लोकतंत्र मानव इतिहास में विकसित अबतक का सबसे आधुनिक, समावेशी, सामाजिक वैविधता की स्वीकार्यता और प्रतिनिधित्व वाला शासन प्रणाली है। मध्यकालीन राजनीति में वंशवादी राजतंत्र, सामंतवाद, सैनिकवाद और सांस्थानिक धार्मिक सत्ता के खिलाफ यह मध्यमवर्ग के वैज्ञानिक और खोजपूर्ण चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। यूरोप से चली ये हवा जब भारत पहुंची और राजनीतिक संस्थाओं में अभिव्यक्त होने लगी तो इसमें स्थानीय परिस्थितियों से अनुकुलन लाजिमी था, हुआ भी। स्पष्ट था कोई भी लोकतंत्र जनमत से, बहुमत से और इनके नियामक संस्थाओं से ही चलेगा। लोकतंत्र के पूरे ढांचे में वंशवाद और वंशवादी परंपराओं-संस्थाओं-मान्यताओं की कोई मान्यता नहीं। वास्तव में लोकतंत्र और वंशवाद परस्पर ही प्राणघातक विरोधी शब्द हैं। दुर्भाग्य से भारत में जब आधुनिक लोकतंत्र जड़ें जमाने में जुटा था उसी समय वंशवाद भी आधुनिक स्वरूप में नई व्यवस्था में अपनी जड़ें मजूबत करने में जुट गया। बीसवीं शताब्दी में जब भारत में मतदान आधारित लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व आकार लेने लगा उसी समय कई नेताओं ने जातीय गोलबंदी और अल्पसंख्यक नेताओं ने धार्मिक गोलबंदी को अपनी ताकत बनानी शुरू कर दी।
मतलब दो परस्पर विरोधी मान्यताएं भारतीय लोकतंत्र में साथ-साथ सांस लेने लगी। बाद में यही प्रवृत्ति भारतीय राजनीति में वंशवाद के रूप में प्रस्फुटित हुआ। प्रारंभिक दौर में न तो यह प्रवृत्ति इतनी स्पष्ट और मजबूत थी न ही इसके परिणाम फिर भी इससे चिढ़ ने कई रूप में अपना विरोध प्रकट किया। 1919 में मोती लाल नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष बने। इन्होंने कांग्रेस पार्टी के लिए काफी कुछ किया लेकिन इसके बदले पार्टी में अपने बेटे के लिए प्रमुख स्थान की कामना मन में पाल बैठे। यह कामना 1929 आते-आते इतनी बलवती हो गई की मोतीलाल ने बकायदा गांधी जी को पत्र लिख अपने बेटे (जवाहर लाल नेहरू) को पार्टी अध्यक्ष बनाने की पैरवी की। गांधी द्वारा इंकार किए जाने पर उन्होंने फिर से पत्र लिख अपने बेटे को यह पद देने के फायदे भी गिनाए। इस समय कांग्रेस में नेहरू के सामने सुभाष बोस, जयप्रकाश नारायण जैसे प्रतिद्वंद्वी नाम भी थे। बावजूद इसके अंतत: गांधी मोतीलाल के तर्क से सहमत हो गए और जवाहर का रास्ता सरल बनाने में सहायक हुए। इसी समय बड़े रहस्यमय ढंग से वानर सेना का नाम भी सामने आता है जिसकी नेता इंदिरा बेबी थीं। एक परिवार जिसका अपने परकोटे के बाहर की दुनिया से कोई संपर्क नहीं था उसकी नन्हीं बच्ची रातों-रात छोटे बच्चों का गुप्तचर समूह खड़ा कर लेती है। वास्तव में इतिहास के इस पन्ने के सृजन में कहीं न कहीं वंशवाद का विकृत दिमाग ही सक्रिय मिलेगा। 