना का अनुपम लोकपर्व है। पूर्वी भारत के बहुत बड़े भाग में इसे धूमधाम से मनाया जाता है। वस्तुत: सूर्य की सृष्टि और पालन शक्ति के कारण सूर्योपासना सभ्यता के विकास के साथ ही विभिन्न स्थानों व संस्कृति में अलग-अलग रूप में प्रारंभ हो गई। हां भारत में सूर्योपासना को विशेष महत्व मिला, यहां इसे सर्जक, पालक के साथ ही आरोग्य और अक्षय ऊर्जा का स्रोत माना गया। ऋगवेद में पहली बार देवता के रूप में सूर्य की वंदना की गई। इसमें सैकड़ों ऋचाओं में सूर्य की महिमा और वंदना की गई है। इसके बाद अन्य वेदों के साथ ही उपनिषद, पुराण व अन्य ग्रंथों में इसकी चर्चा प्रमुखता से हुई। निरुक्त के रचियता यास्क ने भी देवताओं में सूर्य को पहले स्थान पर दिया है। उत्तर वैदिक काल के अंतिम कालखंड में सूर्य के मानवीय रूप की कल्पना होने लगी। इसने कालांतर में सूर्य की मूर्ति पूजा का रूप ले लिया। पौराणिक काल आते-आते सूर्य पूजा और प्रचलित हो गई। देश के कई स्थानों पर सूर्य देव के मंदिर भी बने। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन सांग ने 641 ई में नालंदा  विश्वविद्यालय से दो किलोमीटर दूर गडग़ांव में बालार्क सूर्य मंदिर व मूलस्थान (मूलतान) में आदित्य मंदिर देखने का वर्णन किया है। पौराणिक साहित्य में देश के बारह सूर्य मंदिरों का वर्णन मिलता है।

शाम्ब माने जाते हैं सूर्य मंदिरों निर्माता

पौराणिक काल से सूर्य को आरोग्य देवता भी माना जाता है। सूर्य की किरणों में कई रोगों को नष्ट करने की क्षमता पाई गई। ऋषि-मुनियों ने अपने अनुसंधान के क्रम में किसी खास दिन इसका प्रभाव विशेष पाया। संभवत: यही छठ पर्व (सूर्य षष्ठी) के उद्भव की बेला रही हो। सूर्य की आरोग्य क्षमता के विषय में प्रसिद्ध आख्यान भी हैं। पुराणों के अनुसार भगवान कृष्ण के पुत्र शाम्ब को कुष्ठ हो गया, तो इससे निजात के लिए उन्होंने ऋषि कटका के कहने पर सूर्योपासना प्रारंभ की। इसके लिए विशेष रूप से शाक्य द्वीप से मग ब्राह्मणों को आमंत्रित किया गया। बारह वर्ष की उपासना के बाद शाम्ब स्वास्थ्य हुए तो उन्होंने मूलतान, कोणार्क सहित कई स्थानों पर सूर्य मंदिर का निर्माण कराया। कालांतर में विभिन्न राजाओं ने इन मंदिरों का जीर्णोद्धार करा इसे भव्य रूप दिया। सूर्य और इसकी उपासना की विशेष चर्चा विष्णु पुराण, भगवत पुराण, ब्रह्म वैवर्त पुराण आदि में विस्तार से किया गया है।

छठी मैया की संकल्पना

सूर्य के सात घोड़े उससे निकलनेवाली सात किरणों का द्योतक है तो सूर्य की पालनहारी छह शक्तियां में अंतिम षष्टी छठी मैया मानी जाती हैं। कई ग्रंथों में इसे सूर्य की बहन बताया गया है। इन्हें बच्चों का संरक्षक भी माना जाता है। इसलिए छठी मैया की महिमा छठ पर्व के मूल में है। बच्चे के जन्म के छठे दिन छठी मनाने की परंपरा में भी यही छठी मैया की महिमा है। सूर्य के अस्ताचलगामी व उदीयमान रूप को अघ्र्य उनकी दो पत्नियों उषा व प्रत्युषा के नाम पर दिया जाता है। अस्ताचलगामी सूर्य को अघ्र्य प्रत्युषा को समर्पित होता है तो उदीयमान सूर्य को अघ्र्य उषा को समर्पित होता है। उषा को ऋगवेद के अनुसार मानव मन में आध्यात्मिक ऊर्जा के उद्भव का स्रोत भी माना जाता है।
प्रवीण प्रियदर्शी, रांची


