Sunday, February 20, 2011

स्टिक से दिलों पर राज कर रहे लकड़ा, भेंगरा, टोप्पो

एक जमाना था जब हाकी में पंजाब-हरियाणा का जादू सिर चढ़ कर बोलता था। सोढ़ी, गिल, सिंह हाकी के पर्याय हुआ करते थे। लगता है अब वो जमाना बदल गया है, अब झारखंड हाकी का सार्थक पर्याय कर उभर रहा है। 34वें राष्ट्रीय खेल के हाकी प्रतियोगिता में भाग ले रहे आठ टीमों में पांच टीमें  ऐसी हैं जिसमें झारखंड के आदिवासी लड़के-लड़कियां अपना जलवा दिखा रहे हैं। झारखंड ही नहीं उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और सर्विसेज की टीम में कई टोपनो, भेंगरा, लकड़ा, खेस, एक्का, मिंज नामधारी झारखंडी युवक-युवतियां अपना जलवा बिखेर रहे हैं। तभी तो 1980 ओलंपिक में स्वर्ण जीतने वाले भारतीय टीम के प्रमुख खिलाड़ी रहे खूंटी के सिलवानुस डुंगडुंग कहते हैं कि झारखंडी खिलाड़ी के बिना भारतीय हाकी की कल्पना भी नहीं की जा सकती। सिलवानुस कहते हैं हाकी राष्ट्रीय खेल है यह तभी लगता है जब हाकी झारखंड में खेली जा रही हो।
34वें राष्ट्रीय खेल में भाग ले रही झारखंड महिला टीम में तो 18 में से 16 खिलाड़ी झारखंडी आदिवासी मूल के हैं ही उड़ीसा की टीम में कोच सहित सारे खिलाड़ी झारखंडी नामधारी हैं। वैसे उड़ीसा के कई जिले आदिवासी बहुल हैं और झारखंडी आदिवासी सभ्यता-संस्कृति के पोषक-वाहक हैं। झारखंड का कमान अशुंता लकड़ा व बिमल लकड़ा नामक भाई-बहनों के हाथ है। वहीं उड़ीसा महिला टीम की कमान रीना कांति एक्का के हाथ है तो पुरुष टीम की कमान दिलीप केरकेट्टा के हाथ। उत्तर प्रदेश महिला हाकी टीम में भी अंजना बारला, अनिमा सोरेंग व मुक्ता पूर्वा बारला अपना जलवा दिखा रही हैं। उसी तरह पुरुष वर्ग में झारखंड, उड़ीसा के सारे खिलाड़ी झारखंडी मूल के हैं तो सर्विसेज के कप्तान इग्नेस तिर्की सहित चंद्रशेखर खलखो, राजेश लकड़ा, एलीजेर लकड़ा व मुकेश लकड़ा सभी झारखंडी मूल के हैं जबकि दिल्ली की टीम में बनमाली खेस झारखंड का झंडा बुलंद किए हुए हैं। मजे की बात यह कि झारखंडी खिलाड़ी जिस किसी भी टीम का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं उस टीम के सर्वश्रेष्ठ खिलाडिय़ों में उनकी गिनती होती है।

No comments:

Post a Comment