वर्जिनिटी व चेस्टिटी के विचार ने किया महिला का बेड़ा गर्क
आदि मानव काल के बाद जैसे ही मनुष्य ने व्यवस्थित गृहस्थ जीवन की ओर कदम बढ़ाया वैसे ही महिलाओं की सामाजिक स्थिति कमजोर होने लगी। महिलाओं पर पुरुष का वर्चस्व बढऩे लगा और उनके लिए नए-नए मापदंड गढ़े जाने लगे। सामाजिक प्राणी के रूप में यौनता पुरुष और महिलाओं का नैसर्गिक गुण रहा, प्रारंभिक काल में यौन आवश्यकता पूरी करने में शायद कोई पाबंदी भी नहीं रही होगी। लेकिन गृहस्थ जीवन ने एक नई व्यवस्था गढऩी शुरू कर दी। इसमें महिलाओं के सामने नीत नई वर्जानाओं की सीमा रेखा खींची जाने लगी। महिला की शारीरिक संरचना, विशिष्टता या सीमाओं का पुरुष ने बड़ी चालाकी से और कभी-कभी तो 'ब्रूट फोर्सÓ से अपने पक्ष में इस्तेमाल किया और महिला को घर में समेटने में सफल रहे। घर में सीमटते ही स्त्री... पुरुष की मिलकियत बन गई, उसके आर्थिक प्रयास-क्षमता व विशिष्टता को भी पुरुष ने अपनी मिलकियत का हिस्सा बना लिया। वहीं लज्जा, कौमार्य और सुचिता जैसे शब्द आकार लेने लगे। उन कालों के सामाजिक संघर्ष में सुरक्षा के नाम पर इन शब्दों को मजबूत किया गया और महिला को पुरुष और परिवार के सम्मान से जोड़ दिया गया। लज्जा, कौमार्य, सुचिता और पुरुष या पारिवारिक सम्मान का मान बिंदू बनते ही महिला की दुनिया बदल गई। अब वह पुरी तरह पुरुष के अधीन हो गई। उसकी अस्मिता ही खत्म कर दी गई, उसकी शिक्षा, सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक अधिकारों को दोयम माना जाने लगा। हर समाज ने उनके लिए ऐसे-ऐसे नियम-कानून बनाए की खुद को मानव और विवेकशील कहने में शर्म महसूस होने लगे। इस पुरुषवादी विभत्सता ने आधी आबादी की नैसर्गिकता पर ही हमला कर दिया। विचारशील प्राणी को हंसने-बोलने वाली गुडिय़ा बनाने के इस कुत्सित प्रयास ने मानवता के खिलाफ ऐसा जुर्म किया जिसका कोई प्रायश्चित नहीं। इसके साथ ही महिला के अधिकार और उनके प्रति नजरिया में तत्कालीन समाज में व्यापक परिवर्तन हुआ। कभी सामाजिक संघर्ष, उपार्जन और विकास की सहचरी रही स्त्री अब संघर्ष में विजेता के लिए इनाम बन गई। ऐसे संघर्ष के विजेता यौनांग का इस्तेमाल युद्ध के अस्त्र के रूप में महिलाओं से करने लगे और सामाजिक संघर्ष के बाद महिलाओं का सामूहिक उत्पीडऩ शुरू हुआ। पुरुषवादी समाज में उससे हर कदम पर सिर्फ 'उस चीजÓ की कीमत मांगी जाने लगी जिसे इसी पुरुष ने अपने लिए सम्मान और महिल के लिए लज्जा और सुचिता बना दिया था। इसके लिए सहमति जैसे शब्दों को कीमत बताने-समझाने के तर्क भी गढ़े जाने लगे। आज के आधुनिक युग में भी कौमार्य, सुचिता, लज्जा और सम्मान उनकी गतिशीलता और व्यक्तित्व, शरीर और योगयता से समर्पण मांगता है। शायद मी टू इसी पुरुषवादी संपूर्ण नग्नता की तस्वीर है। यौन इ'छा और पहल सरल स्वभाविक मानवीय गुण हैं। इसमें कभी कौमार्य, कभी सुचिता, कभी लज्जा तो कभी सम्मान का पहरा लगा हम न सिर्फ मानवता के प्रति अपराध करते हैं बल्कि एक विभत्स सामाजिक कुंठा को भी जन्म दे रहे हैं। इससे विचार विभेद को यौन उन्मुक्तता की वकालत न माना जाए बस यह यौनता की बराबरी और महिला दर्प और व्यक्तित्व के संपूर्णता के सम्मान से जोड़ा जाए। फिर कहें तो वर्जिनिटी, चेस्टिटी, ऑनर (कौमार्य, सुचिता, सम्मान) के विचार ने महिलाओं के जीवन को नरक बना दिया और समाज के पुरुषवादी स्वरूप की नियामक रेखा खींची।
प्रवीण प्रियदर्शी

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