Sunday, April 21, 2019

मी टू का निजी आरोप न्यायपालिका पर हमला कैसे


बात संभवत: 1997 की है... दिन, तारीख याद नहीं। शायद सर्दी का मौसम था। उन दिनों मैं दिल्ली में रहकर सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहा था। एक बार रांची आ रहा था सुबह पांच-साढ़े पांच बजे पुरुषोत्तम एक्सप्रेस पकडऩी थी सो साढ़े चार के आसपास स्टेशन पहुंच गया। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उस समय कोई इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज साहब भी इलाहाबाद जाने के लिए पहुंचे थे। उनकी बर्थ पर कोई और बैठा हुआ था...सीट खाली करने को लेकर विवाद हुआ और उन्होंने वहीं प्लेटफार्म में कोर्ट लगाकर टीटीई को दंडित किया। ये बताने का आशय सिर्फ इतना है जब न्यायाधीश महोदयों के साथ कुछ व्यक्तिगत समस्या आती है तो न्यायालय की ताकत को वह अपनी निजी ताकत बनाकर अपनी रक्षा करते हैं। अगर यह संभव है तो कभी-कभी ही सही हनक दिखाने के लिए भी ऐसा होता होगा।
ऐसी ही नजीर मुख्य न्यायाधीश महोदय पेश कर रहे हैं। किसी महिला ने यौन शोषण का आरोप उनपर लगाया और न्यायपालिका खतरे में आ गई... वाह...गजब सर जी... ये कैसा तर्क है। उससे भी बढ़कर जिनपर आरोप लगा उस मामले की सुनवाई उन्हीं की अध्यक्षता में होगी। ये तो गजबे गजब मामला है भाई। महिला ने आरोप क्यों लगाया, कैसे लगाया, इसमें सच्चाई है या बस गलत मंशा इसकी जांच तो नैसर्गिक न्याय की मांग है, कोई...मतलब को...ई.. भी...इससे कैसे इंकार कर सकता है। रंजन गोगोई साहब कह रहे हैं मैं मुख्य न्यायाधीश हूं इसलिए ऐसा कर सकता हूं। उन्होंने ने तो न्यायालय की स्वतंत्रता को ढाल बना निजी मामले को न्यायालय पर हमले का शक्ल दे अपना रक्षाकवच तैयार कर लिया। आश्चर्य यह कि इसपर कहीं कोई शोर नहीं, कोई बहस नहीं, कोई चर्चा नहीं मानो कुछ हुआ ही न हो। न्यायाधीश और न्यायपालिका पर इस देश में बहस बहुत कम होती है। बुद्धिजीवी, चिंतक और राजनेता इसे पवित्र अस्पृश्य मानकर आंखें बंद करने में ही भलाई समझते हैं। लेकिन लोकतंत्र के स्तंभ के रूप में इसे जन बहस से मुक्ति देना लोकतांत्रिक परंपरा के प्रति गंभीर पाप है। गोगोई साहब की निजी निष्ठा, ईमानदारी व चारित्रिक पवित्रता का पूरा सम्मान करते हुए भी मैं यही कहूंगा कि किसी ने जब आरोप लगा ही दिया है तो उन्हें निजी हैसियत से आम भारतीय की तरह नैसर्गिक कानूनी दायरे में इसका सामना करना चाहिए। हां मैं एक बात में उनसे सहमत हूं कि ऐसे आरोप के कारण इस्तीफा देने की जरूरत नहीं है। इसे सभी स्तर मतलब बड़े से लेकर छोटे स्तर तक प्रभावी बनाना चाहिए। क्योंकि ''मी टूÓÓ के इस माहौल में किसी की प्रतिष्ठा तो कोई तार-तार कर दे लेकिन उसकी रोजी-रोटी संघर्ष में अंतिम निर्णय आने तक बना रहे। वैसे भी जमाना मी टू का है और नेता-मंत्री, संतरी, अभिनेता, पत्रकार, व्यवसायी होते हुए यह देश में न्याय के सबसे बड़े पहरेदार के दरवाजे पर दस्तक देने पहुंच गई। निश्चय ही इस दरवाजे पर यह दस्तक काफी पीड़ा देने वाली है। कई मायने भी हो सकते हैं लेकिन दस्तक तो दस्तक है...जब बेल बज गई है तो जवाब देना ही पड़ेगा।
प्रवीण प्रिदयर्शी

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