Thursday, December 6, 2018

आरयू छात्रसंघ चुनाव में खुला असली-नकली का भेद

प्रदेश के सबसे प्रतिष्ठित रांची विश्वविद्यालय के 2018 के छात्रसंघ चुनाव के परिणाम ने छात्र राजनीति के असली-नकली चेहरों पर से पर्दा हटा दिया है। कौन संगठन छात्रों के बीच है और कौन चौराहे पर यह स्पष्ट हो चुकी है। छात्रसंघ चुनाव में बेहद कम मतदान भी छात्र संगठनों की अनुपयोगिता दर्शाने को आतुर है। अगर छात्राओं ने बढ़-चढ़कर मतदान नहीं किया होता तो मतदान प्रतिशत और भी कम होता। इस संबंघ में विभिन्न संगठनों कोे मिले मत प्रतिशत काफी रोचक होंगे। सच मानिए अधिकतर संगठनों को 2-3 फीसद से ज्यादा मत नहीं मिला होगा। लेकिन इनकी अलोकतांत्रिक अकड़ इन्हें रणनीति और नेतृत्व पर विचार करने से जरूर रोक देगी। 
वहीं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की शानदार जीत उनके संगठन की गतिशीलता, समर्पित कार्यकर्ताओं की लंबी कड़ी और सिद्धांत की धार दिखाती है। आदिवासी छात्र संघ ने ग्रामीण व खासकर आदिवासी छात्रों के बीच अपनी पकड़ को एक बार फिर सिद्ध किया है इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में अभाविप के लिए नई चुनौती भी रेखांकित हो गई है। एनएसयूआइ, झारखंड छात्र मोर्चा, वाम दलों के छात्र संगठनों की पतली हालत ने इनके संगठन से लेकर राजनीतिक तौर-तरीके और आंतरिक लोकतंत्र पर सवाल उठा दिया है। एनएसयूआइ हो या जेसीएम इन संगठनों में वर्षों से कुछ गिने-चुने छात्र (अब तो उनका पढ़ाई-लिखाई से कोई संबंध भी नहीं) ही कार्यभार संभाल रहे हैं। नाम के लिए भले ही संगठन में अध्यक्ष या सचिव का चुनाव होता हो लेकिन जमीनी नेतृत्व इनके हाथ में नहीं होती। इनमें से कई छात्र नेताओं ने विवि, कॉलेजों की कमियों को अपनी आमदनी का भी साधन बना लिया है। ऐसे छात्रों का एक सर्वदलीय या सेक्यूलर कॉक्स विवि परिसर में हावी है। जो दबंगई भी करता है, प्राचार्य, वीसी को बंधक बनाने, घेराव करने, परीक्षा की तिथि बढ़वाने, फेल छात्रों के नंबर बढ़वाने के लिए आंदोलन करने में भी माहिर है। जबकि छात्रों के लिए अब ये विषय कूड़ा-करकट हो चुके हैं। वह गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई, लैंगिक समानता और समान अवसर पर केंद्रित राष्ट्र के लिए समर्पण की राजनीति चाहते हैं, इसी दम पर जहां एबीवीपी परचम लहरा रहा वहीं अन्य संगठन पानी भर रहे हैं। जहां आदिवासी छात्र संघ ने सफलता पाई वहां भी एबीवीपी ही अधिकतर जगहों पर मुख्य मुकाबले में रही और जेसीएम जैसी आदिवासी नेतृत्व व हित का खम ठोंकने वाले तीसरे-चौथे स्थान पर खिसक गए। वाम संगठनों ने तो मानों जहर खाने की ठान ली है। झूठे तथ्यों पर राजनीति की उनके आकाओं की आदत ने छात्र संगठनों में भी गहरी पैठ बना ली है, इसका परिणाम सामने है। शायद जेएनयू जैसे चुनिंदा विश्वविद्यालय को छोड़ दें तो ये सूक्ष्मदर्शी उपस्थिति वाले जीव बन गए हैं।
प्रवीण प्रियदर्शी

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