Tuesday, November 17, 2020

दो राहे पर इस्लाम
हाल के दिनों में फ्रांस, कनाडा और विएना में आतंकी हमले के साथ ही पूरी दुनिया में एक बार फिर इस्लाम



की कट्टरता पर चर्चा हो रही है। वास्तव में इस्लाम आज वैश्विक बहस के दो राहे पर खड़ा है। इस्लाम का यदि कोई उदार चरित्र है तो वह खुद को अपने ही कट्टरतावादी समर्थकों से घिरा पा रहा है। इसके मूल में देखने पर स्पष्ट होता कि एक दोहरी सोच के आवरण ने इस्लाम को काफी नुकसान पहुंचाया है और आज दुनिया भर में इसे शंका के नजर से देखा जाता है। जब मुस्लिम इस्लामी देशों में होते हैं तो वो कभी धर्मनिरपेक्षता की बात नहीं करते, बल्कि अल्पसंख्यकों को प्रताडि़त करने को वो इस्लामी कर्तव्य से जोड़ के देखते हैं। लेकिन उदार लोकतांत्रिक राष्ट्र में पहुंचते ही वो धर्मनिरपेक्षता के पैरोकार हो जाते हैं लेकिन यहां भी इनकी धर्मनिरपेक्षता की अपेक्षा दूसरों पर टिकी होती है। वो इस उदार लोकतांत्रिक समाज में भी यही निर्धारित करना के लिए सक्रिय रहते हैं कि आप क्या लिखें, क्या सोचें, कैसी या कौन सी तस्वीर बनाएं, आपके बहस का विषय क्या हो आदि। मतलब आपकी अभिव्यक्ति का लगाम इनके हाथों में हो। और इसे बड़े आराम से मान्यता या भावना का नाम दे दिया जाता है, लेकिन आपकी मान्यता और आपकी भावना से इन्हें कोई लेना देना नहीं। कोई सलमान रुशदी अपनी भावना व्यक्त कर दे तो उसके गर्दन की कीमत लगा दी जाएगी। इससे उन्हें कोई मतलब नहीं की आपकी मान्यता क्या है? डर और आतंक का ये छाया एमएफ हुसैन को तो दुर्गा की नंगी तस्वीर बनाने की प्रेरणा देता है लेकिन इस्लाम के दरवाजे पर उनकी रचनात्मकता दम तोड़ देती है। जावेद अख्तर भी अपनी लेखनी से धार्मिक व्यंग्य रचने के लिए अन्य धर्मों की शरण में होते हैं लेकिन इस्लाम के दरवाजे पर उनकी भी रचनात्मकता हांफने लगती है। ये महज दो-चार नाम नहीं, ऐसे एक नहीं हजारों उदाहरण मिलेंगे... किसी ने भजन गा लिया तो फतवा जारी, किसी ने सिंदुर लगा लिया तो फतवा जारी, किसी ने दूसरे धर्म के मान्य चिन्हों के सामने सिर झुका लिया तो फतवा....। इस कट्टर आतंकी इस्लामी चेहरे के सामने आश्चर्यजनक रूप से कभी उदार इस्लाम या भारतीय संदर्भ में धर्मनिरपेक्ष व बुद्धिजीवी नहीं आते। वह इस कट्टरता से टकराने से डरता है ये तो स्पष्ट है लेकिन अपने इसी डर और भय से दूसरों के चिंतन को दिशा देने में जुटे रहते हंै। वैचारिक चरित्र में ऐसी विसंगति से तो दुनिया का कोई भी धर्म या समाज अछूता नहीं है लेकिन उन्हीं धर्मों और समाज में ऐसी विसंगतियों के विरोधी काफी संख्या में और बेहद मुखर मिल जाएंगे लेकिन इस्लाम ने ये सामाजिक गतिशीलता खो दी है। मुस्लिम विद्वान और चिंतक व्यक्तिगत और कहीं-कहीं पारिवारिक गतिशीलता तो दिखाते हैं लेकिन सामाजिक स्तर पर ऐसी कट्टरता के खिलाफ व्यापक सहमति कभी आकार नहीं ले पाता। और मजे की बात यह है कि जब कभी ऐसा होता है तो तमाम मदरसे, मरकज और यहां तक की विश्वविद्यालय अपनी डर को छिपाने के लिए इस कट्टरता के पक्ष में तर्क गढऩे लगते हैं।
प्रवीण प्रियदर्शी
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Thursday, May 23, 2019