Tuesday, October 24, 2017

भारतीय पर्व परंपरा में विभाजक रेखा है छठ

लोक आस्था के महापर्व छठ की धार्मिक महत्ता से कौन परिचित नहीं। आरोग्य के साथ ही सुख-समृद्धि व लोकाचारी समानता का यह पर्व पूर्वी भारत से होता अब देश के लगभग सभी शहरों में लोकप्रिय हो चुका है। धार्मिक महत्ता के इतर भारत में सामाजिक परिवर्तन के वाहक व वैदिक सनातनी धार्मिक परंपरा से बिलकुल अलग रेखा खींच इसे व्यापक जन स्वीकृति दिलाने के कारण छठ को हम भारतीय पर्व परंपरा के प्रवाह में गहरी विभाजक रेखा मान सकते हैं। वैदिक-सनातनी व पौराणिक धार्मिक परंपरा में कर्मकांड की जटिलता व पुरोहित वर्ग के वर्चस्व से मुक्त शुद्ध लोकाचारी धार्मिक परंपरा का उद्भव कोई हंसी-खेल नहीं था। इस विद्रोही उद्भव के बीच वैदिक-पौराणिक मान्यता के साथ ही लोकाचार व जन मान्यता के सामंजस्य ने इस पर्व को अनूठा स्वरूप प्रदान किया। पुरोहित वर्ग व कर्मकांड का दखल नहीं होने से यह पर्व सफलता पूर्वक समता का भाव संचारित करता है। कोई भी, कहीं भी बिना किसी भेद-भाव के इस व्रत को अपनी श्रद्धा के अनुसार कर सकता है। रूढ़ी, कर्मकांड व पुरोहितों के विशेष महत्व के इर्द-गिर्द बुने हमारे पर्व-त्योहारों के बीच छठ की इस विशेषता व लोकाचारी स्वरूप ने इसे पर्व से ज्यादा जनसाधारण का उत्सव बना दिया। यह मान्यता और इसकी स्वीकृति भारतीय पर्व परंपरा में किसी क्रांति से कम नहीं है।
स्त्री और कन्या की महत्ता
लोकपर्व होने के कारण आम सामाजिक जीवन की तरह इसकी बड़ी खासियत है स्त्री और कन्या की महिमा को स्वीकारना। भारतीय पर्व परंपरा में शायद यह पहला पर्व है जिसमें सूर्य देव से पुत्री की कामना की गई है। पर्व के दौरान मंत्रोच्चार तो होते नहीं सो लोक गीतों में इसकी भावना अभिव्यक्त होती है। सूर्य देव से पुत्री की कामना करते हुए व्रतियों द्वारा गाया जाने वाला यह गीत 'रूनकी-झूनकी बेटी मांगी ला...पढ़ल पंडित दामादÓ कई अनकही बातें कह जाता है। यहां पंडित शब्द भी शास्त्रीय नही लोकाचारी है और पढ़े-लिखे दामाद की कामना को अभिव्यक्त करता है। भारतीय पर्व परंपरा में किसी भी पुरूष प्रधान समाज की तरह प्राय: पुत्र की प्राप्ति, पुरुषों के दीर्घायु व बलवान होने की कामना करते हुए महिलाओं के अनेकों पर्व हैं। लेकिन छठ ऐसा लोक पर्व है जिसमें न सिर्फ सूर्य देव से बेटी की मांगी जाती है, और यह कामना स्त्री-पुरुष दोनों समान रूप से करते हैं। इस तरह पर्व की भावना पर व्यक्तिवादी-जातिवादी अहम गौण हो जाता है।
स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना
पर्व की एक और भौतिकवादी विशेषता है, वह है स्वास्थ और समृद्धि। स्वास्थ ही धन व समृद्धि का द्योतक माना जाता है। आज भी कहते हैं हेल्थ इज वेल्थ। इस दृष्टि से यह लोकाचारी, समता और सुख-समृद्धि के महापर्व का प्रतिनिधि बनता है।
प्रवीण प्रियदर्शी, रांची

