शारदा पीठ के शंकराचार्य राजराजेश्वराश्रम जी ने रांची में आदिवासियों को हिंदू बता नाहक का विवाद खड़ा कर दिया है। आदिवासी प्रकृतिपूजक हैं इसमें कोई विवाद नहीं। मैं ये भी मानता हूं कि अन्य धर्मों के मुकाबले आदिवासियों की मान्यता हिंदुओं की मान्यता से सबसे ज्यादा नजदीक है। आदिवासी पेड़, जंगल, पहाड़ की शक्तियों को पूजते हैं हिंदू भी पूजते हैं, सांप व वन्य जीवों को दोनों पूजते हैं। कई प्रतीक चिन्ह भी समान हैं। इन तमाम वैचारिक साम्यता और धार्मिक मान्यता की नजदीकी के कारण आदिवासियों को हिंदू नहीं कहा जा सकता। वह अपनी पहचान को सरना या आदिवासी के रूप में ही रखना चाहते हैं तो किसी को क्या परेशानी होनी चाहिए। शंकराचार्य की पदवी हिंदू समाज में काफी ऊंची है, इस पद पर विराजने वाले महानुभावों को भी आदि शंकराचार्य की परंपरा को अपने कार्य-व्यवहार में हमेशा याद रखना चाहिए। हिंदुत्व की विशाल समावेशी शक्ति को और परिष्कृत करें, तार्किक और समयानुकूल बनाएं... इससे ज्यादा और कुछ की आवश्यकता नहीं। वैसे भी प्रचार, सेवा और कहीं-कहीं प्रलोभन के प्रभाव बड़ी संख्या में आदिवासी इसाई बने हैं। एक ईश्वर, एक पुस्तक, एक पद्धति के दायरे में बंधने के करण ऐसे लोगों में आदिवासियत की उन्मुक्तता नहीं रह जाती। बड़ी संख्या में आदिवासी युवतियों से मुस्लिम युवकों की शादी भी हो रही है। इस तरह आदिवासियों की एक संख्या मुस्लिम भी बन रहे हैं और आदिवासी पहचान भी खो रहे हैं। वहीं कई आदिवासी अब सरना धार्मिक मान्यता के साथ ही हिंदू पूजा पद्धति भी अपनाने लगे हैं बावजूद इसके वो पूरी तरह से आदिवासी हैं। इन तमाम सामाजिक गतिशीलता के बीच भी हम आदिवासियों के हित-अहित की बात सोचने वाले उनकी पहचान बदलने की पहल नहीं कर सकते। माननीय इसलिए निवेदन है कि आदिवासियों पर हिंदुत्व पहचान नहीं थोपें... उन्हें उनकी पहान के साथ ही जीने, चहकने और पनपने दें।
प्रवीण प्रियदर्शी, रांची
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