जवाब दो...हिसाब दो....जवाब दो.....जवाब दो

चुनाव में जीत या हार बड़ी बात है लेकिन देश से जनता का संवाद और उसकी भावना को नहीं समझने की जिद सबसे बड़ी जाहिलियत, भ्रष्टाचार से उत्पन्न वैचारिक जड़ता और वंशवादी कठमुल्लापन है। आखिर ये स्थिति आई क्यों? राजनीति के बदले पैमाने और गतिशीलता को खारिज कर इसे सिर्फ अपने संकुचित भ्रष्टाचारी-जातिवादी-वंशवादी-तुष्टिकरणवादी नजरिए से देखना गुलाम सामंती चरित्र का नग्न प्रदर्शन है। इससे निकल समयबद्ध, प्रदर्शन आधारित, सांस्कृतिक-राष्ट्रवादी राजनीति के अवलंबन को तिरस्कृत करना उससे भी बड़ा पाप है। इतने सारे पापों का हिसाब तो अपने सपने साकार करने को उद्धत प्रगतिशील जनता को करना ही था....करना ही चाहिए था.... और क्यों न करे.....???
अब तो वह चुनाव परिणाम के माध्यम से ऐसे नमूनों से संवाद स्थापित कर रही है....चीख-चीखकर जवाब मांग रही है...अपने पापों का हिसाब दो... जवाब दो... जवाब दो.... हिसाब दो... जवाब दो...... जवाब दो....

* अगर कोई यह मानने पर ही तुल जाए की देश तेरे टुकड़े होंगे जायज है तो क्या जनता भी मान लेगी?
* कोई महज निजी स्वार्थ में वंशवाद को प्रगतिशील समाज का पर्याय मान ले तो जनता उसे दुलत्ती क्यों न मारे?
* इस जमाने में भी महज परिवार के नाम पर नेतृत्व की चाह रखने रखने वालों के साथ कोई खड़ा क्यों हो?
* 21 शताब्दी में भी महज जाति के नाम पर लूट की राजनीति करनेवालों को कोई बर्दाश्त कैसे करे?
* कोई आंख के सामने बिखरे भ्रष्टाचार से अर्जित अकूत संपत्ति को अधिकार बताए तो जनता कितने दिन तक दिनों तक आंख बंद रखेगी?
* अगर किसी को देश की सेना के शौर्य पर गर्व न हो तो जनता उसके साथ खड़ी कैसे होगी?
* अगर किसी की सभा में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगे तो उसके साथ आवाम के स्वर कैसे मिलेंगे?
* अगर किसी जीत पर तिरंगे के बदले पाकिस्तानी झंडा निकले तो भारतीय मानस विरोध कैसे नहीं करेगा?
* कोई स्वर नक्सलियों के समर्थन में उठे तो उसके साथ जनता की स्वर लहरी कैसे गूंजेगी?
* देश में पाकिस्तान की भाषा में बात करने वालों पर जनता का विश्वास कैसे और क्यूंकर जमेगा?
* राष्ट्रवाद के स्वर में स्वर मिलाने से संकोच करने वालों के साथ खड़े होने में जनता संकोच क्यों न करें?
* राष्ट्र के विकास को मजाक बताने वालों को समाज राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग क्यों न करे?
* राष्ट्र के सुरक्षा के सवाल पर शत्रु  राष्ट्र की मंशा का पोषण करने वालों पर जनता अविश्वास क्यों न करे?
* देश की मेधा और संस्थाओं को अपमानित करने वालों के साथ देश का स्वाभिमान खड़ा कैसे हो? 