Friday, October 20, 2017

सनातन समाज में सामाजिक-आर्थिक संघर्ष से उभरे कायस्थ


भारतीय समाज संरचना को जो स्थायित्व वैदिक काल में मिला था उसे उत्तर वैदिक काल आते-आते कई चुनौतियों से मुखातिब होना पड़ रहा था। नये उद्योगधंधों और आर्थिक कार्य व्यवहार ने सामाजिक संरचना में परिवर्तन की शर्त रख दी, तो लगातार मजबूत होते राजतंत्रीय व्यवस्था के सामने अपने आर्थिक और प्रशासनिक मामलों का रिकार्ड रखना भी जरूरी हो गया। गौतम बुद्ध, भगवान महावीर जैसे विचारकों ने वैदिक दर्शन को चुनौती देते हुए सामाजिक पुनर्संरचना को अहम मुद्दा बना दिया। मगध साम्राज्य के विस्तार और मौर्यों के विस्तृत नौकरशाही में लेखा और आंकड़ों का संचयन बेहद महत्वपूर्ण हो गया था। इसी काल खंड के पौराणिक ग्रंथों व स्मृति में लेखकीय कार्य के लिए एक नई जाति 'कायस्थÓ का वर्णन मिलना प्रारंभ होता है।

भारतीय समाज व्यवस्था में नई हलचल

इतिहासकारों का मानना है कि लेखकीय और वैद्य के कार्य वर्ण से बंधे हुए नहीं थे। बदलते राजनीतिक और सामाजिक परिस्थिति में जब इसकी महत्ता बढ़ी तो इन कार्यों के प्रति कई लोग आकृष्ट हुए। इसमें संभवत सभी वर्ण के लोग थे लेकिन उच्च वर्ण की बहुलता होने के कारण चित्रगुप्त को विष्णु के काया से उत्पन्न माना गया, और उन्हें कायस्थ उपाधि दी गई। संस्कृत शब्दों की संरचना के वैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर तीसरी शताब्दी के ग्रंथ माने जाने वाले याज्ञवल्क्य स्मृति में पहली बार कायस्थ जाति और उनके कार्यों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। ऐसा नहीं कि इसके पहले यह वर्ग नहीं था, ये थे लेकिन सनातन समाज व्यवस्था के लिए अहम एक जातीय पहचान अभी नहीं मिली थी। काम की समानता के आधार पर विभिन्न वर्णों से आये लोग एक लंबे कालखंड के बाद एक जाति के रूप में संगठित हो गये थे, और याज्ञवल्क्य इसी सच्चाई को बयान कर रहे थे। यह भारतीय समाज व्यवस्था में एक नई हलचल थी, जिसमें महज काम और प्रगतिशीलता के आधार पर एक नई जाति ही अस्तित्व में आ गई। यह भारतीय संदर्भ में बिना औद्योगिक क्रांति के एक मध्यम वर्ग के उद्भव की गाथा है।

