Wednesday, December 12, 2018

हिंदुत्व के मुद्दे पर उदासीनता से डूबी भाजपा की नैया



पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में हिंदी भाषी तीन राज्यों में भाजपा की हार ने एक बात स्पष्ट कर दिया कि ईमानदार छवि, कर्मठता और विकास भारतीय राजनीति में लोकतांत्रिक जीत की गारंटी नहीं। इस चुनाव में भाजपा को हार विपक्षियों के कारण नहीं बल्कि खुद के नेतृत्व के नीतिगत ऊहापोह के कारण मिली। विकास किसी भी सरकार का मुख्य एजेंडा होता है, हर सरकार अपने-अपने ढंग से विकास योजनाएं लागू करती है। हर कोई अपने विकास को सर्वश्रेष्ठ और सबसे तेज बताता है चाहे जमीनी हकीकत कुछ भी हो। कुछ लोग इसी में जीने-खाने, सुख-समृद्धि के सपने भी साकार करते हैं, भारत में विकास कार्यों में भ्रष्टाचार वास्तव में हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अहम हिस्सा है मोदी ने इसे चुनौती देने की भूल कर कई विरोधी बना लिए। पार्टी यी भूल गई कि सबका विकास तो अहम है लेकिन इससे सबका साथ नहीं मिलता।
यह हार का एक कारण तो रहा ही लेकिन सबसे अहम कारण हिंदुत्व के मुददे पर सरकार की ऊहापोह की नीति रही। लगातार जीत के लिए जनवादी मुद्दों के साथ मजबूती से खड़े होना भी काफी अहम है। मोदी 2014 में जब एक राज्य के मुख्यमंत्री से आगे निकल राष्ट्रीय फलक पर उभरे तो उन्हें लोगों ने महज विकास के कारण नहीं बल्कि हिंदुत्व के मजबूत पक्षकार के रूप में अपना समर्थन दिया। उनकी चुनाव सभाओं में उमडऩे वाली भीड़ उनमें एक हिंदू हीरो की छवि देख रही थी। मोदी इस अपेक्षा से अनभिज्ञ भी नहीं थे लेकिन उन्होंने जन आकांक्षा को विकास से नजरंदाज करने की कोशिश की। लोगों का मोदी पर इतना विश्वास था कि उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि मोदी राम मंदिर जैसे मुद्दे को दरकिनार कर देंगे। राम मंदिर करोड़ों हिंदुओं के लिए जीवन मारण का सवाल है। यह महज एक आंदोलन नहीं देश और हिंदुत्व की पहचान है। इस धोखे से लोग तिलमिला गए वहीं विपक्षी अपने नरम रवैये से इस बेहद संवेदनशील मुद्दे पर हिंदुओं में भ्रम फैलाने और खुद को कम से कम इस मामले में मोदी के समकक्ष दिखाने में सफल रहे। कांग्रेस तो यह कहने तक की हिम्मत कर गई कि राम मंदिर कोई मोदी नहीं कांग्रेसी प्रधानमंत्री ही बनाएगा। सरकार इस बेहद अहम मुद्दे पर सफल अभियान का कोई स्पष्ट नीति प्रस्तुत करने में असफल रही। वहीं मॉब लिचिंग के आरोप में पकड़े गए हिंदुओं पर तो सरकार गरम रही लेकिन गोहत्या के आरोपियों पर कांग्रेस जैसी नरम नीति का ही पोषण करती रही। राजस्थान सरकार ने ऐसे कई ऐसे कदम उठाए जो कांग्रेसी सरकारें भी उठाने पर दस बार सोचती। प्रवीण भाई तोगडिय़ा को अपमानित करने से भी हिंदुओं के विश्वास को ठेस पहुंचा। यह किसी के गले नहीं उतरी के वर्षों से हिंदुओं की सेवा करने वाला व्यक्ति अचानक कैसे एक हिंदुवादी संगठन में हाशिए पर आ गया। वहीं देशभर में हिंदुओं पर हमले कम नहीं हुए न ही सरकार ने ऐसे हमलों पर कभी कोई कड़ी कार्रवाई की। प्रशासनिक अधिकारी हिंदुओं के प्रदर्शन पर तो लाठी भांजते रहे लेकिन अन्य समुदायों के ऐसी ही प्रदर्शन पर मौन रहे। इन सबसे बढ़कर एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के रूलिंग के खिलाफ संशोधन ने सरकार की एससी/एसटी तुष्टिकरण की जिद को सार्वजनिक कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने नैसर्गिक न्याय के मूल सिद्धांत पर फैसला दिया था। इसे पलट सरकार ने अपने मूल मतदाता वर्ग को तो नाराज किया ही बुद्धिवादी बहस में भी भाजपा की स्थिति कमजोर की। 