Sunday, April 21, 2019

मी टू का निजी आरोप न्यायपालिका पर हमला कैसे


बात संभवत: 1997 की है... दिन, तारीख याद नहीं। शायद सर्दी का मौसम था। उन दिनों मैं दिल्ली में रहकर सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहा था। एक बार रांची आ रहा था सुबह पांच-साढ़े पांच बजे पुरुषोत्तम एक्सप्रेस पकडऩी थी सो साढ़े चार के आसपास स्टेशन पहुंच गया। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उस समय कोई इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज साहब भी इलाहाबाद जाने के लिए पहुंचे थे। उनकी बर्थ पर कोई और बैठा हुआ था...सीट खाली करने को लेकर विवाद हुआ और उन्होंने वहीं प्लेटफार्म में कोर्ट लगाकर टीटीई को दंडित किया। ये बताने का आशय सिर्फ इतना है जब न्यायाधीश महोदयों के साथ कुछ व्यक्तिगत समस्या आती है तो न्यायालय की ताकत को वह अपनी निजी ताकत बनाकर अपनी रक्षा करते हैं। अगर यह संभव है तो कभी-कभी ही सही हनक दिखाने के लिए भी ऐसा होता होगा।
ऐसी ही नजीर मुख्य न्यायाधीश महोदय पेश कर रहे हैं। किसी महिला ने यौन शोषण का आरोप उनपर लगाया और न्यायपालिका खतरे में आ गई... वाह...गजब सर जी... ये कैसा तर्क है। उससे भी बढ़कर जिनपर आरोप लगा उस मामले की सुनवाई उन्हीं की अध्यक्षता में होगी। ये तो गजबे गजब मामला है भाई। महिला ने आरोप क्यों लगाया, कैसे लगाया, इसमें सच्चाई है या बस गलत मंशा इसकी जांच तो नैसर्गिक न्याय की मांग है, कोई...मतलब को...ई.. भी...इससे कैसे इंकार कर सकता है। रंजन गोगोई साहब कह रहे हैं मैं मुख्य न्यायाधीश हूं इसलिए ऐसा कर सकता हूं। उन्होंने ने तो न्यायालय की स्वतंत्रता को ढाल बना निजी मामले को न्यायालय पर हमले का शक्ल दे अपना रक्षाकवच तैयार कर लिया। आश्चर्य यह कि इसपर कहीं कोई शोर नहीं, कोई बहस नहीं, कोई चर्चा नहीं मानो कुछ हुआ ही न हो। न्यायाधीश और न्यायपालिका पर इस देश में बहस बहुत कम होती है। बुद्धिजीवी, चिंतक और राजनेता इसे पवित्र अस्पृश्य मानकर आंखें बंद करने में ही भलाई समझते हैं। लेकिन लोकतंत्र के स्तंभ के रूप में इसे जन बहस से मुक्ति देना लोकतांत्रिक परंपरा के प्रति गंभीर पाप है। गोगोई साहब की निजी निष्ठा, ईमानदारी व चारित्रिक पवित्रता का पूरा सम्मान करते हुए भी मैं यही कहूंगा कि किसी ने जब आरोप लगा ही दिया है तो उन्हें निजी हैसियत से आम भारतीय की तरह नैसर्गिक कानूनी दायरे में इसका सामना करना चाहिए। हां मैं एक बात में उनसे सहमत हूं कि ऐसे आरोप के कारण इस्तीफा देने की जरूरत नहीं है। इसे सभी स्तर मतलब बड़े से लेकर छोटे स्तर तक प्रभावी बनाना चाहिए। क्योंकि ''मी टूÓÓ के इस माहौल में किसी की प्रतिष्ठा तो कोई तार-तार कर दे लेकिन उसकी रोजी-रोटी संघर्ष में अंतिम निर्णय आने तक बना रहे। वैसे भी जमाना मी टू का है और नेता-मंत्री, संतरी, अभिनेता, पत्रकार, व्यवसायी होते हुए यह देश में न्याय के सबसे बड़े पहरेदार के दरवाजे पर दस्तक देने पहुंच गई। निश्चय ही इस दरवाजे पर यह दस्तक काफी पीड़ा देने वाली है। कई मायने भी हो सकते हैं लेकिन दस्तक तो दस्तक है...जब बेल बज गई है तो जवाब देना ही पड़ेगा।
प्रवीण प्रिदयर्शी

