Tuesday, April 16, 2019

मुसलमान होना कवच समान

इनके लिए मुसलमान होना कवच समान
माजवादी पार्टी के रामपुर संसदीय सीट से प्रत्‍याशी आजम खां की अपनी प्रतिद्वंद्वी भाजपा के जया प्रदा के खिलाफ की गई गंदी बात (उनके अंडरवीयर का रंग खाखी) पर उसका कुनबा बचाव के लिए सामने आया और चुनाव आयोग पर आरोप लगाया कि मुसलमान होने के कारण उसपर तीन दिन प्रचार करने से रोक लगाई गई है। भारतीय मुसलमानों का बड़ा वर्ग हमेशा से विशेषाधिकार का हामी रहा है। स्वतंत्रता के पहले यही कांग्रेस को हिंदू पार्टी कहकर विशेषाधिकार लेते थे। स्वतंत्रता के बाद जब कांग्रेस की सत्ता आई तो इन्होंने वही पॉलिटिक्स जारी रखी। कुछ उदाहरण और देख लें....टाइगर पटौदी जो भारतीय क्रिकेट टीम के सबसे कम उम्र में कप्तान बने तब वे भारतीय थे लेकिन जब कभी किसी मामले में वे घिरे तो उसका मुकाबला करने के बजाय अपने मुसलमानियत में बचाव ढूंढने लगे। उन्होंने कहा कि मुसलमान होने के कारण मुझे निशाना बनाया जा रहा है। एक और भारतीय क्रिकेट कप्तान मोहम्मद अजहरूद्दीन जो कांग्रेस से सांसद भी रहे, जब मैच फिक्सिंग मामले में विवाद में आए तो उन्होंने भी वही कहा मुसलमान होने के कारण मुझे टारगेट किया जा रहा है। भोपाल से भारतीय टीम हॉकी में पहुंचे असलम शेर खां कांग्रेस के सांसद भी रहे जब किसी विवाद में फंसे तो उन्होंने भी अपनी मुसलमानियत आगे कर दी। परिस्थिति का सामना करना छोड़ उन्होंने मुसलमान के नाम पर विशेषाधिकार के तहत इससे बचने के लिए कहा कि मुसलमान होने के कारण मुझे निशाना बनाया जा रहा है। याद होगा कुछ समय पूर्व एक बॉलीवुड हीरो इमरान हाशमी का मकान के संबंध में विवाद हुआ था तो उन्होंने भी अपनी मुसलमानियत आगे कर विशेषाधिकार की कामना की थी। कहा था मुसलमान होने के कारण मुझे इस सोसाइटी में मकान नहीं दिय जा रहा है। जबकि उसी सोसाइटी में कई अन्य मुस्लिम परिवार भी रहते थे। बाद में उन्होंने ही हाशमी की बात को गलत बताया। कहने का मतलब ये हैं कि कानून या विवाद के जद में कोई भी आ सकता है, और उसे उसका सामना करना चाहिए....अधिकतर लोग करते ही हैं।  ऐसे में उसका सामना करने के बदले मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग अपनी मुसलमानियत को आगे कर विवाद या कानूनी कार्रवाई से छूट के लिए महज मुस्लिम होने के कारण विशेषाधिकार की चाह रखता है। इस चाह की व्यापकता और आक्रमकता का दबाव संवैधानिक संस्थाओं और उनके क्रियाकलाप पर भी साफ दिखता है। ऐसे में कानून की व्यवस्था बनाने में परेशानी होना सहज बात है। जब गतिरोध एक जगह उत्पन्न हो जाता है तो प्रतिगतिरोध का उत्पन्न होना भी लाजिमी है...। वास्तव में मुस्लिम समाज मल्टी कल्चरल सोसाइटी में एकरस होकर रहने में परेशानी महसूस करता है, जहां उनकी संख्या ज्यादा होती है वहां अल्पसंख्यकों को बड़े ही नियोजित ढंग से खत्म कर दिया जाता है। ईरान, लीबिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश, कई अफ्रीकी देश, कश्मीर में अल्पसंख्यकों की स्थिति और एथनिक क्लीजिंग इसके प्रमाण है। सबसे दुखद बात ये कि मुस्लिम समाज के अन्य बुद्धिजीवी ऐसे कृत्य पर या तो मौन दर्शक बन जाते हैं या ऐसे कृत्य के पक्ष में इस्लाम के नाम पर तर्क गढऩे लगते हैं।
प्रवीण प्रियदर्शी

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