Thursday, June 13, 2013

कभी आडवाणी की गुगली ने ली थी कडिय़ा की बलि

प्रवीण प्रियदर्शी, रांची : खुद की आपत्ति दरकिनार कर नरेंद्र मोदी को केंद्रीय चुनाव समिति की कमान सौंपे जाने से नाराज भाजपा के पितृपुरुष लाल कृष्ण आडवाणी ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। अब वह भाजपा के प्राथमिक सदस्य मात्र हैं। आडवाणी जैसे बड़े कद के नेता की भावना के विपरीत काम होने से बात आज यहां तक पहुंच गई लेकिन कभी झारखंड में भी आडवाणी की सह पर ऐसा ही हुआ था और उस समय उन्होंने किसी की भावना का ख्याल नहीं रखा था।
बात उन दिनों की है जब झारखंड अलग राज्य बनाने की घोषणा हो चुकी थी। उस समय भाजपा झारखंड में सबसे बड़ी पार्टी थी, आजसू व जदयू के साथ भाजपा की सरकार बननी थी। किसी आदिवासी नेता को ही मुख्यमंत्री बनाया जाना था। स्वभाविक है प्रदेश भाजपा के सबसे बड़े आदिवासी नेता होने के नाते कडिय़ा मुंडा का नाम लोगों की जुबान पर था। कडिय़ा का कद उस समय झारखंड भाजपा में वैसा ही था जैसा आडवाणी का केंद्र में। उनका शानदार राजनीतिक रिकार्ड, लंबा जमीनी अनुभव, पार्टी के प्रति समर्पण, स्वच्छ छवि और मृदु स्वभाव के सभी कायल थे। भाजपा के लगभग सभी वरिष्ठ नेता भी उनके पक्ष में थे। इसमें झारखंड में पार्टी के सबसे बड़े नाम कैलाशपति मिश्र, झारखंड में पार्टी का आधार तैयार करने वाले देवदास आप्टे, तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष डा. दुखा भगत, प्रदेश महासचिव लाल राजेंद्र नाथ शाहदेव सहित संगठन के कई अन्य नेता शामिल थे। कैलाशपति मिश्र ने कई बैठकों में साफ कहा था कि वाजपेयी जी कडिय़ा के पक्ष में हैं। कडिय़ा का मुख्यमंत्री बनना तय माना जा रहा था। कडिय़ा कहीं भी जाते लोग उनके स्वागत-सम्मान में जुट जाते। कोकर में उनका भव्य स्वागत किया गया, इसके बाद चेंबर ऑफ कामर्स की ओर से स्वागत हुआ फिर तो कई संगठनों की ओर से स्वागत का दौर शुरू हो गया। इसीबीच कडिय़ा की तमाम लोकप्रियता को दरकिनार कर अचानक केंद्रीय नेतृत्व ने झारखंड के सभी विधायकों को रायशुमारी के लिए दिल्ली बुला लिया। उस समय प्रदेश भाजपा के बड़े पदाधिकारी रहे एक नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं कि यह आदेश आडवाणी जी का था। रायशुमारी के नाम पर अचानक मुहर  बाबूलाल मरांडी के नाम पर लगा दी गई। मालूम हो कि उन दिनों बाबूलाल मरांडी आडवाणी के बेहद करीब थे, और उनकी ही कृपा से केंद्रीय मंत्रीमंडल में पर्यावरण व वन राज्य मंत्री के कुर्सी पर काबिज थे।
 इस तरह आडवाणी की गुगली से एक राजनीतिक नवसिखुआ से मात खा कडिय़ा मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गये। इसके बावजूद बिना उद्वेलित हुए कडिय़ा मुंडा ने इस निर्णय को बेहद शालीनता से स्वीकार किया और पार्टी की सेवा में लगे रहे।

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