अब किस राह चले राजू ....
उम्र के अधेड़पन के प्रारंभ वाले पड़ाव पर खड़ा राजू एक बार फिर जिंदगी की नई राह चुनने के उधेड़बुन में फंसा है। समझ नहीं आ रहा किस राह चले, फिर कुछ नया करे या फिर उधर ही ...। कुछ नया करने के लिए न तो उसके पास पैसा है न ही जवानी वाला वह जोश। बार-बार स्कूल जाने वाले अपने दोनों बच्चों को देखता है और मजबूरी, लाचारी, बेचारगी में दांतें पिसता है।
आज से कोई सोलह साल पहले की बात है, राजू लोहरा उस समय 24 चाल का गबरू जवान था, लंबा डील, गहरा सांवला रंग, मजबूत काठी और अक्कड़ स्वभाव ने उसे खुद ही ग्रुप लीडर बना दिया था। गरीब आदिवासी परिवार के इस युवक का सामना जब दुनियादारी से हुई तो वह खुद में कई कमी महसूस करने लगा। लेकिन जरूरतें कब मानने वाली थीं, बीमार मां को दवा चाहिए था, बाप को दारू तो जवान बहनों को ब्याहने की जिम्मेदारी। सबने राजू को नौकरी के लिए इस-उस दरवाजे दौड़ाना शुरू किया। एक दुकान में पंद्रह सौ रुपये महीने की नौकरी मिली लेकिन यह जरूरत के हिसाब से काफी कम था, उसपर डांट-फटकार ने उसे विद्रोही बना दिया। नौकरी छोड़ परेशानी से बचने के लिए दारू का शरण लिया। फिर पता नहीं कब छिना-झपटी, चोरी-चकारी की ओर पैर बढ़ गए। इसी बीच खून के इलजाम में राजू गिरफ्तार हो गया। वहां से निकला तो अब क्या करें... वाला प्रश्न फिर सामने था। दो-चार दिन सोचने-विचारने के बाद डिस्टलरी पुल के ऊपर मुर्गा बेचने का काम शुरू किया। धंधा चल निकला, बहानों की शादी की, मां मर गई कुछ दिनों बाद बाप भी चल बसा। बहनों ने भौजाई ढ़ूंढ़ शादी करा दी। बाल-बच्चे हुए, बढ़े और स्कूल भी जाने लगे, राजू को पता ही नहीं चला इन सब में बारह-चौदह साल कैसे गुजर गए। जिंदगी मजे से पटरी पर दौड़ रही थी, राजू भी संतुष्ट था, जिंदगी सेटल लग रही थी। अचानक एक दिन अतिक्रमण हटाओ अभियान के तहत उसकी दुकान हटा दी गई। पिछले दस दिनों से ब्रिकी-बट्टा नहीं होने से पास की जमा पूंजी खर्च हो गई। राजू डरा हुआ है अब क्या होगा। अब वह क्या करे...। निराश राजू कहता है कि भैया बहुत परेशान हूं, कुछ समझ नहीं आ रहा है, क्या करें, बच्चों को स्कूल जाने से रोक नहीं सकता, अगर कुछ रास्ता नहीं निकला तो लगता है फिर वही करना पड़ेगा।
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उच्च न्यायालय के आदेश पर अतिक्रमण हटाओ अभियान तेजी से चल रहा है। इससे शहर में ताजगी और तरावट तो आई है। सड़कें खुली-खुली लग रही हैं, लोग बड़ी राहत महसूस कर रहे हैं। पहली बार बिना किसी भेदभाव, बड़े-छोटे सभी पर चल रहा अतिक्रमण का डंडा। इन सारी उपलब्धियों के बीच ऐसे 'राजूÓ भी हैं जिनके सामने 'नया रास्ताÓ चुनने की जिम्मेदारी आन पड़ी है। उन्हें जरूरत है उचित मदद और मार्गदर्शन की वरना शायद कोई राजू फिर उसी राह चल पड़ेगा।
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