Wednesday, October 31, 2018

एक खाऊं .. दो खाऊं... तीन खाऊं.... या सारे ही खा जाऊं.....


एक खाऊं .. दो खाऊं... तीन खाऊं.... या सारे ही खा जाऊं.....
बचपन में मां ने एक कहानी सुनाई थी... आज बरबस ही याद आ गई। एक ग्रामीण युवक ने अपनी गरीबी से परेशान हो रोजगार की तलाश में दूसरे शहर जाने की ठान ली। पत्नी ने रास्ते में खाने के लिए एक पोटली में रोटी बांध दी। चलते-चलते जब युवक थक गया तो एक पेड़ क नीचे बैठ गया। थोड़ा आराम करने के बाद सोचा एक दो रोटी खा लूं। आसपास देखा तो कुआं नजर आया, सोचा चलो पानी निकाल कर हाथ-मुंह धो लूं फिर रोटी खाता हूं। वीरान स्थल पर स्थित उस कुएं में कोई आता नहीं था तो कुएं में सात परियों ने डेरा जमा लिया था। पथिक ने जब कुएं से पानी निकालने के लिए बाल्टी डाली तो परियां एकदम से सतर्क हो गईं। इनसब से बेखबर पथिक ने हाथ-मुंह धोकर रोटी निकाली ... देखा सात रोटियां हैं। वह अपने यात्रा के समय के अनुसार विचार करने लगा अभी कितनी रोटी खाऊं....बाद में कितनी... ताकि गंतव्य तक पहुंच जाऊं। उसने खुद से सवाल किया एक खाऊं .. दो खाऊं... तीन खाऊं.... या सारे ही खा जाऊं.....। कुएं में हर हलचल पर कान लगाए बैठी परियों ने उसकी आवाज सुन ली और डर से आधी हो गईं ये तो एक ही नहीं हम सातों को खाने की बात कह रहा है। डरी-सहमी परियां एकदम से कुएं से बाहर निकल आईं और पथिक से खुद को बख्शने की गुजारिश करने लगी और उसके बदले वह जो कुछ चाहे देने का प्रस्ताव भी रखा। पथिक भी अवाक था कहां बात रोटियां खाने की हो रही थी और कहां से परियां आ टपकीं। खैर उसने इमानदारी से परियों को अपनी गिनती का मतलब समझाया और उन्हें बेफिक्र रहने को कहा और आगे बढ़ गया। परियां सकुन के साथ वापस कुएं में चली गईं और युवक के सद्गुण और इमानदारी की चर्चा करने लगीं। कहा हमें ऐसे गुणी युवक की मदद करनी चाहिए, उन्होंने अपनी शक्ति से उसपर कृपा बरसाई और रास्ते में उसे काफी धन-संपत्ति मिला जिसे ले वह वापस अपने गांव आ गया और सपरिवार खुशी-खुशी रहने लगा।
=================
लेकिन आज ये कहानी बदल गई है.... कुएं में छलांग लगाने की मंशा लिए एक बेरोजगारी युवक वहां पहुंचा। लेकिन कुएं के पास उसके कदम सहम गए... अपने जेब में रखे स्लीपिंग पिल्स की स्ट्रीप निकाली और कहा एक खाऊं...दो  खाऊं....तीन खाऊं..... या सारे ही खा जाऊं। परियां सहम गईं.. अरे इतने दिनों बाद ये सवाल फिर से, सभी मिन्नत करती बाहर निकल आईं। परियों ने युवक के सामने जीवनदान के बदले जो चाहो सो देने का प्रस्ताव रखा। युवक एकाएक कई योजनाएं गढऩे में उलझ गया। धन-संपत्ति ही नहीं पूरी दुनिया उसके मांगने की सूची में शामिल हो गई। एक बार तो यह भी सोचा क्यों न इनमें से दो-तीन को घर ले चलूं फिर तो जब कुछ और जरूरत होगा तो ये काम आएंगी। युवक के लालच भरे उलझाव को देख परियों सशंकित हो गईं। अब उन्होंने भी 'दिमागÓ लगाया परयिों ने कहा जो भी मांगो एक ही बार मांगो और जाते वक्त पीछे मुड़कर देखा तो सब गायब हो जाएगा। इसपर युवक ने खूब सोचकर ढेर सारे हीरे-जवाहरात मांग लिए। अब वह सभी संपत्ति ले घर चल पड़ा। हीरे-जवाहरात की चमक ने उच्चकों को उसका पता दे दिया फिर क्या था उच्चकों के एक गिरोह ने उसे घेर लिया और सारे सामान छीन लिए। सिर धुनता-पिटता वह युवक अब रोज-रोज कुएं के पास जोर-जोर से आवाज लगाता है एक खाऊं .. दो खाऊं... तीन खाऊं.... या सारे ही खा जाऊं.....लेकिन कोई उसपर कान भी नहीं देता। आज मानव की भी यही स्थिति है अवसर मिलने पर लालच शाश्वत चारित्रिक गुणों पर हावी हो रहा है... और इसी तृष्णा में वह एक खाऊं .. दो खाऊं... तीन खाऊं.... या सारे ही खा जाऊं.....में व्यस्त हो गया है।
प्रवीण प्रियदर्शी 