Tuesday, April 16, 2019

मुसलमान होना कवच समान

इनके लिए मुसलमान होना कवच समान
माजवादी पार्टी के रामपुर संसदीय सीट से प्रत्‍याशी आजम खां की अपनी प्रतिद्वंद्वी भाजपा के जया प्रदा के खिलाफ की गई गंदी बात (उनके अंडरवीयर का रंग खाखी) पर उसका कुनबा बचाव के लिए सामने आया और चुनाव आयोग पर आरोप लगाया कि मुसलमान होने के कारण उसपर तीन दिन प्रचार करने से रोक लगाई गई है। भारतीय मुसलमानों का बड़ा वर्ग हमेशा से विशेषाधिकार का हामी रहा है। स्वतंत्रता के पहले यही कांग्रेस को हिंदू पार्टी कहकर विशेषाधिकार लेते थे। स्वतंत्रता के बाद जब कांग्रेस की सत्ता आई तो इन्होंने वही पॉलिटिक्स जारी रखी। कुछ उदाहरण और देख लें....टाइगर पटौदी जो भारतीय क्रिकेट टीम के सबसे कम उम्र में कप्तान बने तब वे भारतीय थे लेकिन जब कभी किसी मामले में वे घिरे तो उसका मुकाबला करने के बजाय अपने मुसलमानियत में बचाव ढूंढने लगे। उन्होंने कहा कि मुसलमान होने के कारण मुझे निशाना बनाया जा रहा है। एक और भारतीय क्रिकेट कप्तान मोहम्मद अजहरूद्दीन जो कांग्रेस से सांसद भी रहे, जब मैच फिक्सिंग मामले में विवाद में आए तो उन्होंने भी वही कहा मुसलमान होने के कारण मुझे टारगेट किया जा रहा है। भोपाल से भारतीय टीम हॉकी में पहुंचे असलम शेर खां कांग्रेस के सांसद भी रहे जब किसी विवाद में फंसे तो उन्होंने भी अपनी मुसलमानियत आगे कर दी। परिस्थिति का सामना करना छोड़ उन्होंने मुसलमान के नाम पर विशेषाधिकार के तहत इससे बचने के लिए कहा कि मुसलमान होने के कारण मुझे निशाना बनाया जा रहा है। याद होगा कुछ समय पूर्व एक बॉलीवुड हीरो इमरान हाशमी का मकान के संबंध में विवाद हुआ था तो उन्होंने भी अपनी मुसलमानियत आगे कर विशेषाधिकार की कामना की थी। कहा था मुसलमान होने के कारण मुझे इस सोसाइटी में मकान नहीं दिय जा रहा है। जबकि उसी सोसाइटी में कई अन्य मुस्लिम परिवार भी रहते थे। बाद में उन्होंने ही हाशमी की बात को गलत बताया। कहने का मतलब ये हैं कि कानून या विवाद के जद में कोई भी आ सकता है, और उसे उसका सामना करना चाहिए....अधिकतर लोग करते ही हैं।  ऐसे में उसका सामना करने के बदले मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग अपनी मुसलमानियत को आगे कर विवाद या कानूनी कार्रवाई से छूट के लिए महज मुस्लिम होने के कारण विशेषाधिकार की चाह रखता है। इस चाह की व्यापकता और आक्रमकता का दबाव संवैधानिक संस्थाओं और उनके क्रियाकलाप पर भी साफ दिखता है। ऐसे में कानून की व्यवस्था बनाने में परेशानी होना सहज बात है। जब गतिरोध एक जगह उत्पन्न हो जाता है तो प्रतिगतिरोध का उत्पन्न होना भी लाजिमी है...। वास्तव में मुस्लिम समाज मल्टी कल्चरल सोसाइटी में एकरस होकर रहने में परेशानी महसूस करता है, जहां उनकी संख्या ज्यादा होती है वहां अल्पसंख्यकों को बड़े ही नियोजित ढंग से खत्म कर दिया जाता है। ईरान, लीबिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश, कई अफ्रीकी देश, कश्मीर में अल्पसंख्यकों की स्थिति और एथनिक क्लीजिंग इसके प्रमाण है। सबसे दुखद बात ये कि मुस्लिम समाज के अन्य बुद्धिजीवी ऐसे कृत्य पर या तो मौन दर्शक बन जाते हैं या ऐसे कृत्य के पक्ष में इस्लाम के नाम पर तर्क गढऩे लगते हैं।
प्रवीण प्रियदर्शी

