Sunday, March 24, 2019

भारतीय लोकतंत्र में वंशवाद का अपराधी नेहरूवंश

लोकतंत्र मानव इतिहास में विकसित अबतक का सबसे आधुनिक, समावेशी, सामाजिक वैविधता की स्वीकार्यता और प्रतिनिधित्व वाला शासन प्रणाली है। मध्यकालीन राजनीति में वंशवादी राजतंत्र, सामंतवाद, सैनिकवाद और सांस्थानिक धार्मिक सत्ता के खिलाफ यह मध्यमवर्ग के वैज्ञानिक और खोजपूर्ण चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। यूरोप से चली ये हवा जब भारत पहुंची और राजनीतिक संस्थाओं में अभिव्यक्त होने लगी तो इसमें स्थानीय परिस्थितियों से अनुकुलन लाजिमी था, हुआ भी। स्पष्ट था कोई भी लोकतंत्र जनमत से, बहुमत से और इनके नियामक संस्थाओं से ही चलेगा। लोकतंत्र के पूरे ढांचे में वंशवाद और वंशवादी परंपराओं-संस्थाओं-मान्यताओं की  कोई मान्यता नहीं। वास्तव में लोकतंत्र और वंशवाद परस्पर ही प्राणघातक विरोधी शब्द हैं। दुर्भाग्य से भारत में जब आधुनिक लोकतंत्र जड़ें जमाने में जुटा था उसी समय वंशवाद भी आधुनिक स्वरूप में नई व्यवस्था में अपनी जड़ें मजूबत करने में जुट गया। बीसवीं शताब्दी में जब भारत में मतदान आधारित लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व आकार लेने लगा उसी समय कई नेताओं ने जातीय गोलबंदी और अल्पसंख्यक नेताओं ने धार्मिक गोलबंदी को अपनी ताकत बनानी शुरू कर दी।
मतलब दो परस्पर विरोधी मान्यताएं भारतीय लोकतंत्र में साथ-साथ सांस लेने लगी। बाद में यही प्रवृत्ति भारतीय राजनीति में वंशवाद के रूप में प्रस्फुटित हुआ। प्रारंभिक दौर में न तो यह प्रवृत्ति इतनी स्पष्ट और मजबूत थी न ही इसके परिणाम फिर भी इससे चिढ़ ने कई रूप में अपना विरोध प्रकट किया। 1919 में मोती लाल नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष बने। इन्होंने कांग्रेस पार्टी के लिए काफी कुछ किया लेकिन इसके बदले पार्टी में अपने बेटे के लिए प्रमुख स्थान की कामना मन में पाल बैठे। यह कामना 1929 आते-आते इतनी बलवती हो गई की मोतीलाल ने बकायदा गांधी जी को पत्र लिख अपने बेटे (जवाहर लाल नेहरू) को पार्टी अध्यक्ष बनाने की पैरवी की। गांधी द्वारा इंकार किए जाने पर उन्होंने फिर से पत्र लिख अपने बेटे को यह पद देने के फायदे भी गिनाए। इस समय कांग्रेस में नेहरू के सामने सुभाष बोस, जयप्रकाश नारायण जैसे प्रतिद्वंद्वी नाम भी थे। बावजूद इसके अंतत: गांधी मोतीलाल के तर्क से सहमत हो गए और जवाहर का रास्ता सरल बनाने में सहायक हुए। इसी समय बड़े रहस्यमय ढंग से वानर सेना का नाम भी सामने आता है जिसकी नेता इंदिरा बेबी थीं। एक परिवार जिसका अपने परकोटे के बाहर की दुनिया से कोई संपर्क नहीं था उसकी नन्हीं बच्ची रातों-रात छोटे बच्चों का गुप्तचर समूह खड़ा कर लेती है। वास्तव में इतिहास के इस पन्ने के  सृजन में कहीं न कहीं वंशवाद का विकृत दिमाग ही सक्रिय मिलेगा। 