Thursday, November 7, 2013

ऋगवेद में की गई है सूर्य की पहली स्तुति



 छठ सूर्योपासना का अनुपम लोकपर्व है। पूर्वी भारत के बहुत बड़े भाग में इसे धूमधाम से मनाया जाता है। वस्तुत: सूर्य की सृष्टि और पालन शक्ति के कारण सूर्योपासना सभ्यता के विकास के साथ ही विभिन्न स्थानों व संस्कृति में अलग-अलग रूप में प्रारंभ हो गई। हां भारत में सूर्योपासना को विशेष महत्व मिला, यहां इसे सर्जक, पालक के साथ ही आरोग्य और अक्षय ऊर्जा का स्रोत माना गया।
ऋगवेद में पहली बार औपचारिक रूप में देवता मान सूर्य की वंदना की गई। प्रसिद्ध गायत्री मंत्र में भी सूर्य की उपासना की गई है। सैकड़ों ऋग वैदिक ऋचाओं में सूर्य और उषा और प्रत्युषा की महिमा और वंदना की गई है। दोनों को सूर्य की पत्नी और शक्ति का मुख्य स्रोत माना गया है। उषा सुबह की पहली किरण को कहा गया है जबकि प्रत्युषा सूर्य की अंतिम किरण को कहा गया है। माना जाता है कि इसमें रोग निवारण की अपूर्व क्षमता है। इसके बाद अन्य वेदों के साथ ही उपनिषद आदि वैदिक ग्रंथों में इसकी चर्चा प्रमुखता से हुई। निरुक्त के रचियता यास्क ने भी द्युस्थानीय देवताओं (अंतरिक्ष देवताओं) में सूर्य को पहले स्थान पर रखा है। उत्तर वैदिक काल के अंतिम कालखंड में सूर्य के मानवीय रूप की कल्पना होने लगी। इसने कालांतर में सूर्य की मूर्ति पूजा का रूप ले लिया। पौराणिक काल आते-आते सूर्य पूजा और प्रचलित हो गई। कई स्थानों पर सूर्य देव के मंदिर भी बने।

आरोग्य देवता के रूप में पहचान

प्रारंभ से सूर्य की महिमा आरोग्य देवता के रूप में रही है। सूर्य की किरणों में नव जीवन सृजित करने के साथ ही कई रोगों को नष्ट करने की क्षमता पाई गई। ऋषि-मुनियों ने अपने अनुसंधान के क्रम में किसी खास दिन इसका प्रभाव विशेष पाया। संभवत: यही छठ पर्व (सूर्य षष्ठी) के उद्भव की बेला रही हो। सूर्य की आरोग्य क्षमता के विषय में प्रसिद्ध आख्यान भी हैं। पुराणों के अनुसार भगवान कृष्ण के पौत्र शाम्ब को कुष्ठ हो गया, तो इसके लिए विशेष सूर्योपासना की गई, जिसके लिए विशेष रूप से शाक्य द्वीप से ब्राह्मणों को बुलाया गया। सूर्योपासना से शाम्ब स्वस्थ हुए। सूर्य और इसकी उपासना की विशेष चर्चा विष्णु पुराण, भगवत पुराण, ब्रह्म वैवर्त पुराण, मार्कण्डेय पुराण आदि में विस्तार से किया गया है। महाभारत में कर्ण और द्रोपदी के सूर्य उपासना की चर्चा है। महापुरुषों की विरासत, सूर्य की दृश्यमान क्षमता, शक्ति, सर्वसुलभता और पूजन विधि की सरलता के कारण छठ जन-जन का पर्व बन गया।

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