Friday, October 20, 2017

भूख और भूख जनित बीमारी के बीच गूंज रही खामोश संतोषी की चीख



राशन कार्ड के आधार से लिंक नहीं होने के कारण एक अति निर्धन परिवार का राशन रोकना राष्ट्रद्रोह से कम अपराध नहीं। जिस किसी व्यक्ति या तंत्र ने ऐसा किया उसने संविधान प्रदत्त सरकार के मौलिक कर्तव्य की राह बाधित की है। जब संविधान की राहें जनता तक पहुंचने से अवरुद्ध होती है तभी उग्रवाद और नक्सलवाद पैदा होता है। इसलिए दस वर्षीय संतोषी की मौत के कारकों को मैं राष्ट्र के खिलाफ षठ्यंत्र मानता हूं। ऐसे षठ्यंत्रपूर्ण वातावरण में पीडि़त परिवार की बच्ची की मौत भूख से होती है या बीमारी के दौरान लगातार भूखे पेट रहने से उत्पन्न मर्मांतक कमजोरी या और गंभीर हो गई बीमारी से... यह मायने नहीं रखता।
सिमडेगा के जलडेगा प्रखंड के कारीमाटी बस्ती में भूख के तकनीकी शब्दों के बीच मृत दस वर्षीय संतोषी चीख-चीखकर सरकार और व्यवस्था से ऐसे ही कई और भूखों के लिए न्याय मांगती रहेगी। माननीय और बाबू लोग जो भी कहें लेकिन... ये मौत सिर्फ और सिर्फ सरकारी व्यवस्था और अफसरशाही की असंवेदी असफलता की गंदी गाथा ही कहलाएगी। अपनी खाल बचाने के लिए दोनों ही भूख से मौत और भूख जनित बीमारी से मौत के मायने समझाने लग पड़े हैं। जबकि सच्चाई पीडि़तों की आंखों का दर्द व घर में लुढ़क रहे ठनठनाते खाली बर्तन बयान कर रहे हैं। संतोषी की मां कोइली कह चुकी है कि राशन नहीं होने के कारण वह बेटी को कई दिनों से खाना नहीं दे पाई थी। कई दिनों तक उनका परिवार साग-पात खाकर भी रहा है। आधार से राशन कार्ड के जुड़े नहीं होने के कारण पीडीएस डीलर ने उसे राशन नहीं दिया। आधार की महत्ता और सेवाओं की गुणवत्ता पर सवाल उठाए बिना मैं समाज के अंतिम व्यक्ति के भोजन के अधिकार को बेहद मौलिक और किसी भी आधार या दस्तावेज से बड़ा मानता हूं। ऐसे में सरकार सिर्फ जवाब न दे दोषी पर सीधी कार्रवाई हो।

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