नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय जनमानस में बिल्कुल अलग क्रांतिकारी, अध्यात्मिक, प्रगतिशील और सर्वसमावेशी छवि से जाने-पहचाने जाते हैं। उनकी प्रखरता ने देश को काफी कुछ दिया। 1939 में गांधीजी से मतभेद के बाद जब उन्होंने फारवर्ड ब्लॉक के स्थापना का मन बनाया तो इसके चिंतन प्रक्रिया में रांची की माटी का अहम योगदान रहा। फारवर्ड ब्लाक की स्थापना हो या फिर देश से बाहर निकल स्वतंत्रता के लिए आजाद हिंद फौज के गठन जैसा राजनीतिक महाप्रयोग, सभी में झारखंड की माटी का योगदान रहा। दीगर रहे कि देश से बाहर निकलने के लिए नेताजी कोलकाता से धनबाद पहुंचे थे। गोमो रेलवे स्टेशन से ट्रेन पकड़ नेताजी जो गए तो फिर लौट कर नहीं आए। वहीं रामगढ़ अधिवेशन में 'फारवर्ड ब्लॉकÓ की स्थापना करने नेताजी का काफीला रांची से ही निकला था। तब नेताजी रांची के डा. फणींद्र नाथ चटर्जी की नई फीएट रोल्स बीआरएन-70 पर सवार हो रामगढ़ पहुंचे थे। फूलों से सजी गाड़ी खुद डा. फणींद्र नाथ चला रहे थे उसमें नेताजी के साथ यदुगोपाल मुखर्जी और उनके एक दो करीबी बैठे थे। फारवर्ड ब्लाक की रूप रेखा तैयार कर लेने के बाद सुभाष बाबू कोलकाता से जमशेदपुर, तमाड़, बुंडू, खूंटी होते रांची पहुंचे थे। यहां उनका जोरदार स्वागत हुआ। रांची में उनके प्रमुख सिपहसलार यदुगोपाल मुखर्जी (रांची के प्रसिद्ध चिकित्सक डा. सिद्धार्थ मुखर्जी के पिता) थे। यदुबाबू खुद बंगाल में सक्रिय क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति के सक्रिय सदस्य थे। अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण अगस्त 1928 में बंगाल से निष्कासित होने के बाद उन्होंने रांची में अपना ठिकाना बनाया। क्रांतिकारियों के प्रति सहानुभूति के कारण नेताजी की यदुगोपाल मुखर्जी से घनिष्ठता थी। यदु बाबू की प्रखर राजनीतिक समझ के कारण नेताजी प्राय: उनसे राजनीतिक विमर्श भी किया करते थे।
12 फरवरी 1938 में कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद महात्मा गांधी से कई बिंदुओं पर उनकी असहमति रही। फलत: गांधीजी ने अध्यक्ष के तौर पर उनके दूसरे कार्यकाल का विरोध किया और अपने निकटस्थ पट्टाभी सीता रमैया को उनके खिलाफ खड़ा कर दिया। गांधी जी के खुले समर्थन के बावजूद नेताजी ने रमैया को हरा दिया। लेकिन इसके बाद उनके लिए कांग्रेस के अंदर काम करना आसान नहीं रहा। उन्होंने अलग पार्टी बनाने की ठान ली। इस विचार को अंजाम देने के पूर्व नेताजी यदुगोपाल मुखर्जी से मिले। बकौल यदुगोपाल के पुत्र डा. सिद्धर्थ मुखर्जी नेताजी ने उनके पिता से कहा कि गांधी जी भारतीय राजनीतिक जागरण के मुख्य आधार हैं मेरा उनसे कोई विरोध नहीं हमारे उद्देश्य समान है लेकिन रास्ते अलग हो रहे हैं। 22 मार्च 1938 में भी उन्होंने कोलकाता से पत्र लिख यदु बाबू को विचार विमर्श के लिए बुलाया। कांग्रेस से इस्तीफा देने के बाद जब उन्होंने 1939 के रामगढ़ कांग्रेस में फारर्वड ब्लाक की घोषणा की उसके पूर्व कई बार उन्होंने यदुबाबू, डा. फणींद्र नाथ चटर्जी आदि से विचार विमर्श किए।
12 फरवरी 1938 में कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद महात्मा गांधी से कई बिंदुओं पर उनकी असहमति रही। फलत: गांधीजी ने अध्यक्ष के तौर पर उनके दूसरे कार्यकाल का विरोध किया और अपने निकटस्थ पट्टाभी सीता रमैया को उनके खिलाफ खड़ा कर दिया। गांधी जी के खुले समर्थन के बावजूद नेताजी ने रमैया को हरा दिया। लेकिन इसके बाद उनके लिए कांग्रेस के अंदर काम करना आसान नहीं रहा। उन्होंने अलग पार्टी बनाने की ठान ली। इस विचार को अंजाम देने के पूर्व नेताजी यदुगोपाल मुखर्जी से मिले। बकौल यदुगोपाल के पुत्र डा. सिद्धर्थ मुखर्जी नेताजी ने उनके पिता से कहा कि गांधी जी भारतीय राजनीतिक जागरण के मुख्य आधार हैं मेरा उनसे कोई विरोध नहीं हमारे उद्देश्य समान है लेकिन रास्ते अलग हो रहे हैं। 22 मार्च 1938 में भी उन्होंने कोलकाता से पत्र लिख यदु बाबू को विचार विमर्श के लिए बुलाया। कांग्रेस से इस्तीफा देने के बाद जब उन्होंने 1939 के रामगढ़ कांग्रेस में फारर्वड ब्लाक की घोषणा की उसके पूर्व कई बार उन्होंने यदुबाबू, डा. फणींद्र नाथ चटर्जी आदि से विचार विमर्श किए।
very good knowledge about Netaji... Thank You Sir..
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