गुप्तकाल से मिली खास पहचान

गुप्त काल में तो साम्राज्य के पांच प्रमुख पदों में एक प्रमुख कायस्थ का पद भी शामिल कर लिया गया। इसके बाद तो उत्तरी, पश्चिमी और पूर्वी भारत के अधिकतर राज्यों में लेखा, जमीन संबंधी दस्तावेज व अन्य लेखकीय कार्य इस जाति के हाथ आ गया। गुप्तों ने बड़ी संख्या में बंगाल में कार्य के लिए कन्नौज व अन्य क्षेत्रों से ब्राह्मण और कायस्थों को बंगाल भेजा था। बंगाल के पालवंश के दौरान कई शासक कायस्थ जाति के थे। आईने अकबरी के लेखक अबुल फजल अपनी पुस्तक में इसकी पुष्टि करते हैं। आर्थिक विशेषज्ञता के कारण इस जाति के प्रखर लोग कई बार प्रधानमंत्री जैसे पद पर काबिज हुए। बारहवीं शताब्दी में कश्मीर के प्रसिद्ध ग्रंथ राजतरंगणी के लेखक कल्हण ने लिखा है कि कश्मीर के कई राजाओं के प्रधानमंत्री और खजांची कायस्थ जाति के लोग हैं। उन्होंने कायस्थों में व्याप्त भ्रष्टाचार का भी जिक्र किया है। अनेकों विद्वान इसे कायस्थों से ब्राह्मणों को मिल रही चुनौती से उपजे विद्वेष के रूप में भी देखते हैं। मध्यकाल के प्रारंभ में चंदेल, कलचुरी और प्रतिहार राजाओं के बीच कायस्थ अपनी दक्षता से काफी लोकप्रिय थे। कुछ तो लेखकीय औैर मंत्री कार्य से इतर सेनापति के पद तक पहुंच गए।

मध्यकाल में हुए शक्तिशाली

मध्यकाल में मुसलमानों के आने के बाद यह जाति और शक्तिशाली हो गई। अरबी, फारसी सीख कायस्थ राजकीय कार्य के लिए मुसलमानों की पहली पसंद बन गए। इस जाति के राजा टोडरमल मुगल सम्राट अकबर के नवरत्नों में शामिल थे। उन्होंने भू राजस्व का जो मॉडल मुगलों के लिए बनाया वह लगभग अब तक देशभर में लागू है। अबुल फजल तो यह भी कहते हैं कि बंगाल के अधिकतर जमींदार भी कायस्थ जाति के ही थे। जब अंग्रेज शासक हुए तो एक बार फिर कायस्थों ने प्रशासनिक और लेखकीय कार्य के लिए अपनी योग्यता सिद्ध की।

बने अंग्रेजों की पहली पसंद

अंग्रेजी सिखने वाले ये पहली जमात के लोगों में शामिल थे। इस काल में लगभग 40 फीसद सरकारी पदों पर ब्राह्मण और कायस्थों का वर्चस्व था। भू अभिलेख में तो इनका वर्चस्व कुछ इस तरह था कि इन्होंने अपनी लिपि 'कैथीÓ ही विकसित कर ली। इसी में अब भी कई क्षेत्रों के भू अभिलेख मिलते हैं। इस काल में राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तन ने जब सेवा के नये अवसर सृजित किये तो वकील, बैरिस्टर बनने वाले सबसे पहले जमात में कायस्थ ही शामिल थे। सिर्फ प्रशासनिक, लेखकीय व आंकड़ा संचयन के कार्य में ही इस जाति का वर्चस्व नहीं रहा, सामाजिक परिवर्तन और देश के स्वतंत्रता संग्राम में भी इस जाति ने बढ़चढ़कर भाग लिया। स्वामी विवेकानंद, संत अरविंदो, खुदीराम बोस, सुभाषचंद्र बोस, जय प्रकाश नारायण, डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे कई प्रमुख लोगों ने इस जाति की प्रगतिशीलता और राष्ट्रप्रेम की गाथा रची।

