Thursday, March 14, 2019

सेक्स ऑबजेक्ट वीमेन की मानसिकता और लैंगिक समानता


मा नव विकास की कहानी आज उस मोड़ पर है जहां लैंगिक समानता मजबूती से नारी ही नहीं सामाजिक, बौद्धिक विमर्श के केंद्र में है। होना भी चाहिए... ये सोचना ही एक आम संवेदनशील व्यक्ति को अपराध बोध से ग्रसित कर देता है कि 21 वीं शताब्दी में भी महिला मौलिक अधिकारों के लिए मोहताज हो या महज लैंगिक आधार पर भेदभाव और उत्पीडऩ की शिकार हो। समाज में बढ़ती आर्थिक विषमता, आर्थिक मौके और रोजगार के अवसरों के स्वरूप में हो रहे परिवर्तन ने मानव-मानव संघर्ष को और बढ़ा दिया है। इतिहास के अन्य संघर्षों की तरह इस संघर्ष का असर भी सबसे ज्यादा महिलाओं पर पड़ा है और पुराने वीभत्स ढंग से ही पड़ा है। मतलब नारी को सेक्स ऑबजेक्ट मानने की अवधारना और मजबूत हुई है। अवसरों व रोजगार की गतिशीलता के दबाव में पैदा हुई श्रम और कौशल की गतिशीलता ने मजबूत और जागरूक नारी की शर्त रख दी। वहीं जबरदस्त प्रतियोगिता के बीच उपरोक्त पैमाने पर खरा उतरने के उतावलेपन और दबाव ने खुद के निखार के अवसर के साथ ही अनर्गल समझौतों और शोषण का भी एक नया द्वार खोल दिया है। शोषण और विभेद का यह चैप्टर भले आज के जमाने का हो लेकिन उसमें दर्ज कहानियां सदियों पुरानी वही अपमान, अयोग्यता के आरोप, जोर-जबरदस्ती, यौन समझौतों या बलात्कार पर खत्म होती है। ऐसे चुनौतियों के बीच महिला अधिकार और लैंगिक समानता का विमर्श हमसे कुछ ज्यादा ही चाहता है।
परीक्षा की बेइन्तहा घडिय़ां
महिला के जीवन में परीक्षा की घडिय़ां उसके जन्म के साथ ही शुरू हो जाती है। कदम-कदम पर पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, नैतिक, रहन-सहन की बंदिशों और भेदभाव का अंतहीन परस्पर प्रतियोगी सिलसिला चल पड़ता है। कुछ मामलों में तो यह दुर्भाग्य जन्म के पहले ही पाले पड़ जाता है। ऐसे दुरुह वातावरण में जीना-पलना-बढऩा और आगे की मंजिलें प्राप्त करना कितना चुनौतीपूर्ण होता होगा इसकी कल्पना ही की जा सकती है। खैर मानव प्रकृति भी बड़ी ढीठ है, जिस परिस्थितियों और चुनौतियों के बीच जीती है उसे ही सहज और स्वभाविक मान लेती है। महिला भेदभाव और उत्पीडऩ का मूल मर्म भी कहीं इसी में छिपा है। कहीं भी किसी भी परिस्थिति में किसी भी अन्याय को एक बार स्वीकार करते ही इसका सामान्यीकरण बड़े जोर-शोर से शुरू हो जाता है और यह कहीं भी न्याय की मान्यता के लिए नई चुनौती बन जाती है। स्पष्ट नजर आने वाले लैंगिक विभेदों को भी लोग बड़ी सहजता से स्वीकार करने लगते हैं। इस स्वीकार्यता में महिलाओं की भूमिका भी काफी बड़ी है। अगर कहीं कोई विचलन नजर आया तो लोकलाज, चाल-चलन, मर्यादा, नैतिकता के इतने पाठ पढ़ाए जाने लगते हैं कि अपवादों को छोड़ आत्मसमर्पण ही अंतिम उपाय बच जाता है।
वैश्विक हैं चुनौतियां
इसका स्वरूप मामूली फेर बदल के साथ आश्चर्यजनक रूप से वैश्विक है। इसके खिलाफ संघर्ष भी वैश्विक ही होगा... हां उसके स्थानीय संस्करण की गुंजाइश हमेशा रहेगी। सच तो यह है कि इस संघर्ष के स्थानीय संस्करण ही मूल धारा को मजबूत और निर्णायक बनाएंगी। पारिवारिक स्तर से ही इस प्रकिया को मजबूत करने की पहल होनी चाहिए। यह संवेदनशील, सजग और इमानदार लोगों के लिए इस दिशा मे सबसे सरल प्रयास भी होगा। महिलाओं की भूमिका परिवार के निर्णय प्रकिया में जितनी बड़ी और प्रभावी होगी उसमें सहिष्णुता, संयम और विवेक भी उतना ही होगा। इस छोटे से पहल से लोकलाज, चाल-चलन, मर्यादा, नैतिकता की परिभाषा नए समतामूलक धरातल पर नजर आने लगेगा। ऐसे प्रयोगशाला से निकले लोग ही समाज और देश में लैंगिक समानता की धार मजबूत कर सकेंगे। इससे जो समतामूलक आधार तैयार होगा वह हर स्तर पर आरक्षण या संरक्षण से नहीं स्वभाविक विकास और योग्यता से निर्णय प्रकिया का हिस्सा बनने को महिलाओं को प्रेरित करेगा। एक बार ये धारा बह निकली तो यौन शोषण की पाश्विकता भी ठिठुर-सहम जाएगी। ये सामाजिक, बौद्धिक ठिठुरन-सिहरन वर्जिनिटी और चेस्टिटी (कौमार्य और सुचिता) के बेहद संकीर्ण और एकपक्षिय विचार पर तीखा प्रहार होगा। जैसे-जैसे यह प्रहार तीखा होता जाएगा लैंगिक समानता की धरातल उतनी ही मजबूत होती जाएगी।

Praveen Priyadarshi 

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