Monday, April 1, 2019

भारतीय लोकतंत्र में वंशवाद का अपराधी नेहरूवंश

लोकतंत्र मानव इतिहास में विकसित अबतक का सबसे आधुनिक, समावेशी, सामाजिक वैविधता की स्वीकार्यता और प्रतिनिधित्व वाला शासन प्रणाली है। मध्यकालीन राजनीति में वंशवादी राजतंत्र, सामंतवाद, सैनिकवाद और सांस्थानिक धार्मिक सत्ता के खिलाफ यह मध्यमवर्ग के वैज्ञानिक और खोजपूर्ण चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। यूरोप से चली ये हवा जब भारत पहुंची और राजनीतिक संस्थाओं में अभिव्यक्त होने लगी तो इसमें स्थानीय परिस्थितियों से अनुकुलन लाजिमी था, हुआ भी। स्पष्ट था कोई भी लोकतंत्र जनमत से, बहुमत से और इनके नियामक संस्थाओं से ही चलेगा। लोकतंत्र के पूरे ढांचे में वंशवाद और वंशवादी परंपराओं-संस्थाओं-मान्यताओं की कोई मान्यता नहीं। वास्तव में लोकतंत्र और वंशवाद परस्पर ही प्राणघातक विरोधी शब्द हैं। दुर्भाग्य से भारत में जब आधुनिक लोकतंत्र जड़ें जमाने में जुटा था उसी समय वंशवाद भी आधुनिक स्वरूप में नई व्यवस्था में अपनी जड़ें मजूबत करने में जुट गया। बीसवीं शताब्दी में जब भारत में मतदान आधारित लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व आकार लेने लगा उसी समय कई नेताओं ने जातीय गोलबंदी और अल्पसंख्यक नेताओं ने धार्मिक गोलबंदी को अपनी ताकत बनानी शुरू कर दी। 
मतलब दो परस्पर विरोधी मान्यताएं भारतीय लोकतंत्र में साथ-साथ सांस लेने लगी। बाद में यही प्रवृत्ति भारतीय राजनीति में वंशवाद के रूप में प्रस्फुटित हुआ। प्रारंभिक दौर में न तो यह प्रवृत्ति इतनी स्पष्ट और मजबूत थी न ही इसके परिणाम फिर भी इससे चिढ़ ने कई रूप में अपना विरोध प्रकट किया। 1919 में मोती लाल नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष बने। इन्होंने कांग्रेस पार्टी के लिए काफी कुछ किया लेकिन इसके बदले पार्टी में अपने बेटे के लिए प्रमुख स्थान की कामना मन में पाल बैठे। यह कामना 1929 आते-आते इतनी बलवती हो गई की मोतीलाल ने बकायदा गांधी जी को पत्र लिख अपने बेटे (जवाहर लाल नेहरू) को पार्टी अध्यक्ष बनाने की पैरवी की। गांधी द्वारा इंकार किए जाने पर उन्होंने फिर से पत्र लिख अपने बेटे को यह पद देने के फायदे भी गिनाए। इस समय कांग्रेस में नेहरू के सामने सुभाष बोस, जयप्रकाश नारायण जैसे प्रतिद्वंद्वी नाम भी थे। बावजूद इसके अंतत: गांधी मोतीलाल के तर्क से सहमत हो गए और जवाहर का रास्ता सरल बनाने में सहायक हुए। इसी समय बड़े रहस्यमय ढंग से वानर सेना का नाम भी सामने आता है जिसकी नेता इंदिरा बेबी थीं। एक परिवार जिसका अपने परकोटे के बाहर की दुनिया से कोई संपर्क नहीं था उसकी नन्हीं बच्ची रातों-रात छोटे बच्चों का गुप्तचर समूह खड़ा कर लेती है। वास्तव में इतिहास के इस पन्ने के सृजन में कहीं न कहीं वंशवाद का विकृत दिमाग ही सक्रिय मिलेगा। 40 के दशक में सुभाष की आक्रमकता ने उन्हें विदेश जाने को मजबूर कर दिया और स्वतंत्रता के बाद नेहरू भारतीय राजनीति के बेताज बादशाह बन गए। अपने अंतिम दिनों तक वह कांग्रेस के लिए एक नई मान्यता गढऩे में सफल रहे कि बिना नेहरू परिवार के नाम के कांग्रेस खड़ी नहीं रह सकती। इसी भावना के इर्द-गिर्द इंदिरा कांग्रेस में स्थापित भी हो गईं और जवाहर लाल के मौत के दो-तीन वर्षों के अंदर तमाम विरोध के बावजूद प्रधानमंत्री भी बन गईं। उन्होंने बड़े कायदे से कांग्रेस के सभी बड़े नामों को दरकिनार कर दिया और अपने बेटे संजय को स्थापित किया। जिस तरह नेहरू ने बिना नेहरू-गांधी नाम के कांग्रेस का अस्तित्व नहीं का हौवा खड़ा किया उसी तरह इंदिरा ने क्षेत्रीय वंशवादी ऐसे क्षत्रपों के लिए भी स्थान बनाया जो केंद्रीय महासामंत के प्रति वफादार हो। यह डोर संजय गांधी के अकाल मृत्यु के बाद राजीव गांधी के हाथ आ गया। उनके बाद नरसिम्हा राव जरूर प्रधानमंत्री बने लेकिन कांग्रेस में उनके खिलाफ वंशवादी क्षत्रपों के बगावत की स्थिति बनी रही। नरसिम्हा राव के विरोध में कई बड़े कांग्रेसी नेताओं ने पार्टी छोड़ दी। इस एपिसोड का दुखद पटाक्षेप 1996 में पार्टी अध्यक्ष रहे सीताराम केसरी को आफिस से बाहर कर सोनिया को पदारूढ़ कराने से हुआ। सोनिया इस पद पर 17 सालों तक बनी रही। देश के अंदर प्रबंल विरोध के कारण वह खुद प्रधानमंत्री तो नहीं बन सकीं लेकिन मनमोहन के नाम अपरोक्ष रूप से सत्ता का संचालन करती रहीं। मनमोहन जी के प्रधानमंत्री रहते ही स्पष्ट हो गया कि अब बारी राहुल की है। वह कमान उन्हें सौंप भी दी गई। इसी तरह के कई क्षेत्रीय क्षत्रप भी जातिवादी-वंशवादी ताना-बाना खड़ा करने में सफल रहे। इसी विचार के कारण लालू यादव, मुलायम सिंह, शरद पवार, करुणानिधि, चंद्रबाबू, बाला साहब ठाकरे, बादल जैसे राजनीतिक वंश बेल भारतीय लोकतंत्र में पनप सके। वस्तुत: ये सभी कांग्रेस के उस विचार के हमदम रहे हैं राजनीति को देश के विकास का माध्यम तो बनाना है लेकिन इस क्रम में अपने परिवार की राजनीतिक ताकत और समृद्धि दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती रहे।
प्रवीण प्रियदर्शी