40 के दशक में सुभाष की आक्रमकता ने उन्हें विदेश जाने को मजबूर कर दिया और स्वतंत्रता के बाद नेहरू भारतीय राजनीति के बेताज बादशाह बन गए। अपने अंतिम दिनों तक वह कांग्रेस के लिए एक नई मान्यता गढऩे में सफल रहे कि बिना नेहरू परिवार के नाम के कांग्रेस खड़ी नहीं रह सकती। इसी भावना के इर्द-गिर्द इंदिरा कांग्रेस में स्थापित भी हो गईं और जवाहर लाल के मौत के दो-तीन वर्षों के अंदर तमाम विरोध के बावजूद प्रधानमंत्री भी बन गईं। उन्होंने बड़े कायदे से कांग्रेस के सभी बड़े नामों को दरकिनार कर दिया और अपने बेटे संजय को स्थापित किया। जिस तरह नेहरू ने बिना नेहरू-गांधी नाम के कांग्रेस का अस्तित्व नहीं का हौवा खड़ा किया उसी तरह इंदिरा ने क्षेत्रीय वंशवादी ऐसे क्षत्रपों के लिए भी स्थान बनाया जो केंद्रीय महासामंत के प्रति वफादार हो। यह डोर संजय गांधी के अकाल मृत्यु के बाद राजीव गांधी के हाथ आ गया। उनके बाद नरसिम्हा राव जरूर प्रधानमंत्री बने लेकिन कांग्रेस में उनके खिलाफ वंशवादी क्षत्रपों के बगावत की स्थिति बनी रही। नरसिम्हा राव के विरोध में कई बड़े कांग्रेसी नेताओं ने पार्टी छोड़ दी। इस एपिसोड का दुखद पटाक्षेप 1996 में पार्टी अध्यक्ष रहे सीताराम केसरी को आफिस से बाहर कर सोनिया को पदारूढ़ कराने से हुआ। सोनिया इस पद पर 17 सालों तक बनी रही। देश के अंदर प्रबंल विरोध के कारण वह खुद प्रधानमंत्री तो नहीं बन सकीं लेकिन मनमोहन के नाम अपरोक्ष रूप से सत्ता का संचालन करती रहीं। मनमोहन जी के प्रधानमंत्री रहते ही स्पष्ट हो गया कि अब बारी राहुल की है। वह कमान उन्हें सौंप भी दी गई। इसी तरह के कई क्षेत्रीय क्षत्रप भी जातिवादी-वंशवादी ताना-बाना खड़ा करने में सफल रहे। इसी विचार के कारण लालू यादव, मुलायम सिंह, शरद पवार, करुणानिधि, चंद्रबाबू, बाला साहब ठाकरे, बादल जैसे राजनीतिक वंश बेल भारतीय लोकतंत्र में पनप सके। वस्तुत: ये सभी कांग्रेस के उस विचार के हमदम रहे हैं राजनीति को देश के विकास का माध्यम तो बनाना है लेकिन इस क्रम में अपने परिवार की राजनीतिक ताकत और समृद्धि दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती रहे।
प्रवीण प्रियदर्शी
मतलब दो परस्पर विरोधी मान्यताएं भारतीय लोकतंत्र में साथ-साथ सांस लेने लगी। बाद में यही प्रवृत्ति भारतीय राजनीति में वंशवाद के रूप में प्रस्फुटित हुआ। प्रारंभिक दौर में न तो यह प्रवृत्ति इतनी स्पष्ट और मजबूत थी न ही इसके परिणाम फिर भी इससे चिढ़ ने कई रूप में अपना विरोध प्रकट किया। 1919 में मोती लाल नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष बने। इन्होंने कांग्रेस पार्टी के लिए काफी कुछ किया लेकिन इसके बदले पार्टी में अपने बेटे के लिए प्रमुख स्थान की कामना मन में पाल बैठे। यह कामना 1929 आते-आते इतनी बलवती हो गई की मोतीलाल ने बकायदा गांधी जी को पत्र लिख अपने बेटे (जवाहर लाल नेहरू) को पार्टी अध्यक्ष बनाने की पैरवी की। गांधी द्वारा इंकार किए जाने पर उन्होंने फिर से पत्र लिख अपने बेटे को