Monday, April 1, 2019

दल बदल की राजनीति और लोकतंत्र की आत्मा



चुनाव का मौसम आया नहीं की हर बार की तरह इस बार भी देशभर में दल-बदल का सिलसिला चल पड़ा है। राज्य में जदयू प्रदेश अध्यक्ष जलेश्वर महतो कई अन्य नेताओं के साथ जहां कांग्रेस के पाले में चले गए वहीं राजद प्रदेश अध्यक्ष अन्नपूर्णा, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गिरिनाथ सिंह सहित कई नेताओं ने कमल थाम लिया। वहीं गत लोकसभा चुनाव में चतरा से झाविमो की प्रत्याशी रही नीलम देवी भी भाजपा में शामिल हो गई। भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ताला मरांडी भी झामूमो से तालमेल बैठा रहे हैं। जिला स्तर पर भी विभिन्न दलों में छोटे-बड़े नेताओं का यहां-वहां आना-जाना लगा हुआ है। ऐन चुनाव के वक्त दल बदल की इस कवायद को कभी जनता ने सम्मान से नहीं देखा बावजूद इसके हर चुनाव के पहले यह उछल-कूद मचती है और कभी-कभी तो मंडी भी सजती है। दल बदल के इस खेल में दलों के अंदर भी बवाल मच जाता है। वर्षों से पार्टी का बैनर-झंडा ढोने वाले पुराने व समर्पित कार्यकर्ता ठगा सा महसूस करते हैं। वहीं टिकट की शर्त पर दल बदल कर आने वाले रातों-रात टिकट उड़ा ले जाते हैं। इससे कई बार तो सिटिंग एमपी/एमएलए का टिकट तक काटना पड़ता है। प्रदेश भाजपा फिलहाल इसी उधेड़बुन में चतरा और कोडरमा में फंस गई है। दोनों ही सीटों पर पार्टी के सक्षम कार्यकर्ता (सक्षम इसलिए कि इनमें एक वर्षों तक प्रदेश में वरिष्ठ पदाधिकारी रहे जबकि दूसरे प्रदेश अध्यक्ष, विधायक आदि रहे हैं) सुनील सिंह व पूर्व प्रदेश पार्टी अध्यक्ष रवींद्र राय सांसद हैं लेकिन अब उनकी दावेदारी भी दलबदल के आलोक में कमजोर पड़ गई है।
सवाल यह है कि पार्टी अपने कार्यकर्ताओं के विषय में भी क्या और कैसे सोचती है? कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री मोदी ने लोकतंत्र में विभिन्न दलों के आंतरिक लोकतंत्र, नेतृत्व चयन और निर्माण प्रक्रिया पर बहस छेड़ा था। दुर्भाग्य से यह किसी मुकाम तक नहीं पहुंच पाई लेकिन अब लगता है इसपर चुनावी गहमागहमी के बीच ही चिंतन का समय आ गया है।
सवाल उठता है क्या पार्टी से लंबे समय से जुड़े कार्यकर्ताओं की क्षमता पार्टी इस स्तर तक विकसित नहीं कर पा रही कि वे विभिन्न स्तर पर अपनी पार्टी का नेतृत्व करें? क्या विभिन्न दलों में प्रतिभावान कार्यकर्ताओं की कमी हो गई है या प्रतिभावान लोग दलों की गणेश परिक्रमा व चमचावादी कार्यप्रणाली से खिन्न हो दलों में शामिल ही नहीं हो रहे?
दोनों ही सवालों में सत्यता के जबरदस्त पुट हैं। किसी भी दल में पार्टी नेतृत्व विकसित करने की गंभीर प्रक्रिया नहीं, कुछ योग्य लोग व्यक्तिगत स्तर पर सीख-समझ के आगे बढ़ जाएं तो बात अलग है। प्रतिबंधित भाकपा माओवादियों ने तो इसे स्वीकार भी कर लिया कि प्रतिभावान लोग संगठन में नहीं आ रहे। कटू जरूर है लेकिन सभी राजनीतिक दलों के लिए भी यह सच है।
तभी नीति-सिद्धांत की बात परे रख 'हृदय परिवर्तनÓ के बेहद हास्यास्पद और खोखले तर्क के आधार पर दल-बदल के खेल में सभी शामिल होते हैं। बेशर्मी का तर्क तो यह हो गया है कि जिस दल में जितने लोग आएं वह उतनी ही लोकप्रियता का दावा करने लगती है। जबकि इसी प्रक्रिया से निकली सच्चाई ये है कि कार्यकर्ताओं के मेहनत पर बढ़ी पार्टी उन्हीं कार्यकर्ताओं में अयोग्यता ढूंढने लगती है। और इस अयोग्यता का इलाज घर में करने की व्यवस्था नहीं कर पाने की अपनी चूक को नजरंदाज कर वरीय नेता बाहर से इलाज का फार्मूला निकाल लाते हैँ। ऐसे मामलों में पार्टी के आलाकमान का एक ही घिसा-पीटा तर्क होता है पार्टी को मजबूत करने के लिए या जीत की संभावना प्रबल होने के कारण फलां को पार्टी में लिया गया। लेकिन यही जवाब फिर उसी सवाल को दोहरे ताकत से जन्म दे देती है कि पार्टी लंबे अर्से के बाद भी अपने कार्यकर्ता को इस तरह विकसित क्यों नहीं कर पाई कि वह चुनाव में सक्षम प्रत्याशी बन सके? अगर इस सवाल का जवाब हां होता है जो प्राय: शब्दों में नहीं पार्टी निर्णय में अभिव्यक्त होता है तो पार्टी के वरीय नेताओं की भूमिका खुद सवालों के घेरे में आ जाती है.... कि महाशय आप कर क्या रहे थे? क्योंकि किसी भी दल का एकमेव उद्देश्य चुनाव लडऩा नहीं हो सकता। सत्ता की राजनीति तो राष्ट्र या राज्य के सेवा का माध्यम मात्र है जबकि दल की राजनीति सामाजिक परिवर्तन और आंदोलन का वाहक। इस प्रक्रिया में आप यदि सक्षम नेतृत्व विकसित नहीं कर पाए तो इसका खामियाजा तो पार्टी टिकट नहीं मिलने वाले कार्यकर्ता से ज्यादा उस वरीय नेता को भुगतना चाहिए। ऐसा नहीं कि लोकतंत्र में किसी के दल बदलने पर मनाही है लेकिन यह हृदय परिवर्तन जब ऐन चुनाव के समय होता है तो पचना तो दूर कार्यकर्ताओं को उलटी होने लगती है। पार्टी इससे कितनी मजबूत होती है ये तो नहीं कहा जा सकता लेकिन सभी पार्टी दल-बदल के बाजार में एक ही तराजू लेकर खड़े नजर आते हैं और लोकतंत्र में मत कि पवित्रता ही भंग हो जाती है...मतदाताओं के पास विकल्प कम हो जाते हैं। कुल मिलाकर कहें तो दल-बदल लोकतंत्र की पवित्रता पर कुठाराघात करती है और पानी पी-पीकर लोकतंत्र की हामी भरने वाले सभी दल इस पाप के भागी बनते हैं।
प्रवीण प्रियदर्शी, रांची

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