पहचान का संघर्ष

जाति के रूप में अस्तित्व में आने के बाद सनातन सामाजिक व्यवस्था के किस वर्ण में इन्हें रखा जाए, इसे लेकर हमेशा उहापोह की स्थिति बनी रही। पुरान कालीन कई ग्रंथ इन्हें क्षत्रियों से उपर लेकिन ब्राहमणों से नीचे का दर्जा देता है तो कई इन्हें सीधे शूद्र बताता है। हां बंगाल में इन्हें हमेशा कुलीन का दर्जा मिला। मुगलकालीन ग्रंथ आइने अकबरी में वर्ण के झंझट से अलग इन्हें पांचवें वर्ण का दर्जा दिया गया। पहचान का संघर्ष अंग्रेजों के न्यायालय में भी पहुंचा। जहां हर्बर्ट होप रिज्ले द्वारा मिताक्षरा के आधे-अधूरे अंग्रेजी अनुवाद के आधार पर कोर्ट ने कायस्थों को शूद्र माना। इसके खिलाफ न्याय का संघर्ष चलता रहा 1890 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इन्हें क्षत्रिय का दर्जा दे दिया वहीं 1927 में पटना हाईकोर्ट ने इन्हें उच्च जाति का बताया, जिसके आधार पर 1931 के जनगणना में उन्हें इसी वर्ग के तहत रखा गया।

भूख और भूख जनित बीमारी के बीच गूंज रही खामोश संतोषी की चीख



राशन कार्ड के आधार से लिंक नहीं होने के कारण एक अति निर्धन परिवार का राशन रोकना राष्ट्रद्रोह से कम अपराध नहीं। जिस किसी व्यक्ति या तंत्र ने ऐसा किया उसने संविधान प्रदत्त सरकार के मौलिक कर्तव्य की राह बाधित की है। जब संविधान की राहें जनता तक पहुंचने से अवरुद्ध होती है तभी उग्रवाद और नक्सलवाद पैदा होता है। इसलिए दस वर्षीय संतोषी की मौत के कारकों को मैं राष्ट्र के खिलाफ षठ्यंत्र मानता हूं। ऐसे षठ्यंत्रपूर्ण वातावरण में पीडि़त परिवार की बच्ची की मौत भूख से होती है या बीमारी के दौरान लगातार भूखे पेट रहने से उत्पन्न मर्मांतक कमजोरी या और गंभीर हो गई बीमारी से... यह मायने नहीं रखता।
सिमडेगा के जलडेगा प्रखंड के कारीमाटी बस्ती में भूख के तकनीकी शब्दों के बीच मृत दस वर्षीय संतोषी चीख-चीखकर सरकार और व्यवस्था से ऐसे ही कई और भूखों के लिए न्याय मांगती रहेगी। माननीय और बाबू लोग जो भी कहें लेकिन... ये मौत सिर्फ और सिर्फ सरकारी व्यवस्था और अफसरशाही की असंवेदी असफलता की गंदी गाथा ही कहलाएगी। अपनी खाल बचाने के लिए दोनों ही भूख से मौत और भूख जनित बीमारी से मौत के मायने समझाने लग पड़े हैं। जबकि सच्चाई पीडि़तों की आंखों का दर्द व घर में लुढ़क रहे ठनठनाते खाली बर्तन बयान कर रहे हैं। संतोषी की मां कोइली कह चुकी है कि राशन नहीं होने के कारण वह बेटी को कई दिनों से खाना नहीं दे पाई थी। कई दिनों तक उनका परिवार साग-पात खाकर भी रहा है। आधार से राशन कार्ड के जुड़े नहीं होने के कारण पीडीएस डीलर ने उसे राशन नहीं दिया। आधार की महत्ता और सेवाओं की गुणवत्ता पर सवाल उठाए बिना मैं समाज के अंतिम व्यक्ति के भोजन के अधिकार को बेहद मौलिक और किसी भी आधार या दस्तावेज से बड़ा मानता हूं। ऐसे में सरकार सिर्फ जवाब न दे दोषी पर सीधी कार्रवाई हो।