यह पद देने के फायदे भी गिनाए। इस समय कांग्रेस में नेहरू के सामने सुभाष बोस, जयप्रकाश नारायण जैसे प्रतिद्वंद्वी नाम भी थे। बावजूद इसके अंतत: गांधी मोतीलाल के तर्क से सहमत हो गए और जवाहर का रास्ता सरल बनाने में सहायक हुए। इसी समय बड़े रहस्यमय ढंग से वानर सेना का नाम भी सामने आता है जिसकी नेता इंदिरा बेबी थीं। एक परिवार जिसका अपने परकोटे के बाहर की दुनिया से कोई संपर्क नहीं था उसकी नन्हीं बच्ची रातों-रात छोटे बच्चों का गुप्तचर समूह खड़ा कर लेती है। वास्तव में इतिहास के इस पन्ने के सृजन में कहीं न कहीं वंशवाद का विकृत दिमाग ही सक्रिय मिलेगा। 40 के दशक में सुभाष की आक्रमकता ने उन्हें विदेश जाने को मजबूर कर दिया और स्वतंत्रता के बाद नेहरू भारतीय राजनीति के बेताज बादशाह बन गए। अपने अंतिम दिनों तक वह कांग्रेस के लिए एक नई मान्यता गढऩे में सफल रहे कि बिना नेहरू परिवार के नाम के कांग्रेस खड़ी नहीं रह सकती। इसी भावना के इर्द-गिर्द इंदिरा कांग्रेस में स्थापित भी हो गईं और जवाहर लाल के मौत के दो-तीन वर्षों के अंदर तमाम विरोध के बावजूद प्रधानमंत्री भी बन गईं। उन्होंने बड़े कायदे से कांग्रेस के सभी बड़े नामों को दरकिनार कर दिया और अपने बेटे संजय को स्थापित किया। जिस तरह नेहरू ने बिना नेहरू-गांधी नाम के कांग्रेस का अस्तित्व नहीं का हौवा खड़ा किया उसी तरह इंदिरा ने क्षेत्रीय वंशवादी ऐसे क्षत्रपों के लिए भी स्थान बनाया जो केंद्रीय महासामंत के प्रति वफादार हो। यह डोर संजय गांधी के अकाल मृत्यु के बाद राजीव गांधी के हाथ आ गया। उनके बाद नरसिम्हा राव जरूर प्रधानमंत्री बने लेकिन कांग्रेस में उनके खिलाफ वंशवादी क्षत्रपों के बगावत की स्थिति बनी रही। नरसिम्हा राव के विरोध में कई बड़े कांग्रेसी नेताओं ने पार्टी छोड़ दी। इस एपिसोड का दुखद पटाक्षेप 1996 में पार्टी अध्यक्ष रहे सीताराम केसरी को आफिस से बाहर कर सोनिया को पदारूढ़ कराने से हुआ। सोनिया इस पद पर 17 सालों तक बनी रही। देश के अंदर प्रबंल विरोध के कारण वह खुद प्रधानमंत्री तो नहीं बन सकीं लेकिन मनमोहन के नाम अपरोक्ष रूप से सत्ता का संचालन करती रहीं। मनमोहन जी के प्रधानमंत्री रहते ही स्पष्ट हो गया कि अब बारी राहुल की है। वह कमान उन्हें सौंप भी दी गई। इसी तरह के कई क्षेत्रीय क्षत्रप भी जातिवादी-वंशवादी ताना-बाना खड़ा करने में सफल रहे। इसी विचार के कारण लालू यादव, मुलायम सिंह, शरद पवार, करुणानिधि, चंद्रबाबू, बाला साहब ठाकरे, बादल जैसे राजनीतिक वंश बेल भारतीय लोकतंत्र में पनप सके। वस्तुत: ये सभी कांग्रेस के उस विचार के हमदम रहे हैं राजनीति को देश के विकास का माध्यम तो बनाना है लेकिन इस क्रम में अपने परिवार की राजनीतिक ताकत और समृद्धि दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती रहे।
प्रवीण प्रियदर्शी

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