40 के दशक में सुभाष की आक्रमकता ने उन्हें विदेश जाने को मजबूर कर दिया और स्वतंत्रता के बाद नेहरू भारतीय राजनीति के बेताज बादशाह बन गए। अपने अंतिम दिनों तक वह कांग्रेस के लिए एक नई मान्यता गढऩे में सफल रहे कि बिना नेहरू परिवार के नाम के कांग्रेस खड़ी नहीं रह सकती। इसी भावना के इर्द-गिर्द इंदिरा कांग्रेस में स्थापित भी हो गईं और जवाहर लाल के मौत के दो-तीन वर्षों के अंदर तमाम विरोध के बावजूद प्रधानमंत्री भी बन गईं। उन्होंने बड़े कायदे से कांग्रेस के सभी बड़े नामों को दरकिनार कर दिया और अपने बेटे संजय को स्थापित किया। जिस तरह नेहरू ने बिना नेहरू-गांधी नाम के कांग्रेस का अस्तित्व नहीं का हौवा खड़ा किया उसी तरह इंदिरा ने क्षेत्रीय वंशवादी ऐसे क्षत्रपों के लिए भी स्थान बनाया जो केंद्रीय महासामंत के प्रति वफादार हो। यह डोर संजय गांधी के अकाल मृत्यु के बाद राजीव गांधी के हाथ आ गया। उनके बाद नरसिम्हा राव जरूर प्रधानमंत्री बने लेकिन कांग्रेस में उनके खिलाफ वंशवादी क्षत्रपों के बगावत की स्थिति बनी रही। नरसिम्हा राव के विरोध में कई बड़े कांग्रेसी नेताओं ने पार्टी छोड़ दी। इस एपिसोड का दुखद पटाक्षेप 1996 में पार्टी अध्यक्ष रहे सीताराम केसरी को आफिस से बाहर कर सोनिया को पदारूढ़ कराने से हुआ। सोनिया इस पद पर 17 सालों तक बनी रही। देश के अंदर प्रबंल विरोध के कारण वह खुद प्रधानमंत्री तो नहीं बन सकीं लेकिन मनमोहन के नाम अपरोक्ष रूप से सत्ता का संचालन करती रहीं। मनमोहन जी के प्रधानमंत्री रहते ही स्पष्ट हो गया कि अब बारी राहुल की है। वह कमान उन्हें सौंप भी दी गई। इसी तरह के कई क्षेत्रीय क्षत्रप भी जातिवादी-वंशवादी ताना-बाना खड़ा करने में सफल रहे। इसी विचार के कारण लालू यादव, मुलायम सिंह, शरद पवार, करुणानिधि, चंद्रबाबू, बाला साहब ठाकरे, बादल जैसे राजनीतिक वंश बेल भारतीय लोकतंत्र में पनप सके। वस्तुत: ये सभी कांग्रेस के उस विचार के हमदम रहे हैं राजनीति को देश के विकास का माध्यम तो बनाना है लेकिन इस क्रम में अपने परिवार की राजनीतिक ताकत और समृद्धि दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती रहे।

