एक खाऊं .. दो खाऊं... तीन खाऊं.... या सारे ही खा जाऊं.....
बचपन में मां ने एक कहानी सुनाई थी... आज बरबस ही याद आ गई। एक ग्रामीण युवक ने अपनी गरीबी से परेशान हो रोजगार की तलाश में दूसरे शहर जाने की ठान ली। पत्नी ने रास्ते में खाने के लिए एक पोटली में रोटी बांध दी। चलते-चलते जब युवक थक गया तो एक पेड़ क नीचे बैठ गया। थोड़ा आराम करने के बाद सोचा एक दो रोटी खा लूं। आसपास देखा तो कुआं नजर आया, सोचा चलो पानी निकाल कर हाथ-मुंह धो लूं फिर रोटी खाता हूं। वीरान स्थल पर स्थित उस कुएं में कोई आता नहीं था तो कुएं में सात परियों ने डेरा जमा लिया था। पथिक ने जब कुएं से पानी निकालने के लिए बाल्टी डाली तो परियां एकदम से सतर्क हो गईं। इनसब से बेखबर पथिक ने हाथ-मुंह धोकर रोटी निकाली ... देखा सात रोटियां हैं। वह अपने यात्रा के समय के अनुसार विचार करने लगा अभी कितनी रोटी खाऊं....बाद में कितनी... ताकि गंतव्य तक पहुंच जाऊं। उसने खुद से सवाल किया एक खाऊं .. दो खाऊं... तीन खाऊं.... या सारे ही खा जाऊं.....। कुएं में हर हलचल पर कान लगाए बैठी परियों ने उसकी आवाज सुन ली और डर से आधी हो गईं ये तो एक ही नहीं हम सातों को खाने की बात कह रहा है। डरी-सहमी परियां एकदम से कुएं से बाहर निकल आईं और पथिक से खुद को बख्शने की गुजारिश करने लगी और उसके बदले वह जो कुछ चाहे देने का प्रस्ताव भी रखा। पथिक भी अवाक था कहां बात रोटियां खाने की हो रही थी और कहां से परियां आ टपकीं। खैर उसने इमानदारी से परियों को अपनी गिनती का मतलब समझाया और उन्हें बेफिक्र रहने को कहा और आगे बढ़ गया। परियां सकुन के साथ वापस कुएं में चली गईं और युवक के सद्गुण और इमानदारी की चर्चा करने लगीं। कहा हमें ऐसे गुणी युवक की मदद करनी चाहिए, उन्होंने अपनी शक्ति से उसपर कृपा बरसाई और रास्ते में उसे काफी धन-संपत्ति मिला जिसे ले वह वापस अपने गांव आ गया और सपरिवार खुशी-खुशी रहने लगा।
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लेकिन आज ये कहानी बदल गई है.... कुएं में छलांग लगाने की मंशा लिए एक बेरोजगारी युवक वहां पहुंचा। लेकिन कुएं के पास उसके कदम सहम गए... अपने जेब में रखे स्लीपिंग पिल्स की स्ट्रीप निकाली और कहा एक खाऊं...दो खाऊं....तीन खाऊं..... या सारे ही खा जाऊं। परियां सहम गईं.. अरे इतने दिनों बाद ये सवाल फिर से, सभी मिन्नत करती बाहर निकल आईं। परियों ने युवक के सामने जीवनदान के बदले जो चाहो सो देने का प्रस्ताव रखा। युवक एकाएक कई योजनाएं गढऩे में उलझ गया। धन-संपत्ति ही नहीं पूरी दुनिया उसके मांगने की सूची में शामिल हो गई। एक बार तो यह भी सोचा क्यों न इनमें से दो-तीन को घर ले चलूं फिर तो जब कुछ और जरूरत होगा तो ये काम आएंगी। युवक के लालच भरे उलझाव को देख परियों सशंकित हो गईं। अब उन्होंने भी 'दिमागÓ लगाया परयिों ने कहा जो भी मांगो एक ही बार मांगो और जाते वक्त पीछे मुड़कर देखा तो सब गायब हो जाएगा। इसपर युवक ने खूब सोचकर ढेर सारे हीरे-जवाहरात मांग लिए। अब वह सभी संपत्ति ले घर चल पड़ा। हीरे-जवाहरात की चमक ने उच्चकों को उसका पता दे दिया फिर क्या था उच्चकों के एक गिरोह ने उसे घेर लिया और सारे सामान छीन लिए। सिर धुनता-पिटता वह युवक अब रोज-रोज कुएं के पास जोर-जोर से आवाज लगाता है एक खाऊं .. दो खाऊं... तीन खाऊं.... या सारे ही खा जाऊं.....लेकिन कोई उसपर कान भी नहीं देता। आज मानव की भी यही स्थिति है अवसर मिलने पर लालच शाश्वत चारित्रिक गुणों पर हावी हो रहा है... और इसी तृष्णा में वह एक खाऊं .. दो खाऊं... तीन खाऊं.... या सारे ही खा जाऊं.....में व्यस्त हो गया है।
प्रवीण प्रियदर्शी
Acha alekh... Vartman paristhiti ka sahichitran kiya gaya hai.
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