दल बदल की राजनीति और लोकतंत्र की आत्मा



चुनाव का मौसम आया नहीं की हर बार की तरह इस बार भी देशभर में दल-बदल का सिलसिला चल पड़ा है। राज्य में जदयू प्रदेश अध्यक्ष जलेश्वर महतो कई अन्य नेताओं के साथ जहां कांग्रेस के पाले में चले गए वहीं राजद प्रदेश अध्यक्ष अन्नपूर्णा, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गिरिनाथ सिंह सहित कई नेताओं ने कमल थाम लिया। वहीं गत लोकसभा चुनाव में चतरा से झाविमो की प्रत्याशी रही नीलम देवी भी भाजपा में शामिल हो गई। भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ताला मरांडी भी झामूमो से तालमेल बैठा रहे हैं। जिला स्तर पर भी विभिन्न दलों में छोटे-बड़े नेताओं का यहां-वहां आना-जाना लगा हुआ है। ऐन चुनाव के वक्त दल बदल की इस कवायद को कभी जनता ने सम्मान से नहीं देखा बावजूद इसके हर चुनाव के पहले यह उछल-कूद मचती है और कभी-कभी तो मंडी भी सजती है। दल बदल के इस खेल में दलों के अंदर भी बवाल मच जाता है। वर्षों से पार्टी का बैनर-झंडा ढोने वाले पुराने व समर्पित कार्यकर्ता ठगा सा महसूस करते हैं। वहीं टिकट की शर्त पर दल बदल कर आने वाले रातों-रात टिकट उड़ा ले जाते हैं। इससे कई बार तो सिटिंग एमपी/एमएलए का टिकट तक काटना पड़ता है। प्रदेश भाजपा फिलहाल इसी उधेड़बुन में चतरा और कोडरमा में फंस गई है। दोनों ही सीटों पर पार्टी के सक्षम कार्यकर्ता (सक्षम इसलिए कि इनमें एक वर्षों तक प्रदेश में वरिष्ठ पदाधिकारी रहे जबकि दूसरे प्रदेश अध्यक्ष, विधायक आदि रहे हैं) सुनील सिंह व पूर्व प्रदेश पार्टी अध्यक्ष रवींद्र राय सांसद हैं लेकिन अब उनकी दावेदारी भी दलबदल के आलोक में कमजोर पड़ गई है।
सवाल यह है कि पार्टी अपने कार्यकर्ताओं के विषय में भी क्या और कैसे सोचती है? कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री मोदी ने लोकतंत्र में विभिन्न दलों के आंतरिक लोकतंत्र, नेतृत्व चयन और निर्माण प्रक्रिया पर बहस छेड़ा था। दुर्भाग्य से यह किसी मुकाम तक नहीं पहुंच पाई लेकिन अब लगता है इसपर चुनावी गहमागहमी के बीच ही चिंतन का समय आ गया है।
सवाल उठता है क्या पार्टी से लंबे समय से जुड़े कार्यकर्ताओं की क्षमता पार्टी इस स्तर तक विकसित नहीं कर पा रही कि वे विभिन्न स्तर पर अपनी पार्टी का नेतृत्व करें? क्या विभिन्न दलों में प्रतिभावान कार्यकर्ताओं की कमी हो गई है या प्रतिभावान लोग दलों की गणेश परिक्रमा व चमचावादी कार्यप्रणाली से खिन्न हो दलों में शामिल ही नहीं हो रहे?