Monday, October 29, 2018

वर्जिनिटी व चेस्टिटी के विचार ने किया महिला का बेड़ा गर्क 

दि मानव काल के बाद जैसे ही मनुष्य ने व्यवस्थित गृहस्थ जीवन की ओर कदम बढ़ाया वैसे ही महिलाओं की सामाजिक स्थिति कमजोर होने लगी। महिलाओं पर पुरुष का वर्चस्व बढऩे लगा और उनके लिए नए-नए मापदंड गढ़े जाने लगे। सामाजिक प्राणी के रूप में यौनता पुरुष और महिलाओं का नैसर्गिक गुण रहा, प्रारंभिक काल में यौन आवश्यकता पूरी करने में शायद कोई पाबंदी भी नहीं रही होगी। लेकिन गृहस्थ जीवन ने एक नई व्यवस्था गढऩी शुरू कर दी। इसमें महिलाओं के सामने नीत नई वर्जानाओं की सीमा रेखा खींची जाने लगी। महिला की शारीरिक संरचना, विशिष्टता या सीमाओं का पुरुष ने बड़ी चालाकी से और कभी-कभी तो 'ब्रूट फोर्सÓ से अपने पक्ष में इस्तेमाल किया और महिला को घर में समेटने में सफल रहे। घर में सीमटते ही स्त्री... पुरुष की मिलकियत बन गई, उसके आर्थिक प्रयास-क्षमता व विशिष्टता को भी पुरुष ने अपनी मिलकियत का हिस्सा बना लिया। वहीं लज्जा, कौमार्य और सुचिता जैसे शब्द आकार लेने लगे। उन कालों के सामाजिक संघर्ष में सुरक्षा के नाम पर इन शब्दों को मजबूत किया गया और महिला को पुरुष और परिवार के सम्मान से जोड़ दिया गया। लज्जा, कौमार्य, सुचिता और पुरुष या पारिवारिक सम्मान का मान बिंदू बनते ही महिला की दुनिया बदल गई। अब वह पुरी तरह पुरुष के अधीन हो गई। उसकी अस्मिता ही खत्म कर दी गई, उसकी शिक्षा, सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक अधिकारों को दोयम माना जाने लगा। हर समाज ने उनके लिए ऐसे-ऐसे नियम-कानून बनाए की खुद को मानव और विवेकशील कहने में शर्म महसूस होने लगे। इस पुरुषवादी विभत्सता ने आधी आबादी की नैसर्गिकता पर ही हमला कर दिया। विचारशील प्राणी को हंसने-बोलने वाली गुडिय़ा बनाने के इस कुत्सित प्रयास ने मानवता के खिलाफ ऐसा जुर्म किया जिसका कोई प्रायश्चित नहीं। इसके साथ ही महिला के अधिकार और उनके प्रति नजरिया में तत्कालीन समाज में व्यापक परिवर्तन हुआ। कभी सामाजिक संघर्ष, उपार्जन और विकास  की सहचरी रही स्त्री अब संघर्ष में विजेता के लिए इनाम बन गई। ऐसे संघर्ष के विजेता यौनांग का इस्तेमाल युद्ध के अस्त्र के रूप में महिलाओं से करने लगे और सामाजिक संघर्ष के बाद महिलाओं का सामूहिक उत्पीडऩ शुरू हुआ। पुरुषवादी समाज में उससे हर कदम पर सिर्फ 'उस चीजÓ की कीमत मांगी जाने लगी जिसे इसी पुरुष ने अपने लिए सम्मान और महिल के  लिए लज्जा और सुचिता बना दिया था। इसके लिए सहमति जैसे शब्दों को कीमत बताने-समझाने के तर्क भी गढ़े जाने लगे। आज के आधुनिक युग में भी कौमार्य, सुचिता, लज्जा और सम्मान उनकी गतिशीलता और व्यक्तित्व, शरीर और योगयता से समर्पण मांगता है। शायद मी टू इसी पुरुषवादी संपूर्ण नग्नता की तस्वीर है। यौन इ'छा और पहल सरल स्वभाविक मानवीय गुण हैं। इसमें कभी कौमार्य, कभी सुचिता, कभी लज्जा तो कभी सम्मान का पहरा लगा हम न सिर्फ मानवता के प्रति अपराध करते हैं बल्कि एक विभत्स सामाजिक कुंठा को भी जन्म दे रहे हैं। इससे विचार विभेद को यौन उन्मुक्तता की वकालत न माना जाए बस यह यौनता की बराबरी और महिला दर्प और व्यक्तित्व के संपूर्णता के सम्मान से जोड़ा जाए। फिर कहें तो वर्जिनिटी, चेस्टिटी, ऑनर (कौमार्य, सुचिता, सम्मान) के विचार ने महिलाओं के जीवन को नरक बना दिया और समाज के पुरुषवादी स्वरूप की नियामक रेखा खींची।
प्रवीण प्रियदर्शी