Tuesday, October 24, 2017

भारतीय पर्व परंपरा में विभाजक रेखा है छठ

लोक आस्था के महापर्व छठ की धार्मिक महत्ता से कौन परिचित नहीं। आरोग्य के साथ ही सुख-समृद्धि व लोकाचारी समानता का यह पर्व पूर्वी भारत से होता अब देश के लगभग सभी शहरों में लोकप्रिय हो चुका है। धार्मिक महत्ता के इतर भारत में सामाजिक परिवर्तन के वाहक व वैदिक सनातनी धार्मिक परंपरा से बिलकुल अलग रेखा खींच इसे व्यापक जन स्वीकृति दिलाने के कारण छठ को हम भारतीय पर्व परंपरा के प्रवाह में गहरी विभाजक रेखा मान सकते हैं। वैदिक-सनातनी व पौराणिक धार्मिक परंपरा में कर्मकांड की जटिलता व पुरोहित वर्ग के वर्चस्व से मुक्त शुद्ध लोकाचारी धार्मिक परंपरा का उद्भव कोई हंसी-खेल नहीं था। इस विद्रोही उद्भव के बीच वैदिक-पौराणिक मान्यता के साथ ही लोकाचार व जन मान्यता के सामंजस्य ने इस पर्व को अनूठा स्वरूप प्रदान किया। पुरोहित वर्ग व कर्मकांड का दखल नहीं होने से यह पर्व सफलता पूर्वक समता का भाव संचारित करता है। कोई भी, कहीं भी बिना किसी भेद-भाव के इस व्रत को अपनी श्रद्धा के अनुसार कर सकता है। रूढ़ी, कर्मकांड व पुरोहितों के विशेष महत्व के इर्द-गिर्द बुने हमारे पर्व-त्योहारों के बीच छठ की इस विशेषता व लोकाचारी स्वरूप ने इसे पर्व से ज्यादा जनसाधारण का उत्सव बना दिया। यह मान्यता और इसकी स्वीकृति भारतीय पर्व परंपरा में किसी क्रांति से कम नहीं है।
स्त्री और कन्या की महत्ता
लोकपर्व होने के कारण आम सामाजिक जीवन की तरह इसकी बड़ी खासियत है स्त्री और कन्या की महिमा को स्वीकारना। भारतीय पर्व परंपरा में शायद यह पहला पर्व है जिसमें सूर्य देव से पुत्री की कामना की गई है। पर्व के दौरान मंत्रोच्चार तो होते नहीं सो लोक गीतों में इसकी भावना अभिव्यक्त होती है। सूर्य देव से पुत्री की कामना करते हुए व्रतियों द्वारा गाया जाने वाला यह गीत 'रूनकी-झूनकी बेटी मांगी ला...पढ़ल पंडित दामादÓ कई अनकही बातें कह जाता है। यहां पंडित शब्द भी शास्त्रीय नही लोकाचारी है और पढ़े-लिखे दामाद की कामना को अभिव्यक्त करता है। भारतीय पर्व परंपरा में किसी भी पुरूष प्रधान समाज की तरह प्राय: पुत्र की प्राप्ति, पुरुषों के दीर्घायु व बलवान होने की कामना करते हुए महिलाओं के अनेकों पर्व हैं। लेकिन छठ ऐसा लोक पर्व है जिसमें न सिर्फ सूर्य देव से बेटी की मांगी जाती है, और यह कामना स्त्री-पुरुष दोनों समान रूप से करते हैं। इस तरह पर्व की भावना पर व्यक्तिवादी-जातिवादी अहम गौण हो जाता है।
स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना
पर्व की एक और भौतिकवादी विशेषता है, वह है स्वास्थ और समृद्धि। स्वास्थ ही धन व समृद्धि का द्योतक माना जाता है। आज भी कहते हैं हेल्थ इज वेल्थ। इस दृष्टि से यह लोकाचारी, समता और सुख-समृद्धि के महापर्व का प्रतिनिधि बनता है।
प्रवीण प्रियदर्शी, रांची

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