Thursday, December 6, 2018

आरयू छात्रसंघ चुनाव में खुला असली-नकली का भेद

प्रदेश के सबसे प्रतिष्ठित रांची विश्वविद्यालय के 2018 के छात्रसंघ चुनाव के परिणाम ने छात्र राजनीति के असली-नकली चेहरों पर से पर्दा हटा दिया है। कौन संगठन छात्रों के बीच है और कौन चौराहे पर यह स्पष्ट हो चुकी है। छात्रसंघ चुनाव में बेहद कम मतदान भी छात्र संगठनों की अनुपयोगिता दर्शाने को आतुर है। अगर छात्राओं ने बढ़-चढ़कर मतदान नहीं किया होता तो मतदान प्रतिशत और भी कम होता। इस संबंघ में विभिन्न संगठनों कोे मिले मत प्रतिशत काफी रोचक होंगे। सच मानिए अधिकतर संगठनों को 2-3 फीसद से ज्यादा मत नहीं मिला होगा। लेकिन इनकी अलोकतांत्रिक अकड़ इन्हें रणनीति और नेतृत्व पर विचार करने से जरूर रोक देगी। 
वहीं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की शानदार जीत उनके संगठन की गतिशीलता, समर्पित कार्यकर्ताओं की लंबी कड़ी और सिद्धांत की धार दिखाती है। आदिवासी छात्र संघ ने ग्रामीण व खासकर आदिवासी छात्रों के बीच अपनी पकड़ को एक बार फिर सिद्ध किया है इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में अभाविप के लिए नई चुनौती भी रेखांकित हो गई है। एनएसयूआइ, झारखंड छात्र मोर्चा, वाम दलों के छात्र संगठनों की पतली हालत ने इनके संगठन से लेकर राजनीतिक तौर-तरीके और आंतरिक लोकतंत्र पर सवाल उठा दिया है। एनएसयूआइ हो या जेसीएम इन संगठनों में वर्षों से कुछ गिने-चुने छात्र (अब तो उनका पढ़ाई-लिखाई से कोई संबंध भी नहीं) ही कार्यभार संभाल रहे हैं। नाम के लिए भले ही संगठन में अध्यक्ष या सचिव का चुनाव होता हो लेकिन जमीनी नेतृत्व इनके हाथ में नहीं होती। इनमें से कई छात्र नेताओं ने विवि, कॉलेजों की कमियों को अपनी आमदनी का भी साधन बना लिया है। ऐसे छात्रों का एक सर्वदलीय या सेक्यूलर कॉक्स विवि परिसर में हावी है। जो दबंगई भी करता है, प्राचार्य, वीसी को बंधक बनाने, घेराव करने, परीक्षा की तिथि बढ़वाने, फेल छात्रों के नंबर बढ़वाने के लिए आंदोलन करने में भी माहिर है। जबकि छात्रों के लिए अब ये विषय कूड़ा-करकट हो चुके हैं। वह गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई, लैंगिक समानता और समान अवसर पर केंद्रित राष्ट्र के लिए समर्पण की राजनीति चाहते हैं, इसी दम पर जहां एबीवीपी परचम लहरा रहा वहीं अन्य संगठन पानी भर रहे हैं। जहां आदिवासी छात्र संघ ने सफलता पाई वहां भी एबीवीपी ही अधिकतर जगहों पर मुख्य मुकाबले में रही और जेसीएम जैसी आदिवासी नेतृत्व व हित का खम ठोंकने वाले तीसरे-चौथे स्थान पर खिसक गए। वाम संगठनों ने तो मानों जहर खाने की ठान ली है। झूठे तथ्यों पर राजनीति की उनके आकाओं की आदत ने छात्र संगठनों में भी गहरी पैठ बना ली है, इसका परिणाम सामने है। शायद जेएनयू जैसे चुनिंदा विश्वविद्यालय को छोड़ दें तो ये सूक्ष्मदर्शी उपस्थिति वाले जीव बन गए हैं।
प्रवीण प्रियदर्शी