Thursday, February 24, 2011

बांस की ठूंठ से सोने का सफर

 मिसाइल मैन कलाम कहते हैं सपने देखो, महान वैज्ञानिक आइंस्टिन भी कहा करते थे, ज्ञान की तो सीमा हो सकती है कल्पना की नहीं, इसमें जरूर जिएं वह आपको कहीं से कहीं ले जा सकती है। इसे सच कर दिखाया है झारखंड के हॉकी खिलाडिय़ों ने!
साठ-सत्तर के दशक में खूंटी, तोरपा, सिमडेगा, कुरडेग, जलडेगा, पुरनापानी के गांवों में हजारों युवकों ने हाथ में बांस की ठूंठ (बांस के जड़) ले जो सपना देखा था वह आज पूरा होता जान पड़ रहा है। वह जमाना था जब देश के इस सबसे गरीब इलाके में युवकों के लिए हॉकी स्टिक सपना हुआ करता था। हॉकी स्टिक बिरलों के पहुंच में थी, तो क्या हुआ जज्बा हो तो रहें निकल आती हैं। झारखंड के जंगलों में बांस बहुतायत से मिलता है, युवकों ने बांस की जड़ को दौली-बंसली से स्टिक का रूप दे हॉकी की साधना शुरू की। आदिवासियों में साधना के प्रति निष्ठा व समर्पण का गवाह तो महाभारत भी है एकलव्य का उदाहरण कौन नहीं जानता। हाकी की साधना शुरू हुई तो परिणाम भी आने लगे। 1928 में भारत को हॉकी में पहला स्वर्ण दिलाने वाली टीम के कप्तान जयपाल सिंह मुंडा की विरासत को आगे बढ़ाते हुए सत्तर की दशक में जब सिलवानुस डुंगडुंग व मनोहर टोप्पनो भारत के लिए गेंद ले आगे बढ़ते थे, तो लोग रेडियो से चिपक जाते थे। 1980 मास्को ओलंपिक में जब भारत ने अंतिम बार ओलंपिक में हाकी स्वर्ण जीता तो उसमें झारखंड के सिलवानुस डुंगडुंग का जलवा किसे याद नहीं।
उसी याद, विरासत को आगे बढ़ते हुए अस्सी-नब्बे के दशक में झारखंडी खिलाड़ी हाकी में छा गए। नब्बे के दशक में भारतीय महिला टीम में तो छह-सात झारखंड़ी बालाएं हुआ करती थीं। सुमराय टेटे ने तो लंबे समय तक देश का नेतृत्व भी किया। हेलन सोय, सावित्री पूर्ति, अलमा गुडिय़ा, एडलिन केरकेट्टा, मसिरा सुरीन जब गेंद ले हवा में उड़ती थीं तो झारखंड की हजारों युवतियों के ख्वाब को पंख लग जाते थे। उसी का परिणाम है कि आज असुंता लकड़ा, पुष्पा प्रधान, अनारिता केरकेट्टा, सुभद्रा प्रधान जैसे कई खिलाड़ी राष्ट्रीय टीम का प्रतिनिधित्व करती हैं। एक अरसे बाद 2001 में जब भारत ने जूनियर विश्व कप हाकी प्रतियोगिता जीता तो झारखंड के बिमल लकड़ा ने महती भूमिका निभाई। बांस के ठूंठ से शुरू हुई साधना ने न सिर्फ ख्वाब पूरे किए, समृद्धि भी दिलाई, साधन भी। अब गांवों में भले ही बांस की ठूंठ के स्टिक न दिखें लेकिन आज राष्ट्रीय खेल में झारखंड महिला-पुरुष दोनों वर्ग में जो सोने की जंग लड़ेगा वह इस विरासत को ही सलाम होगा। राष्ट्रीय खेल के इतिहास में पहली बार झारखंड की महिला और पुरुष टीम शनिवार को अपने चीर प्रतिद्वंद्वी से हरियाणा और पंजाब से सोने की जंग लड़ेंगे। इसके पूर्व के दो राष्ट्रीय खेल में झारखंड महिला टीम सोने की जंग हरियाणवी बालाओं से हार चुकी है, जबकि पुरुष टीम ने पहली बार फाइनल में जगह बनाया है। मैदान अपना, अपने लोग, मौका भी है, विरासत भी, जज्बा भी तो फिर चुकना कैसा चक दे झारखंड। 

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