प्रवीण प्रियदर्शी

Thursday, March 14, 2019

सेक्स ऑबजेक्ट वीमेन की मानसिकता और लैंगिक समानता


मा नव विकास की कहानी आज उस मोड़ पर है जहां लैंगिक समानता मजबूती से नारी ही नहीं सामाजिक, बौद्धिक विमर्श के केंद्र में है। होना भी चाहिए... ये सोचना ही एक आम संवेदनशील व्यक्ति को अपराध बोध से ग्रसित कर देता है कि 21 वीं शताब्दी में भी महिला मौलिक अधिकारों के लिए मोहताज हो या महज लैंगिक आधार पर भेदभाव और उत्पीडऩ की शिकार हो। समाज में बढ़ती आर्थिक विषमता, आर्थिक मौके और रोजगार के अवसरों के स्वरूप में हो रहे परिवर्तन ने मानव-मानव संघर्ष को और बढ़ा दिया है। इतिहास के अन्य संघर्षों की तरह इस संघर्ष का असर भी सबसे ज्यादा महिलाओं पर पड़ा है और पुराने वीभत्स ढंग से ही पड़ा है। मतलब नारी को सेक्स ऑबजेक्ट मानने की अवधारना और मजबूत हुई है। अवसरों व रोजगार की गतिशीलता के दबाव में पैदा हुई श्रम और कौशल की गतिशीलता ने मजबूत और जागरूक नारी की शर्त रख दी। वहीं जबरदस्त प्रतियोगिता के बीच उपरोक्त पैमाने पर खरा उतरने के उतावलेपन और दबाव ने खुद के निखार के अवसर के साथ ही अनर्गल समझौतों और शोषण का भी एक नया द्वार खोल दिया है। शोषण और विभेद का यह चैप्टर भले आज के जमाने का हो लेकिन उसमें दर्ज कहानियां सदियों पुरानी वही अपमान, अयोग्यता के आरोप, जोर-जबरदस्ती, यौन समझौतों या बलात्कार पर खत्म होती है। ऐसे चुनौतियों के बीच महिला अधिकार और लैंगिक समानता का विमर्श हमसे कुछ ज्यादा ही चाहता है।
परीक्षा की बेइन्तहा घडिय़ां
महिला के जीवन में परीक्षा की घडिय़ां उसके जन्म के साथ ही शुरू हो जाती है। कदम-कदम पर पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, नैतिक, रहन-सहन की बंदिशों और भेदभाव का अंतहीन परस्पर प्रतियोगी सिलसिला चल पड़ता है। कुछ मामलों में तो यह दुर्भाग्य जन्म के पहले ही पाले पड़ जाता है। ऐसे दुरुह वातावरण में जीना-पलना-बढऩा और आगे की मंजिलें प्राप्त करना कितना चुनौतीपूर्ण होता होगा इसकी कल्पना ही की जा सकती है। खैर मानव प्रकृति भी बड़ी ढीठ है, जिस परिस्थितियों और चुनौतियों के बीच जीती है उसे ही सहज और स्वभाविक मान लेती है। महिला भेदभाव और उत्पीडऩ का मूल मर्म भी कहीं इसी में छिपा है। कहीं भी किसी भी परिस्थिति में किसी भी अन्याय को एक बार स्वीकार करते ही इसका सामान्यीकरण बड़े जोर-शोर से शुरू हो जाता है और यह कहीं भी न्याय की मान्यता के लिए नई चुनौती बन जाती है। स्पष्ट नजर आने वाले लैंगिक विभेदों को भी लोग बड़ी सहजता से स्वीकार करने लगते हैं। इस स्वीकार्यता में महिलाओं की भूमिका भी काफी बड़ी है। अगर कहीं कोई विचलन नजर आया तो लोकलाज, चाल-चलन, मर्यादा, नैतिकता के इतने पाठ पढ़ाए जाने लगते हैं कि अपवादों को छोड़ आत्मसमर्पण ही अंतिम उपाय बच जाता है।
वैश्विक हैं चुनौतियां
इसका स्वरूप मामूली फेर बदल के साथ आश्चर्यजनक रूप से वैश्विक है। इसके खिलाफ संघर्ष भी वैश्विक ही होगा... हां उसके स्थानीय संस्करण की गुंजाइश हमेशा रहेगी। सच तो यह है कि इस संघर्ष के स्थानीय संस्करण ही मूल धारा को मजबूत और निर्णायक बनाएंगी। पारिवारिक स्तर से ही इस प्रकिया को मजबूत करने की पहल होनी चाहिए। यह संवेदनशील, सजग और इमानदार लोगों के लिए इस दिशा मे सबसे सरल प्रयास भी होगा। महिलाओं की भूमिका परिवार के निर्णय प्रकिया में जितनी बड़ी और प्रभावी होगी उसमें सहिष्णुता, संयम और विवेक भी उतना ही होगा। इस छोटे से पहल से लोकलाज, चाल-चलन, मर्यादा, नैतिकता की परिभाषा नए समतामूलक धरातल पर नजर आने लगेगा। ऐसे प्रयोगशाला से निकले लोग ही समाज और देश में लैंगिक समानता की धार मजबूत कर सकेंगे। इससे जो समतामूलक आधार तैयार होगा वह हर स्तर पर आरक्षण या संरक्षण से नहीं स्वभाविक विकास और योग्यता से निर्णय प्रकिया का हिस्सा बनने को महिलाओं को प्रेरित करेगा। एक बार ये धारा बह निकली तो यौन शोषण की पाश्विकता भी ठिठुर-सहम जाएगी। ये सामाजिक, बौद्धिक ठिठुरन-सिहरन वर्जिनिटी और चेस्टिटी (कौमार्य और सुचिता) के बेहद संकीर्ण और एकपक्षिय विचार पर तीखा प्रहार होगा। जैसे-जैसे यह प्रहार तीखा होता जाएगा लैंगिक समानता की धरातल उतनी ही मजबूत होती जाएगी।

Praveen Priyadarshi