Tuesday, November 17, 2020

दो राहे पर इस्लाम
हाल के दिनों में फ्रांस, कनाडा और विएना में आतंकी हमले के साथ ही पूरी दुनिया में एक बार फिर इस्लाम



की कट्टरता पर चर्चा हो रही है। वास्तव में इस्लाम आज वैश्विक बहस के दो राहे पर खड़ा है। इस्लाम का यदि कोई उदार चरित्र है तो वह खुद को अपने ही कट्टरतावादी समर्थकों से घिरा पा रहा है। इसके मूल में देखने पर स्पष्ट होता कि एक दोहरी सोच के आवरण ने इस्लाम को काफी नुकसान पहुंचाया है और आज दुनिया भर में इसे शंका के नजर से देखा जाता है। जब मुस्लिम इस्लामी देशों में होते हैं तो वो कभी धर्मनिरपेक्षता की बात नहीं करते, बल्कि अल्पसंख्यकों को प्रताडि़त करने को वो इस्लामी कर्तव्य से जोड़ के देखते हैं। लेकिन उदार लोकतांत्रिक राष्ट्र में पहुंचते ही वो धर्मनिरपेक्षता के पैरोकार हो जाते हैं लेकिन यहां भी इनकी धर्मनिरपेक्षता की अपेक्षा दूसरों पर टिकी होती है। वो इस उदार लोकतांत्रिक समाज में भी यही निर्धारित करना के लिए सक्रिय रहते हैं कि आप क्या लिखें, क्या सोचें, कैसी या कौन सी तस्वीर बनाएं, आपके बहस का विषय क्या हो आदि। मतलब आपकी अभिव्यक्ति का लगाम इनके हाथों में हो। और इसे बड़े आराम से मान्यता या भावना का नाम दे दिया जाता है, लेकिन आपकी मान्यता और आपकी भावना से इन्हें कोई लेना देना नहीं। कोई सलमान रुशदी अपनी भावना व्यक्त कर दे तो उसके गर्दन की कीमत लगा दी जाएगी। इससे उन्हें कोई मतलब नहीं की आपकी मान्यता क्या है? डर और आतंक का ये छाया एमएफ हुसैन को तो दुर्गा की नंगी तस्वीर बनाने की प्रेरणा देता है लेकिन इस्लाम के दरवाजे पर उनकी रचनात्मकता दम तोड़ देती है। जावेद अख्तर भी अपनी लेखनी से धार्मिक व्यंग्य रचने के लिए अन्य धर्मों की शरण में होते हैं लेकिन इस्लाम के दरवाजे पर उनकी भी रचनात्मकता हांफने लगती है। ये महज दो-चार नाम नहीं, ऐसे एक नहीं हजारों उदाहरण मिलेंगे... किसी ने भजन गा लिया तो फतवा जारी, किसी ने सिंदुर लगा लिया तो फतवा जारी, किसी ने दूसरे धर्म के मान्य चिन्हों के सामने सिर झुका लिया तो फतवा....। इस कट्टर आतंकी इस्लामी चेहरे के सामने आश्चर्यजनक रूप से कभी उदार इस्लाम या भारतीय संदर्भ में धर्मनिरपेक्ष व बुद्धिजीवी नहीं आते। वह इस कट्टरता से टकराने से डरता है ये तो स्पष्ट है लेकिन अपने इसी डर और भय से दूसरों के चिंतन को दिशा देने में जुटे रहते हंै। वैचारिक चरित्र में ऐसी विसंगति से तो दुनिया का कोई भी धर्म या समाज अछूता नहीं है लेकिन उन्हीं धर्मों और समाज में ऐसी विसंगतियों के विरोधी काफी संख्या में और बेहद मुखर मिल जाएंगे लेकिन इस्लाम ने ये सामाजिक गतिशीलता खो दी है। मुस्लिम विद्वान और चिंतक व्यक्तिगत और कहीं-कहीं पारिवारिक गतिशीलता तो दिखाते हैं लेकिन सामाजिक स्तर पर ऐसी कट्टरता के खिलाफ व्यापक सहमति कभी आकार नहीं ले पाता। और मजे की बात यह है कि जब कभी ऐसा होता है तो तमाम मदरसे, मरकज और यहां तक की विश्वविद्यालय अपनी डर को छिपाने के लिए इस कट्टरता के पक्ष में तर्क गढऩे लगते हैं।
प्रवीण प्रियदर्शी
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