दोनों ही सवालों में सत्यता के जबरदस्त पुट हैं। किसी भी दल में पार्टी नेतृत्व विकसित करने की गंभीर प्रक्रिया नहीं, कुछ योग्य लोग व्यक्तिगत स्तर पर सीख-समझ के आगे बढ़ जाएं तो बात अलग है। प्रतिबंधित भाकपा माओवादियों ने तो इसे स्वीकार भी कर लिया कि प्रतिभावान लोग संगठन में नहीं आ रहे। कटू जरूर है लेकिन सभी राजनीतिक दलों के लिए भी यह सच है।
तभी नीति-सिद्धांत की बात परे रख 'हृदय परिवर्तनÓ के बेहद हास्यास्पद और खोखले तर्क के आधार पर दल-बदल के खेल में सभी शामिल होते हैं। बेशर्मी का तर्क तो यह हो गया है कि जिस दल में जितने लोग आएं वह उतनी ही लोकप्रियता का दावा करने लगती है। जबकि इसी प्रक्रिया से निकली सच्चाई ये है कि कार्यकर्ताओं के मेहनत पर बढ़ी पार्टी उन्हीं कार्यकर्ताओं में अयोग्यता ढूंढने लगती है। और इस अयोग्यता का इलाज घर में करने की व्यवस्था नहीं कर पाने की अपनी चूक को नजरंदाज कर वरीय नेता बाहर से इलाज का फार्मूला निकाल लाते हैँ। ऐसे मामलों में पार्टी के आलाकमान का एक ही घिसा-पीटा तर्क होता है पार्टी को मजबूत करने के लिए या जीत की संभावना प्रबल होने के कारण फलां को पार्टी में लिया गया। लेकिन यही जवाब फिर उसी सवाल को दोहरे ताकत से जन्म दे देती है कि पार्टी लंबे अर्से के बाद भी अपने कार्यकर्ता को इस तरह विकसित क्यों नहीं कर पाई कि वह चुनाव में सक्षम प्रत्याशी बन सके? अगर इस सवाल का जवाब हां होता है जो प्राय: शब्दों में नहीं पार्टी निर्णय में अभिव्यक्त होता है तो पार्टी के वरीय नेताओं की भूमिका खुद सवालों के घेरे में आ जाती है.... कि महाशय आप कर क्या रहे थे? क्योंकि किसी भी दल का एकमेव उद्देश्य चुनाव लडऩा नहीं हो सकता। सत्ता की राजनीति तो राष्ट्र या राज्य के सेवा का माध्यम मात्र है जबकि दल की राजनीति सामाजिक परिवर्तन और आंदोलन का वाहक। इस प्रक्रिया में आप यदि सक्षम नेतृत्व विकसित नहीं कर पाए तो इसका खामियाजा तो पार्टी टिकट नहीं मिलने वाले कार्यकर्ता से ज्यादा उस वरीय नेता को भुगतना चाहिए। ऐसा नहीं कि लोकतंत्र में किसी के दल बदलने पर मनाही है लेकिन यह हृदय परिवर्तन जब ऐन चुनाव के समय होता है तो पचना तो दूर कार्यकर्ताओं को उलटी होने लगती है। पार्टी इससे कितनी मजबूत होती है ये तो नहीं कहा जा सकता लेकिन सभी पार्टी दल-बदल के बाजार में एक ही तराजू लेकर खड़े नजर आते हैं और लोकतंत्र में मत कि पवित्रता ही भंग हो जाती है...मतदाताओं के पास विकल्प कम हो जाते हैं। कुल मिलाकर कहें तो दल-बदल लोकतंत्र की पवित्रता पर कुठाराघात करती है और पानी पी-पीकर लोकतंत्र की हामी भरने वाले सभी दल इस पाप के भागी बनते हैं।
प्रवीण प्रियदर्शी, रांची

