चुनाव में जीत या हार बड़ी बात है लेकिन देश से जनता का संवाद और उसकी भावना को नहीं समझने की जिद सबसे बड़ी जाहिलियत, भ्रष्टाचार से उत्पन्न वैचारिक जड़ता और वंशवादी कठमुल्लापन है। आखिर ये स्थिति आई क्यों? राजनीति के बदले पैमाने और गतिशीलता को खारिज कर इसे सिर्फ अपने संकुचित भ्रष्टाचारी-जातिवादी-वंशवादी-तुष्टिकरणवादी नजरिए से देखना गुलाम सामंती चरित्र का नग्न प्रदर्शन है। इससे निकल समयबद्ध, प्रदर्शन आधारित, सांस्कृतिक-राष्ट्रवादी राजनीति के अवलंबन को तिरस्कृत करना उससे भी बड़ा पाप है। इतने सारे पापों का हिसाब तो अपने सपने साकार करने को उद्धत प्रगतिशील जनता को करना ही था....करना ही चाहिए था.... और क्यों न करे.....???
अब तो वह चुनाव परिणाम के माध्यम से ऐसे नमूनों से संवाद स्थापित कर रही है....चीख-चीखकर जवाब मांग रही है...अपने पापों का हिसाब दो... जवाब दो... जवाब दो.... हिसाब दो... जवाब दो...... जवाब दो....
* अगर कोई यह मानने पर ही तुल जाए की देश तेरे टुकड़े होंगे जायज है तो क्या जनता भी मान लेगी?
* कोई महज निजी स्वार्थ में वंशवाद को प्रगतिशील समाज का पर्याय मान ले तो जनता उसे दुलत्ती क्यों न मारे?
* इस जमाने में भी महज परिवार के नाम पर नेतृत्व की चाह रखने रखने वालों के साथ कोई खड़ा क्यों हो?
* 21 शताब्दी में भी महज जाति के नाम पर लूट की राजनीति करनेवालों को कोई बर्दाश्त कैसे करे?
* कोई आंख के सामने बिखरे भ्रष्टाचार से अर्जित अकूत संपत्ति को अधिकार बताए तो जनता कितने दिन तक दिनों तक आंख बंद रखेगी?
* अगर किसी को देश की सेना के शौर्य पर गर्व न हो तो जनता उसके साथ खड़ी कैसे होगी?
* अगर किसी की सभा में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगे तो उसके साथ आवाम के स्वर कैसे मिलेंगे?
* अगर किसी जीत पर तिरंगे के बदले पाकिस्तानी झंडा निकले तो भारतीय मानस विरोध कैसे नहीं करेगा?
* कोई स्वर नक्सलियों के समर्थन में उठे तो उसके साथ जनता की स्वर लहरी कैसे गूंजेगी?
* देश में पाकिस्तान की भाषा में बात करने वालों पर जनता का विश्वास कैसे और क्यूंकर जमेगा?
* राष्ट्रवाद के स्वर में स्वर मिलाने से संकोच करने वालों के साथ खड़े होने में जनता संकोच क्यों न करें?
* राष्ट्र के विकास को मजाक बताने वालों को समाज राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग क्यों न करे?
* राष्ट्र के सुरक्षा के सवाल पर शत्रु राष्ट्र की मंशा का पोषण करने वालों पर जनता अविश्वास क्यों न करे?
* देश की मेधा और संस्थाओं को अपमानित करने वालों के साथ देश का स्वाभिमान खड़ा कैसे हो?
अब तो वह चुनाव परिणाम के माध्यम से ऐसे नमूनों से संवाद स्थापित कर रही है....चीख-चीखकर जवाब मांग रही है...अपने पापों का हिसाब दो... जवाब दो... जवाब दो.... हिसाब दो... जवाब दो...... जवाब दो....
* अगर कोई यह मानने पर ही तुल जाए की देश तेरे टुकड़े होंगे जायज है तो क्या जनता भी मान लेगी?
* कोई महज निजी स्वार्थ में वंशवाद को प्रगतिशील समाज का पर्याय मान ले तो जनता उसे दुलत्ती क्यों न मारे?
* इस जमाने में भी महज परिवार के नाम पर नेतृत्व की चाह रखने रखने वालों के साथ कोई खड़ा क्यों हो?
* 21 शताब्दी में भी महज जाति के नाम पर लूट की राजनीति करनेवालों को कोई बर्दाश्त कैसे करे?
* कोई आंख के सामने बिखरे भ्रष्टाचार से अर्जित अकूत संपत्ति को अधिकार बताए तो जनता कितने दिन तक दिनों तक आंख बंद रखेगी?
* अगर किसी को देश की सेना के शौर्य पर गर्व न हो तो जनता उसके साथ खड़ी कैसे होगी?
* अगर किसी की सभा में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगे तो उसके साथ आवाम के स्वर कैसे मिलेंगे?
* अगर किसी जीत पर तिरंगे के बदले पाकिस्तानी झंडा निकले तो भारतीय मानस विरोध कैसे नहीं करेगा?
* कोई स्वर नक्सलियों के समर्थन में उठे तो उसके साथ जनता की स्वर लहरी कैसे गूंजेगी?
* देश में पाकिस्तान की भाषा में बात करने वालों पर जनता का विश्वास कैसे और क्यूंकर जमेगा?
* राष्ट्रवाद के स्वर में स्वर मिलाने से संकोच करने वालों के साथ खड़े होने में जनता संकोच क्यों न करें?
* राष्ट्र के विकास को मजाक बताने वालों को समाज राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग क्यों न करे?
* राष्ट्र के सुरक्षा के सवाल पर शत्रु राष्ट्र की मंशा का पोषण करने वालों पर जनता अविश्वास क्यों न करे?
* देश की मेधा और संस्थाओं को अपमानित करने वालों के साथ देश का स्वाभिमान खड़ा कैसे हो?






