राष्ट्रीय खेल एक ओर, इसकी चमक-दमक निरस और बेमानी। ताम-झाम, रंग-रोगन सब दिखावा। नाइंसाफी, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद के कारण समुचित अवसर से वंचित नौजवान भटके से, विपथगा, मांग रहे इंसाफ की रोशनी, जबकि सूबे में बड़े ओहदों और पदों पर बैठे काले लोगों की कालिमा इतनी गहरी कि कोई भी चकाचौंध फीका हो जाए।
जेपीएससी अध्यक्ष दिलीप प्रसाद के बहाने साफ-सफेद कपड़ों में शिष्ट-सभ्य भाषा बोलने वालों की जो 'काली कहानीÓ उभरी उसने 'इन काले लोगोंÓ की कालिमा की गहराई भी सार्वजनिक कर दिया। एक तो इतने विशिष्ट पद तक पहुंचने, बने रहने की कहानी काली, उसपर अंजाम दिए कारिस्तानियों की उससे भी गहरी कालिख, और अब पकड़े जाने, घिर जाने पर नहीं जानते हैं, मालूम नहीं, फलां नेता के दबाव में किया, याद नहीं जैसे साजिशी जवाब की और भी गहरी कालिमा। इन महानुभावों ने सब कुछ काला, बेहद गहरा काला कर दिया की अब रोशनी में भी नौजवानों को धोखे का आभास होने लगा है। मजे की बात इस 'काला महापुराणÓ के कई पात्र ही अब राष्ट्रीय खेल के बहाने रोशनी की बात करने लग पड़े हैं। सुदेश के भाई साहब अब डीएसपी नहीं रहे, राधाकृष्ण किशोर के भाई भी अब डीएसपी नहीं, ऐसे ही कितने ही महानुभावों के भाई-बहन, दोस्त-यार अब चिन्हित कर बीडीओ, सीओ के पद से हटाए जा चुके हैं। बावजूद इसके अब भी कुछ ऐसे भाग्यशाली हैं जो 'मौज काटÓ रहे हैं। सभी जानते हैं कि इन्हें सफल बनाने के लिए किसने क्या किया होगा, किसने किसे प्रभावित किया होगा, किसने किसे क्या दिया होगा। कितने ही युवाओं का ख्वाब-सपना छीन उन्हें अवसाद की ओर धकेलने वाले ये महानुभाव ही अब रोशनी की बात करेंगे तो भला कौन प्रेरित होगा, कौन विश्वास करेगा।
दिलीप कुमार ने जो कुछ किया, उससे सभी अवगत हैं अब निगरानी पूछताछ में बेशर्मी यह कि मैं कुछ नहीं जानते, फलां नेता के कहने पर किया, तो फलां के दबाव में किया। यह किसी शिक्षक की नहीं, साजिशों से भरे एक आपराधिक दिमाग की हरकत है। एक अध्ययन-अध्यापन, चिंतन-मनन से जुड़ा व्यक्ति तो ऐसे आरोप लगते ही पर गड़ मरे, पर आपराधिक दिमाग इसमें भी खुद को निर्दोष बताने की साजिश में व्यस्त, पहले यहां-वहां भागे-भागे फिरे, जब कोई चारा नहीं रहा तब सरेंडर तो किया लेकिन कहा मैं निर्दोष, सब कुछ इसने या उसने किया-कराया।
वाह भाई वाह! क्या दिमाग है, हो भी क्यों नहीं झारखंड लोक सेवा आयोग के सदस्य जैसे प्रतिष्ठित पद पर बहाल होने के लिए सेटिंग-गेटिंग जैसे साजिशी दिमाग को ही तो योग्यता माना जाता है। तभी तो एकेडमिक उपलब्धि शून्य रखने वाला किसी गोपाल, किसी शांति, किसी राधा-गोबिंद की लीला सीधी राह चलने वालों को नचाने में सफल हो जाता है। तभी तो महती एकेडमिक उपलब्धि वाले तपे-तपाये व्यक्तित्व के धनी किनारे बैठे रह जाते हैं और हर दरवाजे सर झुकाने वाले माननीय बन बैठते हैं। जब तक ऐसे लोग माननीय बनते रहेंगे, तब तक दिलीप, शांति, गोपाल आते रहेंगे। फिर कहां रोशनी, इसकी बात ही बेमानी, काले साम्राज्य के काले मसीहा ही लिखेंगे नई कहानी।
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