Sunday, March 24, 2019

भारतीय लोकतंत्र में वंशवाद का अपराधी नेहरूवंश

लोकतंत्र मानव इतिहास में विकसित अबतक का सबसे आधुनिक, समावेशी, सामाजिक वैविधता की स्वीकार्यता और प्रतिनिधित्व वाला शासन प्रणाली है। मध्यकालीन राजनीति में वंशवादी राजतंत्र, सामंतवाद, सैनिकवाद और सांस्थानिक धार्मिक सत्ता के खिलाफ यह मध्यमवर्ग के वैज्ञानिक और खोजपूर्ण चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। यूरोप से चली ये हवा जब भारत पहुंची और राजनीतिक संस्थाओं में अभिव्यक्त होने लगी तो इसमें स्थानीय परिस्थितियों से अनुकुलन लाजिमी था, हुआ भी। स्पष्ट था कोई भी लोकतंत्र जनमत से, बहुमत से और इनके नियामक संस्थाओं से ही चलेगा। लोकतंत्र के पूरे ढांचे में वंशवाद और वंशवादी परंपराओं-संस्थाओं-मान्यताओं की  कोई मान्यता नहीं। वास्तव में लोकतंत्र और वंशवाद परस्पर ही प्राणघातक विरोधी शब्द हैं। दुर्भाग्य से भारत में जब आधुनिक लोकतंत्र जड़ें जमाने में जुटा था उसी समय वंशवाद भी आधुनिक स्वरूप में नई व्यवस्था में अपनी जड़ें मजूबत करने में जुट गया। बीसवीं शताब्दी में जब भारत में मतदान आधारित लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व आकार लेने लगा उसी समय कई नेताओं ने जातीय गोलबंदी और अल्पसंख्यक नेताओं ने धार्मिक गोलबंदी को अपनी ताकत बनानी शुरू कर दी।
मतलब दो परस्पर विरोधी मान्यताएं भारतीय लोकतंत्र में साथ-साथ सांस लेने लगी। बाद में यही प्रवृत्ति भारतीय राजनीति में वंशवाद के रूप में प्रस्फुटित हुआ। प्रारंभिक दौर में न तो यह प्रवृत्ति इतनी स्पष्ट और मजबूत थी न ही इसके परिणाम फिर भी इससे चिढ़ ने कई रूप में अपना विरोध प्रकट किया। 1919 में मोती लाल नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष बने। इन्होंने कांग्रेस पार्टी के लिए काफी कुछ किया लेकिन इसके बदले पार्टी में अपने बेटे के लिए प्रमुख स्थान की कामना मन में पाल बैठे। यह कामना 1929 आते-आते इतनी बलवती हो गई की मोतीलाल ने बकायदा गांधी जी को पत्र लिख अपने बेटे (जवाहर लाल नेहरू) को पार्टी अध्यक्ष बनाने की पैरवी की। गांधी द्वारा इंकार किए जाने पर उन्होंने फिर से पत्र लिख अपने बेटे को यह पद देने के फायदे भी गिनाए। इस समय कांग्रेस में नेहरू के सामने सुभाष बोस, जयप्रकाश नारायण जैसे प्रतिद्वंद्वी नाम भी थे। बावजूद इसके अंतत: गांधी मोतीलाल के तर्क से सहमत हो गए और जवाहर का रास्ता सरल बनाने में सहायक हुए। इसी समय बड़े रहस्यमय ढंग से वानर सेना का नाम भी सामने आता है जिसकी नेता इंदिरा बेबी थीं। एक परिवार जिसका अपने परकोटे के बाहर की दुनिया से कोई संपर्क नहीं था उसकी नन्हीं बच्ची रातों-रात छोटे बच्चों का गुप्तचर समूह खड़ा कर लेती है। वास्तव में इतिहास के इस पन्ने के  सृजन में कहीं न कहीं वंशवाद का विकृत दिमाग ही सक्रिय मिलेगा। 40 के दशक में सुभाष की आक्रमकता ने उन्हें विदेश जाने को मजबूर कर दिया और स्वतंत्रता के बाद नेहरू भारतीय राजनीति के बेताज बादशाह बन गए। अपने अंतिम दिनों तक वह कांग्रेस के लिए एक नई मान्यता गढऩे में सफल रहे कि बिना नेहरू परिवार के नाम के कांग्रेस खड़ी नहीं रह सकती। इसी भावना के इर्द-गिर्द इंदिरा कांग्रेस में स्थापित भी हो गईं और जवाहर लाल के मौत के दो-तीन वर्षों के अंदर तमाम विरोध के बावजूद प्रधानमंत्री भी बन गईं। उन्होंने बड़े कायदे से कांग्रेस के सभी बड़े नामों को दरकिनार कर दिया और अपने बेटे संजय को स्थापित किया। जिस तरह नेहरू ने बिना नेहरू-गांधी नाम के कांग्रेस का अस्तित्व नहीं का हौवा खड़ा किया उसी तरह इंदिरा ने क्षेत्रीय वंशवादी ऐसे क्षत्रपों के लिए भी स्थान बनाया जो केंद्रीय महासामंत के प्रति वफादार हो। यह डोर संजय गांधी के अकाल मृत्यु के बाद राजीव गांधी के हाथ आ गया। उनके बाद नरसिम्हा राव जरूर प्रधानमंत्री बने लेकिन कांग्रेस में उनके खिलाफ वंशवादी क्षत्रपों के बगावत की स्थिति बनी रही। नरसिम्हा राव के विरोध में कई बड़े कांग्रेसी नेताओं ने पार्टी छोड़ दी। इस एपिसोड का दुखद पटाक्षेप 1996 में पार्टी अध्यक्ष रहे सीताराम केसरी को आफिस से बाहर कर सोनिया को पदारूढ़ कराने से हुआ। सोनिया इस पद पर 17 सालों तक बनी रही। देश के अंदर प्रबंल विरोध के कारण वह खुद प्रधानमंत्री तो नहीं बन सकीं लेकिन मनमोहन के नाम अपरोक्ष रूप से सत्ता का संचालन करती रहीं। मनमोहन जी के प्रधानमंत्री रहते ही स्पष्ट हो गया कि अब बारी राहुल की है। वह कमान उन्हें सौंप भी दी गई। इसी तरह के कई क्षेत्रीय क्षत्रप भी जातिवादी-वंशवादी ताना-बाना खड़ा करने में सफल रहे। इसी विचार के कारण लालू यादव, मुलायम सिंह, शरद पवार, करुणानिधि, चंद्रबाबू, बाला साहब ठाकरे, बादल जैसे राजनीतिक वंश बेल भारतीय लोकतंत्र में पनप सके। वस्तुत: ये सभी कांग्रेस के उस विचार के हमदम रहे हैं राजनीति को देश के विकास का माध्यम तो बनाना है लेकिन इस क्रम में अपने परिवार की राजनीतिक ताकत और समृद्धि दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती रहे।

प्रवीण प्रियदर्शी